सचेतन 192: सांसारिक या फिर आध्यात्मिक परिचय भी आपका आत्म-परिचय नहीं है।

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सचेतन 192: सांसारिक या फिर आध्यात्मिक परिचय भी आपका आत्म-परिचय नहीं है।

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जब तक हम बाहर से आए हुए शब्दों को पकड़ते हैं तब तक हम स्वयं से परिचित नहीं हो सकेंगे

कहानी में जब संन्यासी ने राजा के प्रश्न ‘क्या मुझे परमात्मा से मिला सकेंगे?’ के जबाब में कहा की आप ईश्वर से मिलना चाहते हैं तो क्या आप थोड़ी देर रुक सकते हैं या बिलकुल अभी मिलने की इच्छा है? वह राजा भी तैयार नहीं था। और इतने जल्दी परमात्मा से मिलने की बात हो तो हम सभी ईश्वर के खोजियों का तथाकथित सोच – विचार करना या अपने मित्रों, पति, पत्नी, घर के लोगों की राय लेना चाहेंगे। राजा भी तैयार नहीं था लेकिन जब बात ही मुसीबत ही आ पड़ी थी तो उसने कहा कि ठीक है आप कहते हैं तो मैं अभी मिल लूंगा। 

संन्यासी के कहने पर राजा ने छोटा से कागज पर अपने परिचय में बड़े राज्य का राजा, महल का पता, वह सब लिख दिया था। लेकिन संन्यासी के यह पूछने पर कि अगर कल आप भिखारी हो जाएं और राज्य छिन जाए तो क्या पता यही रहेगा और उस राजा ने कहा कि नहीं, राज्य छिन जाए तो भी मैं तो मैं ही रहूंगा। तो संन्यासी ने कहा कि फिर राजा होना आपका परिचय नहीं हो सकता।

यहाँ तक की यह जो नाम लिखा है, उसे बदल दिया जा सकता है। संन्यासी ने कहा कि नाम भी आपका परिचय नहीं है। 

उस राजा ने वह कागज वापस ले लिया और कहाः मुझे क्षमा करें। अगर मेरा नाम, मेरा धन, मेरा पद और मेरी प्रतिष्ठा मेरा परिचय नहीं है तो फिर मुझे पता नहीं कि मैं कौन हूं? 

जब तक आप स्वयं को नहीं जान पायेंगे तब तक तो परमात्मा से मिलाना बहुत कठिन है क्योंकि आप किस रूप में किस विचार से परमात्मा से मिलना चाहते हैं यह आवश्यक है। 

और आप कौन हो जब यह खोज ख़त्म हो जाएगा तो उस दिन बिना किसी के सहारे आप परमात्मा से मिल सकेंगे। लेकिन स्वयं को पा लेना यह प्रक्रिया आपके हमसब के भीतर से होना चाहिए। और यह भी पक्का है की जो मेरे भीतर है और जो किसी और के भीतर है और जो सबके भीतर है, वह बहुत गहरे में संयुक्त है, और एक है और समग्र है। 

लेकिन इस ‘मैं’ का तो हमें कोई भी पता नही है। या तो हम अपने नाम को, अपने घर को, अपने परिवार को समझते हैं कि यह मेरा होना है, अगर किसी भांति इससे हमारा छुटकारा हो जाए और ये हम जान सकें कि मेरा नाम, मेरा घर, मेरा वंश, मेरा राष्ट्र, मेरी जाति, मेरा धर्म यह मेरा होना नहीं है। 

अगर किसी भांति यह बोध भी आ जाए तो फिर हम तोते कि भांति उन शब्दों को दोहराने लगते हैं जो ग्रंथों में लिखे हैं और शास्त्रों में कहे हैं। तब हम दोहराने लगते हैं कि मैं आत्मा हूँ, मैं परमात्मा हूँ। अहं-ब्रह्मास्मि और-और न मालूम क्या-क्या हम दोहराने लगते हैं। 

मैं आपसे कहूँ कि जिस भांति नाम आपको सिखाया गया है उसी भांति ये बातें भी आपको सिखाई गईं हैं इनमें भेद नहीं है। जिस भांति यह कहा गया है कि आप का यह नाम है और आपने पकड़ लिया है, उसी भांति यह भी कहा गया है कि आपके भीतर परमात्मा है और आपने यह भी पकड़ लिया है। इन दोनों बातों में कोई फर्क नहीं है।

जब तक हम बाहर से आए हुए शब्दों को पकड़ते हैं तब तक हम स्वयं से परिचित नहीं हो सकेंगे वे शब्द चाहे पिता ने दिए हो, चाहे समाज ने, चाहे ऋषियों ने, मुनियों ने, साधु ने, संतों ने किन्हीं ने भी वे शब्द दिए हों, जब तक बाहर से आए हुए परिचय को हम पकड़ेंगे तब तक उस परिचय का जन्म नहीं हो सकेगा जो हमारा परिचय है। तब तक हम उसे नहीं जान सकेंगे। तब तक उसे जानने का कोई मार्ग नहीं है।

तो या तो हम जिसे सांसारिक कहते हैं उस तरह के परिचय को पकड़ लेते हैं या जिसे आध्यात्मिक कहते हैं उस तरह के परिचय को पकड़ लेते हैं। लेकिन दोनों परिचय पकड़े गए होते हैं। दोनों परिचय बाहर से मिलते हैं। जो परिचय बाहर से मिलता है वह आत्म-परिचय नहीं है।

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