सचेतन 2.49: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – भयंकर राक्षसियों से घिरी हुई सीता जी का दर्शन

भयानक रस में भय का परिपोष हनुमान जी को हुआ फिर भी वो प्रसन्न थे 
तदनन्तर वह दिन बीतने के पश्चात् कुमुद समूह के समान श्वेत वर्णवाले तथा निर्मल रूप से उदित हुए चन्द्रदेव स्वच्छ आकाश में कुछ ऊपर को चढ़ आये। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई हंस किसी नील जलराशि में तैर रहा हो। निर्मल कान्तिवाले चन्द्रमा अपनी प्रभा से सीताजी के दर्शन आदि में पवनकुमार हनुमान जी की सहायता सी करते हुए अपनी शीतल किरणों द्वारा उनकी सेवा करने लगे। उस समय उन्होंने पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली सीता को देखा, जो जल में अधिक बोझ के कारण दबी हुई नौका की भाँति शोक के भारी भार से मानो झुक गयी थीं। 
वायुपुत्र हनुमान जी ने जब विदेहकुमारी सीता को देखने के लिये अपनी दृष्टि दौड़ायी, तब उन्हें उनके पास ही बैठी हुई भयानक दृष्टिवाली बहुत-सी राक्षसियाँ दिखायी दीं। उनमें से किसी के एक आँख थी तो दूसरी के एक कान। किसी-किसी के कान इतने बड़े थे कि वह उन्हें चादर की भाँति ओढ़े हुए थीं। किसी के कान ही नहीं थे और किसी के कान ऐसे दिखायी देते थे मानो खूटे गड़े हुए हों। किसी-किसी की साँस लेने वाली नाक उसके मस्तक पर थी। किसी का शरीर बहुत बड़ा था और किसी का बहुत उत्तम। किसी की गर्दन पतली और बड़ी थी। किसी के केश उड़ गये थे और किसी-किसी के माथे पर केश उगे ही नहीं थे। कोई-कोई राक्षसी अपने शरीर के केशों का ही कम्बल धारण किये हुए थी। किसी के कान और ललाट बड़े-बड़े थे तो किसी के पेट और स्तन लंबे थे। किसी के ओठ बड़े होने के कारण लटक रहे थे तो किसी के ठोड़ी में ही सटे हुए थे। किसी का मुँह बड़ा था और किसी के घुटने। 
कोई नाटी, कोई लंबी, कोई कुबड़ी, कोई टेढ़ीमेढ़ी, कोई बवनी, कोई विकराल, कोई टेढ़े मुँहवाली, कोई पीली आँखवाली और कोई विकट मुँहवाली थीं। कितनी ही राक्षसियाँ बिगड़े शरीर वाली, काली, पीली, क्रोध करने वाली और कलह पसंद करने वाली थीं। उन सबने काले लोहे के बने हुए बड़े-बड़े शूल, कूट और मुद्गर धारण कर रखे थे। 
कितनी ही राक्षसियों के मुख सूअर, मृग, सिंह, भैंस, बकरी और सियारिनों के समान थे। किन्हीं के पैर हाथियों के समान, किन्हीं के ऊँटोंके समान और किन्हीं के घोड़ों के समान थे। किन्हीं-किन्हीं के सिर कबन्ध की भाँति छाती में स्थित थे; अतः गड्डे के समान दिखायी देते थे। (अथवा किन्हीं-किन्हीं के सिर में गड्ढे थे)। किन्हीं के एक हाथ थे तो किन्हीं के एक पैर। किन्हीं के कान गदहों के समान थे तो किन्हीं के घोड़ों के समान। किन्हीं-किन्हीं के कान गौओं, हाथियों और सिंहों के समान दृष्टिगोचर होते थे। किन्हीं की नासिकाएँ बहुत बड़ी थीं और किन्हीं की तिरछी। किन्हीं-किन्हीं के नाक ही नहीं थी। कोई-कोई हाथी की ढूँड़ के समान नाकवाली थीं और किन्हीं किन्हीं की नासिकाएँ ललाट में ही थीं, जिनसे वे साँस लिया करती थीं। 
यहाँ भयानक रस का वर्णन है जो आपके जीवन नौ रसों (शृंगार रस • हास्य रस • करुण रस • रौद्र रस • वीर रस • भयानक रस • वीभत्स रस• अद्भुत रस • शांत रस) में से एक रस है, रस का शाब्दिक अर्थ है। ‘भय का परिपोष’ अथवा ‘सम्पूर्ण इन्द्रियों का विक्षोभ’ भयानक रस है। भयोत्पादक वस्तुओं को देखने या फिर सुनने से अथवा शत्रु इत्यादि के विद्रोहपूर्ण आचरण की स्थिति में भयानक रस उद्भुत होता है। 
हनुमान जी भयानक राक्षसियोंके दृश्य में देखा की किन्हीं के पैर हाथियों के समान थे और किन्हीं के गौओं के समान। कोई बड़े-बड़े पैर धारण करती थीं और कितनी ही ऐसी थीं जिनके पैरों में चोटी के समान केश उगे हुए थे। बहुत-सी राक्षसियाँ बेहद लंबे सिर और गर्दनवाली थीं और कितनों के पेट तथा स्तन बहुत बड़े-बड़े थे। किन्हीं के मुँह और नेत्र सीमा से अधिक बड़े थे, किन्हीं-किन्हीं के मुखों में बड़ी-बड़ी जिह्वाएँ थीं और कितनी ही ऐसी राक्षसियाँ थीं, जो बकरी, हाथी, गाय, सूअर, घोड़े, ऊँट और गदहों के समान मुँह धारण करती थीं। इसीलिये वे देखने में बड़ी भयंकर थीं। किन्हीं के हाथ में शूल थे तो किन्हीं के मुद्गर। कोई क्रोधी स्वभाव की थीं तो कोई कलह से प्रेम रखती थीं। धुएँ-जैसे केश और विकृत मुखवाली कितनी ही विकराल राक्षसियाँ सदा मद्यपान किया करती थीं। मदिरा और मांस उन्हें सदा प्रिय थे। 
कितनी ही अपने अंगों में रक्त और मांस का लेप लगाये रहती थीं। रक्त और मांस ही उनके भोजन थे। उन्हें देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ने उन सबको देखा। 
वे उत्तम शाखावाले उस अशोकवृक्ष को चारों ओर से घेरकर उससे थोड़ी दूर पर बैठी थीं और सती साध्वी राजकुमारी सीता देवी उसी वृक्ष के नीचे उसकी जड़ से सटी हुई बैठी थीं। उस समय शोभाशाली हनुमान जी ने जनककिशोरी जानकीजी की ओर विशेष रूप से लक्ष्य किया। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। वे शोक से संतप्त थीं और उनके केशों में मैल जम गयी थी। 
जैसे पुण्य क्षीण हो जाने पर कोई तारा स्वर्ग से टूटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा हो, उसी तरह वे भी कान्तिहीन दिखायी देती थीं। वे आदर्श चरित्र (पातिव्रत्य)-से सम्पन्न तथा इसके लिये सुविख्यात थीं। उन्हें पति के दर्शनके लिये लाले पड़े थे। 

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