सचेतन 177: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- सुख और दुख दोनों आपके पास है

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क्या हमें कभी भी दुःखी होना चाहिए? 

द्वेष करने से ही दुःख का साक्षात्कार होता है।    

हम अनुकूलता या प्रतिकूलता की भावना को इन्द्रिय और नके विषय से महसूस करते हैं। इन्द्रिय यानी हमारे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण और उनके विषय यानी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। 

यानी जब हमारी इन्द्रिय के विषय में अनुकूलता का भाव महसूस होता है तो मनुष्य को उस विषय में ‘राग’ हो जाता है यानी वह उस स्थिति में अपने आप को अनुकूल यानी  उस विशेष वातावरण में सुगमता पूर्वक जीवन व्यतीत करने को इक्षा शुरू हो जाती है। इन्द्रियों के विषय में अनुकूलता होने पर बहुत सारे स्थायी बदलावों की प्रक्रिया को हम महसूस करते हैं और हमारा भाव प्रसन्न दिखता है और यह राग है।

जब हमारी इन्द्रिय के विषय में  प्रतिकूलता का भाव होने पर उस विषय में ‘द्वेष’ हो जाता है यानी हमारा आचरण हमारी भावना या क्रिया सब एक प्रकार से प्रतिकूलत्व, विपरीतता, विरुद्धता, वैपरीत्य होने लगता है। यही हम कहना शुरू करते हैं की जीवन में क्लेश हो गया है, हमें भय लगने लगता है, मृत्यु जैसा महसूस होने लगता है। कहते हैं विपत्ति हो गई है रोग होने लगा है।  

इस प्रकार से  हम अपनी इन्द्रिय से सभी विषय को उल्टा समझने लगते है, हमें अज्ञानता आने लगती है। और यहाँ से ही प्रेम का नाश होकर या द्वेष, जड़ता और दुःख शुरू हो जाता है। 

यदि ऐसा है तो क्या हमें दुखी होना चाहिए? बिलकुल नहीं। 

फिर भी आप देखेंगे की बहुत सारे लोग जहाँ तहाँ दुःख की एवं सब प्रकार से प्रतिकूलता की पुकार करते हुए दिखते हैं, इसका क्या कारण है? 

यह जगत की सत्ता मात्र आपके लिये है, और उस सत्ता द्वारा आप जो कुछ करना चाहो सो कर सकते हो फिर भी आप में इतनी अधिक दुर्बलता बनी है, इसका क्या कारण ? 

जगत में जो कुछ उत्तम है सो आपका ही है, तो फिर आपकी उत्तम चीज आपको क्यों नहीं मिलता और अधर्म ही मिलता है, इसका क्या कारण? 

संसार का सब कुछ आपके आधीन है। उसमें आप जो कुछ परिवर्तन करना चाहो सो कर सकते हो, तो फिर आपको भी कुछ मिलता है, उसे छोड़कर दूसरा क्यों नहीं कर सकते, अथवा उसमें अपनी इच्छा अनुकूल परिवर्तन क्यों नहीं कर सकते, इसका क्या कारण? 

तुम्हारे पास सुख और दुख दोनों हैं, उसमें से तुम दुःख को छोड़कर सुख को ही क्यों नहीं लेते, इसका क्या कारण? 

बस सबका कारण एक ही है, वह यह कि सब तुम्हारे लिये है, सब तुम्हारे आधीन है, किन्तु स्वयं तुम तुम्हारे (अपने)लिए नहीं- तुम स्वयं (अपने) तुम्हारे अधीन नहीं हो। 

तुम जानते हो कि मैं दुःख के अधीन हूँ, रोग के वश में हूँ, मृत्यु के अधीन हूँ, विपत्ति के पंजे में हूँ, काम के अधीन हूँ, प्रारब्ध के अधीन हूँ, ग्रहों के वश में हूँ, इस प्रकार हर एक के अधीन अपने को मानते हो, और यह आज से ही नहीं, किन्तु बहुत काल से अर्थात् परम्परा से मानते चले आये हो! 

इस प्रकार दृढ़ता पूर्वक मान लेने से वही तुम्हें मिलता है और जो कुछ तुम्हें चाहिये सो नहीं मिलता। 

तुम समझते हो कि यदि सुख सम्पत्ति आदि केवल अनुकूल वस्तुएँ ही तुम्हें मिली होती तो तुम अधिक सुखी, विशेष आनन्दमय और बहुत प्रसन्न होते, परन्तु यह तुम्हारी भूल है। परमात्मा ने दोनों तुम्हें दिये हैं दोनों प्रकार की सामर्थ्य तुम्हें ग्राह्य हैं और यही एक तुम्हारी उन्नति का साधन है। 

तुम यह न समझो कि सुख तुम्हारा हित करने वाला है और दुःख हितकारी नहीं, बल्कि दोनों तुम्हारे हितकारक ही हैं। इसीलिए दोनों वस्तुएँ तुम्हें प्राप्त हुई हैं, किन्तु अपने को एक ही वस्तु के आधीन समझ लिया है, यह तुम्हारी बड़ी भूल है।

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