सचेतन 247: शिवपुराण- वायवीय संहिता – मंत्रयोग से स्पर्शयोग तक पहुँचने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना होगा

प्राणायाम करते समय आप आपने बाहर और भीतर हो रहे शब्दों को ध्यान से सुने तो लगेगा की आपको मन की एकाग्रता चाहिए! 

हमने शिवपुराण में मंत्र योग, स्पर्श योग, भावयोग, अभाव योग और महायोग, पांच प्रकार के योग के बारे में ज़िक्र किया था। अगर आप योग का अभ्यास करना चाहते हैं तो ऐसी योग क्रिया का आधार बनाये जो आपकी समस्त प्रवृत्तियों को शुद्ध कर उसे शिव से एकाकार करवाती हो। 

सचेतन के पिछले क्रम में हमने विस्तार से मंत्र योग यानी मातृका और वर्ण के विषय को समझा है और वर्णमाला के बाबन अक्षर का विशाल महत्व है और उसका अर्थ और उनकी विशेषता है। मंत्र योग यानी मंत्र जप के अभ्यास करने मात्र से वह मातृका या वर्ण या वह शब्द आपके वाच्यार्थ में स्थित हो जाती है और आपका विक्षेप रहित मन की वृत्ति बनती जाती है जिससे मंत्र योग का प्रभाव हमारे तन और मन पर पड़ता है। वैसे आपकी वाणी और वचन में वही है जो आपके मन में स्थित है।मंत्र योग मनुष्य को मंत्रों का अर्थ समझने और मन को एकाग्र कर शिव से मिलाने में मदद करता है। 

आज हम स्पर्श योग के बारे में बातचीत शुरू करेंगे। इसके लिए आपको मंत्रयोग के साथ साथ प्राणायाम का अभ्यास करना होगा तभी आप ‘स्पर्शयोग’ तक पहुँच पायेंगे। स्पर्श योग में मन की वृत्ति के साथ साथ प्राणायाम को प्रधानता देना होगा। 

प्राणायाम में दो शब्द हैं  पहला प्राण अर्थात् साँस और दूसरा आयाम जिसका अर्थ है अधिकतम सीमा, विस्तार, विस्तीर्णता। याने दो सांसो में दूरी बढ़ाना, श्‍वास और नि:श्‍वास की गति को नियंत्रण कर रोकने व निकालने की क्रिया को अधिकतम सीमा तक विस्तार करना प्राणायाम कहा जाता है।

श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है। प्राणायाम के समय आपका भाव बहुत महत्वपूर्ण है जो मंत्रों का अर्थ समझने और मन को एकाग्र करने से प्राप्त होता है।मंत्र यानी आपके भीतर और बाहर जो ध्वनि है जो आप विचार कर रहे हैं कैसे शब्द आप सोच पा रहे हैं उसके अर्थ क्या हैं।    

श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। हम साँस लेते है तो सिर्फ़ हवा नहीं खीचते हैं। साँस के साथ ब्रह्मान्ड की सारी उर्जा को उसमें खींचते है। 

अब आपको लगेगा की सिर्फ़ साँस खीचने से ऐसा कैसा होगा? हम जो साँस फेफड़ों में खीचते है, वो सिर्फ़ साँस नहीं रहती उसमे सारे ब्रह्मांड की सारी उर्जा समाई रहती है यह कैसे हो सकता है? 

प्राणायाम के समय जैसे ही आपने बाहर और भीतर हो रहे शब्दों पर ध्यान देंगे और लगेगा की हमें मन को एकाग्र करना है विचार को सही और अर्थपूर्ण बनाना है तब  आप मंत्र का सहारा लेना शुरू करेंगे। फिर आप मंत्रों का अर्थ समझने और मन को एकाग्र करने को कोशिश करेंगे जिससे आपके मन का मैल धुलता जाएगा। 

वही मन ब्रह्म में स्थिर होना शुरू होगा यानी शुद्ध मन जो शिव का रूप है। मान लो जो साँस आपके पूरे शरीर को चलाना जानती है, वो आपके शरीर को दुरुस्त करने की भी ताकत रखती है। इसीलिए प्राणायाम निम्न मंत्र (गायत्री महामंत्र) के उच्चारण के साथ किया जाना चाहिये।

ॐ भूः भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्।

ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ।

स्पर्श योग का प्रारंभ यहीं से है की आप अपने इष्ट का स्पर्श करें। जैसा स्पर्श आप  मंत्र जपने से अर्थ को समझने से करते हैं या फिर आप जैसे किसी शिवलिंग या मूर्ति या किसी चीज का स्पर्श करके उसको समझते है। इसीलिए इष्ट की मूर्ति का श्रृंगार और सेवा की जाती है की आप बाह्य रूप से स्पर्श योग से किसी को समझने की प्रेरणा करते हैं।

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