सचेतन 2.64: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – श्रीरघुनाथजी ने सीता को त्रिजटा के स्वप्न में प्राप्त किया

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सचेतन 2.64: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – श्रीरघुनाथजी ने सीता को त्रिजटा के स्वप्न में प्राप्त किया

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स्वप्न- आपके विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं का एक क्रम है  
त्रिजटा के स्वप्न का बखान पर हम सुन रहे थे की राक्षसों के विनाश और श्री रघुनाथ जी की विजय की शुभ सूचना का संदेश मिल रहा था। त्रिजटा ने अपने राक्षसियों को कहा की मैंने स्वप्न में भगवान् विष्णु के समान पराक्रमी श्रीराम का उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ दर्शन किया। श्रीरामचन्द्रजी महातेजस्वी हैं। उन्हें देवता, असुर, राक्षस तथा दूसरे लोग भी कदापि जीत नहीं सकते। ठीक उसी तरह, जैसे पापी मनुष्य स्वर्गलोक पर विजय नहीं पा सकते। 
स्वप्न के बारे में यह दृष्टिकोण साफ़ है की इच्छाओं की पूर्ति की अभिलाषा है या कोई घटना घटित होने वाली हो तो स्वप्नदृष्टा पता चल जाता है जैसे की त्रिजटा को नींद से जागने के बाद आभास हुआ।
त्रिजटा ने आगे कहा की मैंने रावण को भी सपने में देखा था। वह मूड़ मुड़ाये तेल से नहा के लाल कपड़े पहने हुए था। मदिरा पीकर मतवाला हो रहा था तथा करवीर के फूलों की माला पहने हुए था। इसी वेशभूषा में आज रावण पुष्पक विमान से पृथ्वी पर गिर पड़ा था। एक स्त्री उस मुण्डित-मस्तक रावण को कहीं खींचे लिये जा रही थी। उस समय मैंने फिर देखा, रावण ने काले कपड़े पहन रखे हैं। वह गधे से जुते हुए रथ से यात्रा कर रहा था। लाल फूलों की माला और लाल चन्दन से विभूषित था। तेल पीता, हँसता और नाचता था। पागलों की तरह उसका चित्त भ्रान्त और इन्द्रियाँ व्याकुल थीं। वह गधे पर सवार हो शीघ्रता पूर्वक दक्षिण-दिशा की ओर जा रहा था। तदनन्तर मैंने फिर देखा राक्षसराज रावण गधे से नीचे भूमि पर गिर पड़ा है। उसका सिर नीचे की ओर है (और पैर ऊपर की ओर) तथा वह भय से मोहित हो रहा है। 
फिर वह रावण भयातुर हो घबराकर सहसा उठा और मद से विह्वल हो पागल के समान नंग-धडंग वेष में बहुत-से दुर्वचन (गाली आदि) बकता हुआ आगे बढ़ गया। सामने ही दुर्गन्धयुक्त दुःसह घोर अन्धकारपूर्ण और नरकतुल्य मल का पङ्क था, रावण उसी में घुसा और वहीं डूब गया।
तदनन्तर फिर देखा, रावण दक्षिण की ओर जा रहा है। उसने एक ऐसे तालाब में प्रवेश किया है, जिसमें कीचड़ का नाम नहीं है। वहाँ एक काले रंग की स्त्री है, जिसके अंगों में कीचड़ लिपटी हुई है। वह युवती लाल वस्त्र पहने हुए है और रावण का गला बाँधकर उसे दक्षिण-दिशा की ओर खींच रही है। वहाँ महाबली कुम्भकर्ण को भी मैंने इसी अवस्था में देखा है।रावण के सभी पुत्र भी मूड़ मुड़ाये और तेल में नहाये दिखायी दिये हैं। यह भी देखने में आया कि रावण सूअर पर, इन्द्रजित् सँस पर और कुम्भकर्ण ऊँट पर सवार हो दक्षिण-दिशा को गये हैं। 
आप स्वप्न को छवियों, विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं का एक क्रम मानिए जैसे त्रिजटा ने पूरी तरह या आमतौर पर निद्रा के कुछ चरणों के दौरान मन में अनैच्छिक घटना घाटी वही बताया। आपक जानते है की मनुष्य प्रति रात लगभग दो घंटे स्वप्न देखने में व्यतीत करता है, और प्रत्येक स्वप्न लगभग 5 से 20 मिनट तक रहता है। 
इसी क्रम में त्रिजटा ने सुनाया की राक्षसों में एकमात्र विभीषण ही ऐसे हैं, जिन्हें मैंने वहाँ श्वेत छत्र लगाये, सफेद माला पहने, श्वेत वस्त्र धारण किये तथा श्वेत चन्दन और अंगराग लगाये देखा है।उनके पास शकध्वनि हो रही थी, नगाड़े बजाये जा रहे थे। इनके गम्भीर घोष के साथ ही नृत्य और गीत भी हो रहे थे, जो विभीषण की शोभा बढ़ा रहे थे। विभीषण वहाँ अपने चार मन्त्रियों के साथ पर्वत के समान विशालकाय मेघ के समान गम्भीर शब्द करने वाले तथा चार दाँतों वाले दिव्य गजराजपर आरूढ़ हो आकाश में खड़े थे। यह भी देखने में आया कि तेल पीने वाले तथा लाल माला और लाल वस्त्र धारण करने वाले राक्षसों का वहाँ बहुत बड़ा समाज जुटा हुआ है एवं गीतों और वाद्यों की मधुर ध्वनि हो रही है। 
त्रिजट ने कहा की मैंने स्वप्न में देखा है कि रावण द्वारा सुरक्षित लङ्कापुरी को श्रीरामचन्द्रजी का दूत बनकर आये हुए एक वेगशाली वानर ने जलाकर भस्म कर दिया है। राख से रूखी हुई लङ्का में सारी राक्षसरमणियाँ तेल पीकर मतवाली हो बड़े जोर-जोर से ठहाका मारकर हँसती हैं। अतः अब तुमलोग हट जाओ और देखो कि किस तरह श्रीरघुनाथजी सीता को प्राप्त कर रहे हैं। वे बड़े अमर्षशील हैं, राक्षसों के साथ तुम सबको भी मरवा डालेंगे। जिन्होंने वनवास में भी उनका साथ दिया है, उन अपनी पतिव्रता भार्या और परमादरणीया प्रियतमा सीता का इस तरह धमकाया और डराया जाना श्रीरघुनाथजी कदापि सहन नहीं करेंगे। 
अतः अब इस तरह कठोर बातें सुनाना छोड़ो; क्योंकि इनसे कोई लाभ नहीं होगा। अब तो मधुर वचन का ही प्रयोग करो। मुझे तो यही अच्छा लगता है कि हमलोग विदेह नंदिनी सीता से कृपा और क्षमा की याचना करें। जिस दुखिनी नारी के विषय में ऐसा स्वप्न देखा जाता है, वह बहुसंख्यक दुखों से छुटकारा पाकर परम उत्तम प्रिय वस्तु प्राप्त कर लेती है। 
राक्षसियो! मैं जानती हूँ, तुम्हें कुछ और कहने या बोलने की इच्छा है; किंतु इससे क्या होगा? यद्यपि तुमने सीता को बहुत धमकाया है तो भी इनकी शरण में आकर इनसे अभय की याचना करो; क्योंकि श्रीरघुनाथजी की ओर से राक्षसों के लिये घोर भय उपस्थित हुआ है। 
साधारणत: स्वप्न का अनुभव ऐसा अनुभव है जो हमारे सामान्य तर्क के अनुसार सर्वथा निरर्थक दिखाई देता है। अतएव साधारणत: मनावैज्ञानिक स्वप्न के विषय में चर्चा करनेवालों को निकम्मा व्यक्ति मानते हैं। प्राचीन काल में साधारण अनपढ़ लोग स्वप्न की चर्चा इसलिए किया करते थे कि वे समझते थे कि स्वप्न के द्वारा इस भावी घटनाओं का अंदाज लगा सकते हैं। यह विश्वास सामान्य जनता में आज भी है। आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन इस प्रकार की धारणा को निराधार मानता है और इसे अंधविश्वास समझता है।
राक्षसियो! जनकनन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता केवल प्रणाम करने से ही प्रसन्न हो जायँगी। ये ही उस महान् भय से तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ हैं।इन विशाललोचना सीता के अंगों में मुझे कोई सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भी विपरीत लक्षण नहीं दिखायी देता (जिससे समझा जाय कि ये सदा कष्ट में ही रहेंगी)।

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