सचेतन 208: शिवपुराण- वायवीय संहिता – हमारे जीवन में उत्तम व्रत का फल क्या है?

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जीवन के प्रथम वर्ष से ही देवाधिदेव महेश्वर के दर्शन का इंतज़ार होना प्रारंभ हो जाता है। 

हमारे जीवन में उत्तम व्रत का फल क्या है? हमारे माता-पिता के महान् यज्ञ के बाद हमारा जन्म होता है और जीवन का क्रम तदन्तर समय के साथ बीतने पर जब हम वाक्य विद्या, चलना फिरना या कुछ कर्म करके प्रचुर उपलब्धि प्राप्त करते हैं तो यही  आश्चर्यजनक प्रक्रिया से युक्त जीवन के यज्ञ का उत्तम फल है।

आपके जीवन का दीर्घकालिक यज्ञ का अनुष्ठान कौन सा है? 

जब आप सांस लेना शुरू करते हैं और इस प्रक्रिया में वायुदेव स्वयं आपके शरीर में पधारते हैं और फिर आपके जीवन का दीर्घकालिक यज्ञ का अनुष्ठान चलता रहता है जिससे आपके सभी अंग प्रत्यंग आपके शरीर में अनुपम हर्ष का अनुभव करने लगते हैं। 

क्या आपका प्राण देवता दीर्घकालिक यज्ञ और अनुष्ठान करने पर आपको कुछ देते हैं?

अगर आप अपने प्राण देवता के लिए दीर्घकालिक यज्ञ और अनुष्ठान करते हैं तो वह आपसे पूरी तरह से जुड़ जाते हैं। आपका हर पल ख़याल रखते हैं।वायुदेवता के रूप में आपके हर कर्म और क्रिया के उपरांत आपको आभास देते रहते हैं की आप कुशल हैं या नहीं। यहाँ तक की आपको सही-गलत, कुशल और अकुशल होने का भी आभास देते हैं। जब आप कोई भी कार्य करते हैं तो उसमें चुनौती, आपत्ति और बाधा तो होगा ही और इसका आभास भी आपको प्राण देवता करवाते हैं। यह आपको तब पता चलता है जब लगता है की शरीर थक गया, धड़कन तेज हो गयें, मन अब कुछ करना नहीं चाहता है, और तो और वाह्य रूप से जब कोई और व्यक्ति, सामाजिक बंधन, या फिर प्राकृतिक आपदा आपके यज्ञहन्ता देवद्रोही दैत्यों के रूप आते हैं और आपके कर्म यज्ञ को बाधा पहुँचाते है तो उसका आभास भी वायु देवता आपको देते हैं। अगर आपसे जाने अनजाने में कोई गलती हो जाये तो उसका प्रायश्चिन करने का भी ज्ञान आपको प्राण देवता के यज्ञ करने से मिल सकता है। आपके जीवन में या कर्म में  कोई दोष आ जाए या शरीर के अंग में कुछ हो जाये तो आपके श्वसन प्रणाली आपको आगाह कर देती है। अपने प्राण को स्थिरन कर जीवन को सही बनाना चाहिए। 

सबसे बड़ा प्रश्न आपके लिए रखा था है की इस प्राण मय महायज्ञ की समाप्ति हो जाने पर अब आप लोग क्या करना चाहते हैं?

अगर हमारा जन्म मनुष्य योनि में है हुआ तो जन्म लेने के बाद से ही प्राण वायु के के साथ आपके दीर्घकाल से यानी जन्म जन्मांतर से किए हुए यज्ञ और अनुष्ठान का प्रभाव शुरू हो जाता है। आपके सामने यह प्रश्न आपके लिए है की इस प्राण मय महायज्ञ की समाप्ति हो जाने पर अब आप लोग क्या करना चाहते हैं?

आपको यज्ञ करना है जीवन का जिसके लिए एकाग्रचित होकर अपने सोच के प्रति भक्तिभाव को बढ़ाना। आप अपने ऐश्वर्य को अपने जीवन के भाव को इसके मूल्य को संक्षेप में भी समझना होगा। स्वाध्याय के लिए अनुष्ठान को शुरू करना। जब हमें अपने जीवन में मनुष्य योनि में जन्म लेने का कारण पता नहीं चलता है तो हमारा हृदय अज्ञानान्धकार से आक्रान्त हो जाता है। और फिर सत्य और पवित्र जीवन के लिए विशेष ज्ञान यानी विज्ञान की आवश्यकता होती है। जब आप की प्रजापति यानी सुपर पॉवर के शरण में जाकर अपने आपको सरेंडर यानी समर्पण करेंगे तो ही मनुष्य योनि में जन्म लेने का अर्थ समझ में आएगा। 

रुद्र यानी परमात्मा आपके हर अवस्था का परम कारण हैं। उन्हें तर्क से नहीं जाना जा सकता। इसके लिए हमें यज्ञ का आयोजन करना होता है। यानी चेतना से एकाग्रता से ध्यान से विश्लेषण करना होता है। 

हम सभी को इस पृथ्वी पर परमात्मा का आशीर्वाद प्राप्त है और उनका वचन मिला है कि हमसभी को ज्ञान का लाभ हो और उससे जगत को कल्याण की प्राप्ति होती रहे। यानी आपके विचार से विश्व का कल्याण संभव है। 

और  यह क्रम उन्नीसवें कल्पका यानी श्वेत लोहितकल्प से मिलता आ रहा है। क्योंकि उसी कल्प में सृष्टि की कामना से तपस्या प्रारंभ हुई थी।

कल्प यानी सृष्टिक्रम और विकास की गणना के लिए कल्प वैदिक रीति है जिसमें एक कल्प १००० चतुर्युगों के बराबर यानी चार अरब बत्तीस करोड़ (4,32,00,00,000) मानव वर्ष का हुआ। और अभी का ब्रह्मा जी के आयु का ५१वें वर्ष का प्रथम कल्प अर्थात्‌ श्वेतवाराह कल्प प्रारंभ हुआ है। 

यह हम कह सकते हैं को जीवन के प्रथम वर्ष से ही देवाधिदेव महेश्वर के दर्शन का इंतज़ार होना प्रारंभ हो जाता है। हम बचपन में ज़्यादा मन से शुद्धि होते हैं और उम्र के बढ़ने के साथ साथ मन को मालीनता बढ़ती जाती है। यहाँ से ही हमारे संस्कार की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।  

अगर मनुष्य योनि में जन्म लिए हैं और हमारे शरीर में  वायुदेवता शक्ति दे रहे हैं और यह रुद्र यानी परमशक्ति के करना हो रहा है और इस ज्ञान को हम समझ पा रहे हैं तो यही  आपका शिव का रूप है जो जीवन के प्रथम वर्ष में ही प्रारंभ हो जाता है।

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