सचेतन 205: शिवपुराण- वायवीय संहिता – हमारे जीवन में वायुदेवता स्वरूप प्राण का महत्व क्या है?

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सचेतन 205: शिवपुराण- वायवीय संहिता – हमारे जीवन में वायुदेवता स्वरूप प्राण का महत्व क्या है?

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हमारे जीवन में उत्तम व्रत का फल क्या है और जीवन का दीर्घकालिक यज्ञ का अनुष्ठान कौन सा है? 

सूत जी कहते हैं-मुनीश्वरो! उस समय उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन महाभाग महर्षियों ने  देश में महादेवजी की आराधना करते हुए एक महान् यज्ञ का आयोजन किया। वह यज्ञ जब आरम्भ हुआ, तब महर्षियों को सर्वथा आश्चर्यजनक जान पड़ा। तदन्तर समय बीतने पर जब प्रचुर दक्षिणाओं से युक्त वह यज्ञ समाप्त हुआ, तब ब्रह्मा जी की आज्ञा से वायुदेव स्वयं वहाँ पधारे उनको आया देख दीर्घकालिक यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले वे मुनि ब्रह्माजी की बात को याद करके अनुपम हर्ष का अनुभव करने लगे। उन सबने उठकर आकाश जन्मा वायुदेवता को प्रणाम किया और उन्हें बैठने के लिये एक सोने का बना हुआ आसन दिया। वायु देवता उस आसनपर बैठे। मुनियों ने उनकी विधिवत् पूजा की। तदनन्तर उन सबका अभिनन्दन करके वे कुशल-मंगल पूछने लगे।

वायुदेवता बोले-ब्राह्मणो! इस महान् यज्ञ का अनुष्ठान पूर्ण होने तक तुम सब लोग सकुशल रहे न? यज्ञहन्ता देवद्रोही दैत्यों ने तुम्हें बाधा तो नहीं पहुँचायी? तुम्हें कोई प्रायश्चिन तो नहीं करना पड़ा ? तुम्हारे यज्ञ में कोई दोष तो नहीं आया? क्या तुम लोगों ने स्तोत्र और शास्त्र, ग्रहों द्वारा देवताओं का तथा पितरों का भलीभाँति पूजन करके यज्ञ-विधिका अनुष्ठान भलीभाँति सम्पन्न किया? इस महायज्ञ की समाप्ति हो जाने पर अब आप लोग क्या करना चाहते हैं?

हमारे जीवन में उत्तम व्रत का फल क्या है? हमारे पालनकर्ता माता-पिता अपने मन से शरीर से जब आराधना करते हैं और एक महान् यज्ञ करते हैं जिससे हमारा जन्म होता है और किसी भी जीव का जन्म, जीवन, और उसका कर्म रूपी यज्ञ जब आरम्भ होता है तो यह सभी को सर्वथा आश्चर्यजनक जान पड़ता है। जीवन का क्रम तदन्तर समय के साथ बीतने पर जब हम वाक्य विद्या, चलना फिरना या कुछ कर्म करके प्रचुर उपलब्धि प्राप्त करते हैं तो यही  आश्चर्यजनक प्रक्रिया से युक्त जीवन का यज्ञ है।

आपके जीवन का दीर्घकालिक यज्ञ का अनुष्ठान कौन सा है? 

आपको जीवन तब प्राप्त होता है जब आप सांस लेना शुरू करते हैं। इस प्रक्रिया के लिए परमेश्वर आज्ञा से पाकर वायुदेव स्वयं आपके शरीर में पधारते हैं। प्राण वायुदेव को आया देख दीर्घकालिक यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले वे सभी अंग प्रत्यंग आपके शरीर में अनुपम हर्ष का अनुभव करने लगते हैं। जब तक आप आकाश जन्मा वायुदेवता की सेवा करते हैं उन्हें अपने शरीर में सम्हाल कर प्रेममय आसन और महत्व देते हुए उनकी विधिवत् पूजा करते रहते हैं उनका बीच बीच में अभिनन्दन भी करना होता है और यहाँ तक की हमें स्वयं के प्राण का कुशल-मंगल भी पूछते रहना चाहिए।यही आपके जीवन का दीर्घकालिक यज्ञ का अनुष्ठान है।  

क्या आपका प्राण देवता दीर्घकालिक यज्ञ और अनुष्ठान करने पर आपको कुछ देते हैं?

अगर आप अपने प्राण देवता के लिए दीर्घकालिक यज्ञ और अनुष्ठान करते हैं तो वह आपसे पूरी तरह से जुड़ जाते हैं। आपका हर पल ख़याल रखते हैं।वायुदेवता के रूप में आपके हर कर्म और क्रिया के उपरांत आपको आभास देते रहते हैं की आप कुशल हैं या नहीं। यहाँ तक की आपको सही-गलत, कुशल और अकुशल होने का भी आभास देते हैं। जब आप कोई भी कार्य करते हैं तो उसमें चुनौती, आपत्ति और बाधा तो होगा ही और इसका आभास भी आपको प्राण देवता करवाते हैं। यह आपको तब पता चलता है जब लगता है की शरीर थक गया, धड़कन तेज हो गयें, मन अब कुछ करना नहीं चाहता है, और तो और वाह्य रूप से जब कोई और व्यक्ति, सामाजिक बंधन, या फिर प्राकृतिक आपदा आपके यज्ञहन्ता देवद्रोही दैत्यों के रूप आते हैं और आपके कर्म यज्ञ को बाधा पहुँचाते है तो उसका आभास भी वायु देवता आपको देते हैं। अगर आपसे जाने अनजाने में कोई गलती हो जाये तो उसका प्रायश्चिन करने का भी ज्ञान आपको प्राण देवता के यज्ञ करने से मिल सकता है। आपके जीवन में या कर्म में  कोई दोष आ जाए या शरीर के अंग में कुछ हो जाये तो आपके श्वसन प्रणाली आपको आगाह कर देती है। अपने प्राण को स्थिरन कर जीवन को सही बनाना चाहिए। आप जीवन में स्तोत्र और शस्त्रग्रहों द्वारा देवताओं का तथा पितरों का भलीभाँति पूजन करके प्राण देवता का दीर्घकालिक यज्ञ, अनुष्ठान भलीभाँति सम्पन्न कीजिए। 

सबसे बड़ा प्रश्न आपके लिए यह है की इस प्राण मय महायज्ञ की समाप्ति हो जाने पर अब आप लोग क्या करना चाहते हैं?

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