रात का समय है।सड़क किनारे एक खंभा खड़ा है। दूर से आपको लगता है —कोई आदमी खड़ा है… शायद कोई खतरनाक व्यक्ति। दिल की धड़कन तेज।कदम रुक गए।मन डर से भर गया। फिर पास जाकर देखा —वह तो सिर्फ एक खंभा था। डर कहाँ गया?भागा नहीं…बस समझ आया। आज आत्मबोध का विचार इसी रहस्य को […]
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सचेतन- 44 –आत्मबोध “जिसे खोज रहे हो, वह पहले से तुम्हारे पास है”
क्या आपने कभी चश्मा सिर पर रखकर पूरे घर में उसे ढूँढा है? या गले में पड़ी चेन को खोजते-खोजते घबरा गए हैं? भागते रहे…घबराते रहे…और अचानक किसी ने कहा —“अरे, यह तो तुम्हारे पास ही है!” आज आत्मबोध का विचार भी यही कहता है —आत्मा कभी खोई ही नहीं थी। बस भूल गए थे। […]
सचेतन- 42 –आत्मबोध “ज्ञान की आग कैसे जले?”
क्या आपने कभी सोचा है… हम जानते तो बहुत कुछ हैं,फिर भी भीतर अँधेरा क्यों रहता है? किताबें पढ़ते हैं, प्रवचन सुनते हैं,मंत्र भी जानते हैं…फिर भी डर, गुस्सा, असुरक्षा क्यों नहीं जाती? आज का आत्मबोध – एक अद्भुत उदाहरण देता है। वह कहता है —ज्ञान अपने आप नहीं जलता।उसे रगड़ना पड़ता है। और जब […]
सचेतन- 41 –आत्मबोध “तुम जानने वाले नहीं… तुम स्वयं प्रकाश हो”
क्या आपने कभी सोचा है…कि जो सब कुछ जान रहा है…क्या उसे भी कोई जान सकता है? आप किताब पढ़ते हैं…आप सोचते हैं…आप महसूस करते हैं… लेकिन जो इन सबको देख रहा है —वह कौन है? आज आत्मबोध के विचार मेंएक बहुत बड़ा रहस्य खोलते हैं। कहते हैं की —आत्मा में “जानने वाला”, “ज्ञान” और […]
सचेतन- 40 –आत्मबोध – “नाम–रूप से परे, चिदानन्द में स्थित होना”
क्या आत्मज्ञान पाने के बादइंसान सब कुछ छोड़ देता है? क्या उसे शरीर, संसार, रिश्ते—सब त्यागकर कहीं अलग बैठ जाना पड़ता है? आत्मबोध में आज का यह विचारएक बहुत ही गलतफहमी को साफ करता है। शंकराचार्य कहते हैं—ज्ञानी भागता नहीं है, वह भ्रम से मुक्त हो जाता है। आत्मबोध का श्लोक 40 कहता है— जो […]
सचेतन- 38 –आत्मबोध – साधना से साक्षात्कार की ओर
“ध्यान कोई तकनीक नहीं, एक परिपक्व स्थिति है” क्या आपने कभी यह महसूस किया है किआप ध्यान करना चाहते हैं,लेकिन मन बैठने को तैयार ही नहीं होता? शरीर बैठ जाता है,आँखें बंद हो जाती हैं,पर मन बाहर ही भटकता रहता है। आत्मबोध में आज का यह विचारहमें एक बहुत स्पष्ट बात सिखाता है— 👉 ध्यान […]
सचेतन- 37 –आत्मबोध – “निरंतर अभ्यास ही अज्ञान की बीमारी की औषधि है”
क्या आपने कभी महसूस किया है किआप सही बात समझते हैं…फिर भी वही पुरानी बेचैनी,वही प्रतिक्रिया,वही डर लौट आता है? हम कहते हैं—“मैं आत्मा हूँ” “मैं ब्रह्म हूँ” लेकिन ज़रा-सी परिस्थिति बदलते हीहम फिर वही पुराने “मैं” बन जाते हैं। आत्मबोध में आज का विचारयही प्रश्न उठाता है—समझ आ जाने के बाद भी मन अशांत […]
सचेतन- 35 –आत्मबोध – “मैं आकाश के समान हूँ”
क्या आपने कभी ध्यान दिया है— आपके जीवन मेंलोग आते हैं, जाते हैं…परिस्थितियाँ बदलती हैं…सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं… लेकिन फिर भीआपके भीतर कहींकुछ ऐसा हैजो इन सबके बीचबिलकुल शांत बना रहता है? आत्मबोध के आज के विचार में हम बात करेंगे कीयही मौन सत्य की ओर इशारा करता है— “मैं आकाश के समान हूँ।” शंकराचार्य […]
सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते
क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपके अपने ही विचारआपको इधर-उधर पटकते रहते हैं? कभी डर,कभी चिंता,कभी भविष्य की टेंशन,तो कभी अतीत की यादें। मन जैसे एक तूफ़ान बन जाता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ किइस तूफ़ान के बीच भीएक ऐसी जगह हैजहाँ पूरी शांति है? आत्मबोध का यह प्रसंगयही जगह दिखाता है। […]
सचेतन- 29 आपकी चेतना एक स्वयं-प्रकाशित सूर्य है
क्या आपने कभी रुककर यह सोचा है—कि आपकी आँखों से जो देख रहा है,वो कौन नहीं… बल्कि क्या है? हम पूरी ज़िंदगी यह मानकर चलते हैंकि हम एक शरीर के अंदर बैठे हुएएक छोटे से इंसान हैं—जो बाहर की दुनिया को देख रहे हैं। जैसे हम एक छोटी-सी मोमबत्ती हों,और दुनिया बहुत बड़ी और अँधेरी। […]
