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सचेतन:बुद्धचरितम्-6 स्त्रीविघातन

स्त्रीविघातन (Renunciation of Women): यह सर्ग बुद्ध की महल की स्त्रियों और उनके प्रति उनकी अनासक्ति का वर्णन करता है।अभिनिष्क्रमण (The Great Renunciation): बुद्ध के महल छोड़ने और संन्यासी जीवन को अपनाने का वर्णन। Renunciation रिˌनन्‌सिˈएश्‌न्‌ यानी किसी वस्‍तु या विश्‍वास को औपचारिक रूप से त्‍याग देना; परित्‍यागबुद्ध के जीवन की एक रोचक घटना यह […]

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सचेतन:बुद्धचरितम्-5 “संवेगोत्पत्तिः

संवेगोत्पत्तिः (मोहभंग) (The Genesis of Disenchantment): बुद्ध के मन में वैराग्य की उत्पत्ति का वर्णन है, जब उन्होंने वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु का सामना किया।”मोहभंग” का अर्थ है भ्रांति का दूर होना, अज्ञान का नाश होना या निराशा की भावना। यह तब होता है जब किसी की उम्मीदें पूरी नहीं होती हैं या जब कोई […]

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सचेतन:बुद्धचरितम्-4 “अन्तःपुरविहार”

शाक्यराज के राज्य में एक बालक का जन्म हुआ जिसे देखकर सभी लोगों के मन में बड़ी खुशी और उमंग भर गई। बालक के जन्म के साथ ही राज्य में संपत्ति और समृद्धि अपने आप बढ़ने लगी, जैसे बरसात के पानी से नदी का जलस्तर बढ़ जाता है। धन-धान्य, हाथी, घोड़े सब कुछ बढ़ने लगे […]

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सचेतन:बुद्धचरितम्-2: “भगवत्प्रसूतिः

“बुद्धचरितम्” संस्कृत का एक प्रसिद्ध महाकाव्य है, जिसे महान कवि अश्वघोष ने रचा। यह महाकाव्य गौतम बुद्ध के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधारित है। इसमें बुद्ध के जन्म से लेकर उनके बोधिसत्व प्राप्ति तक के महत्वपूर्ण प्रसंगों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस महाकाव्य की शैली वाल्मीकि रामायण से मिलती-जुलती है, जो इसे […]

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सचेतन:बुद्धचरितम्-3: “भगवत्प्रसूतिः

आदि से अनंत तक, सृष्टि के हर एक पल में कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो अमरता को छू जाती हैं। “भगवत्प्रसूतिः” सर्ग ऐसी ही एक दिव्य गाथा का वर्णन करता है, जिसमें महान गौतम बुद्ध के जन्म की घटनाएँ शामिल हैं। यह कथा हमें वह समय सुनाती है जब इक्ष्वाकुवंश के शाक्य राज्य में […]

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सचेतन:बुद्धचरितम्-1

“बुद्धचरितम्” का कथानक वास्तव में गौतम बुद्ध के जीवन और उपदेशों पर आधारित है, जिसे अश्वघोष ने कविता के रूप में गाया है। इस महाकाव्य की कथावस्तु बुद्ध के जीवन के विभिन्न प्रसंगों से प्रेरित है, जिनमें उनका जन्म, युवावस्था, वैराग्य, बोधिप्राप्ति, उपदेश काल, और महापरिनिर्वाण शामिल हैं। कथानक के स्रोत: महापरिनिर्वाण सूत्र का अर्थ […]

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सचेतन: ज्ञान योग-6: माया की भूमिका

माया एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘जो नहीं है’ या ‘भ्रम’। अद्वैत वेदांत के अनुसार, ब्रह्म ही सत्य है, जो कि एक अनंत, अव्यक्त, और निराकार सत्ता है। माया उस पर्दे की तरह है जो ब्रह्म और जीवात्मा के बीच में होती है, जिससे जीवात्मा खुद को ब्रह्म से अलग और भिन्न […]

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सचेतन: ज्ञान योग-5: जीवन की सच्ची समझ हासिल करने के लिए भ्रम को पार करना

भारतीय दर्शन में जीवन की सच्ची समझ को हासिल करने के लिए भ्रम को पार करने की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रक्रिया में माया और अविद्या के भ्रम को समझना और उन्हें पार करना शामिल है। यह प्रक्रिया व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है, जिससे वह जीवन की गहराई और इसके असली […]

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सचेतन: ज्ञान योग-4: मायावाद – भ्रम का स्वरूप

“अपनी प्रकृति” और “मायावाद” दोनों शब्द भारतीय दर्शन में गहराई से उलझे हुए संकल्पनाएं हैं, जिन्हें समझने के लिए इनके मूल अर्थों पर विचार करना जरूरी है। अपनी प्रकृति “अपनी प्रकृति” का अर्थ है किसी व्यक्ति की वह बुनियादी या मूलभूत प्रकृति जो उसके व्यवहार और निर्णयों को निर्देशित करती है। यह प्रकृति संस्कृतियों, व्यक्तिगत […]

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सचेतन: ज्ञान योग-३: अपनी प्रकृति का मूल्यांकन करें

नमस्कार दोस्तों, कल हमने देखा कि स्वामी विवेकानंद ने ज्ञान योग के मार्ग को कैसे समझाया। आज हम बात करेंगे कि आप अपनी असली प्रकृति को कैसे पहचान सकते हैं। इन पहलुओं को समझने से आप अपनी असली प्रकृति के करीब पहुंच सकते हैं। आज हम बात करेंगे  मूल्य और विश्वास (Values and Beliefs): आध्यात्मिक […]