मैं पूरी ज़िंदगी एक ही लाइन पर जी रहा था— “अगर कुछ ग़लत हो गया तो?” यह एक छोटा-सा सवाल था,लेकिन यही सवालहर मौके को डर में बदल देता था। मैं शरीर से तो सामने मौजूद रहता था,लेकिन मेरा मनहज़ारों ऐसे भविष्य में जी रहा होता थाजो अभी आए ही नहीं थे। लेकिन अगर मैं […]
Category: Gyan-Yog ज्ञान योग
सचेतन- 26 सबसे बड़ा झूठ जो आपका मन हर पल आपसे बोलता है
क्या हो अगरआपको बताया गया सबसे बड़ा झूठकिसी और ने नहीं…आपके अपने मन ने बताया हो? और वो भी—हर सेकंड।हर पल। वो आवाज़ जो कहती है—“मैं सोच रहा हूँ।”“मैं कर रहा हूँ।”“मैं देख रहा हूँ।” लेकिन एक पल रुककर सोचिए—अगर यह “मैं” ही असली न हो तो? अगर यह सिर्फ़ एक नक़ली पहचान हो—जो उस […]
सचेतन- 25 सबसे बड़ा झूठ जो आप रोज़ खुद से बोलते हैं
क्या आप जानते हैंकि आप हर दिन खुद से एक झूठ बोलते हैं? एक ऐसा झूठजो आपको समझदार, स्मार्टऔर कंट्रोल में महसूस कराता है— लेकिन असल मेंयही झूठआपके ज़्यादातर दुखों और संघर्षों की जड़ है। और वो झूठ है— “मैं जानता हूँ।” …. ये तीन छोटे शब्दबहुत मामूली लगते हैं, है न? लेकिन क्या आपने […]
सचेतन- 24: आप पहले से ही मुक्त हैं — लेकिन एक भ्रम में जी रहे हैं
ज़रा यह कल्पना कीजिए— अगर जिस पिंजरे में आप खुद को क़ैद महसूस करते हैं,उसमें सलाखें ही न हों? अगर दरवाज़ाशुरू से ही खुला हो? अँधेरे कमरे मेंज़मीन पर पड़ी एक चीज़ को देखकरआप डर से काँप उठते हैं—साँप है! दिल तेज़ धड़कता है।साँस रुक-सी जाती है। और तभीकोई बत्ती जला देता है। वह साँप […]
सचेतन- 17: आत्मा हर जगह है, फिर भी हमें दिखती क्यों नहीं?
नमस्कार मित्रों,आज सचेतन में एक बहुत ही सरल,पर बहुत गहरी बात पर बातचीत करेंगे। एक सवाल से शुरू करते हैं— क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है किसब कुछ होते हुए भीकुछ अधूरा-सा है? लोग हैं, काम है,हँसी भी है…फिर भी भीतर कहींएक दूरी-सी,एक खालीपन-सा। हम सोचते हैं—शायद कुछ मिल जाए,तो यह भर जाएगा।कोई रिश्ता,कोई […]
सचेतन- 14: आत्मबोध की यात्रा – जब आप सोते हैं, तब आप क्या होते हैं?
“कल रात आप सोए थे…ना कोई विचार था,ना कोई चिंता,ना कोई डर,ना कोई पहचान। लेकिन सुबह उठकर आपने कहा—‘मैं बहुत अच्छी नींद सोया।’ अब ज़रा सोचिए—जब सब कुछ सो गया था,तब यह ‘मैं’ कौन था जो नींद का अनुभव कर रहा था?” अनाद्यविद्यानिर्वाच्या कारणोपाधिरुच्यते। उपाधित्रितयादन्यमात्मानमवधारयेत्॥ बहुत सरल अर्थ जो अज्ञानशुरुआत से चला आ रहा है,जिसे […]
सचेतन- 13: आत्मबोध की यात्रा – “मेरे अनुभव कहाँ से आते हैं?”
“कभी आपने कहा है—मुझे भूख लगी है…मुझे डर लग रहा है…मैं बहुत खुश हूँ…मुझे गुस्सा आ रहा है… लेकिन कभी आपने खुद से पूछा—ये सब महसूस कौन कर रहा है? क्या आत्मा को भूख लगती है?क्या आत्मा डरती है?या ये सब किसी और से आ रहा है?” पञ्चप्राणमनोबुद्धिदशेन्द्रियसमन्वितम्। अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं भोगसाधनम्॥ सरल अर्थ हमारे अंदरसाँस, […]
सचेतन- 12: आत्मबोध की यात्रा – “यह शरीर मेरा घर है, मैं घर नहीं हूँ”
“कभी आपने अपने शरीर से कहा है—तुम थक गए हो…तुम बीमार हो…तुम बूढ़े हो रहे हो… लेकिन कभी आपने खुद से पूछा—क्या मैं ही यह शरीर हूँ? अगर शरीर बदलता है,बीमार होता है,थकता है…तो क्या मैं भी बदल जाता हूँ? आज की बात बहुत छोटी है,लेकिन जीवन को हल्का कर देने वाली है।” पञ्चीकृतमहाभूतसंभवं कर्मसंचितम्। […]
सचेतन- 11: आत्मबोध की यात्रा – “मैं कौन हूँ? – पानी, रंग और मैं”
“अगर मैं आपसे पूछूँ—आप कौन हैं? आप कहेंगे—मैं इस नाम का हूँ…मैं इस काम का हूँ…मैं इस परिवार से हूँ… लेकिन अगर ये सब एक दिन हट जाए—नाम… काम… पहचान…तो क्या आप तब भी होंगे? आज की बात बहुत छोटी है…लेकिन दिल को छू लेने वाली है। आज हम जानेंगे—हम सच में कौन हैं।” नानोपाधिवशादेव […]
सचेतन- 10: आत्मबोध की यात्रा – “उपाधियाँ बदलती हैं— मैं नहीं”
“कभी आपने सोचा है—हम इतने अलग क्यों दिखते हैं? मेरा शरीर अलग, आपका अलग…मेरी उम्र अलग, आपकी अलग…मेरी कहानी अलग, आपकी अलग… लेकिन क्या मैं सच में अलग हूँ?या अलग-अलग सिर्फ़ ‘कवर’ हैं?” यथाकाशो हृषीकेशो नानोपाधिगतो विभुः। तद्भेदाद्भिन्नवद्भाति तन्नाशे केवलो भवेत्॥१०॥ सरल अर्थ “जैसे आकाश एक होते हुए भीअलग-अलग घड़ों/कमरों (उपाधियों) के कारणअनेक-सा प्रतीत होता […]
