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सचेतन- 36 –आत्मबोध –  “मैं कौन हूँ?”

हम जीवन भर एक ही प्रश्न से जूझते रहते हैं—“मैं कौन हूँ?” कभी हम स्वयं को शरीर मान लेते हैं,कभी मन,कभी रिश्ते,कभी सफलता या असफलता। लेकिन आत्मबोध का यह अंतिम श्लोकहमें सीधा, स्पष्ट और निर्भय उत्तर देता है— “तुम वही हो, जिसे तुम खोज रहे थे।” शंकराचार्य कहते हैं— मैं नित्य शुद्ध हूँ, सदा मुक्त […]

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सचेतन- 35 –आत्मबोध – “मैं आकाश के समान हूँ”

क्या आपने कभी ध्यान दिया है— आपके जीवन मेंलोग आते हैं, जाते हैं…परिस्थितियाँ बदलती हैं…सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं… लेकिन फिर भीआपके भीतर कहींकुछ ऐसा हैजो इन सबके बीचबिलकुल शांत बना रहता है? आत्मबोध के आज के विचार में हम बात करेंगे कीयही मौन सत्य की ओर इशारा करता है— “मैं आकाश के समान हूँ।” शंकराचार्य […]

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सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात

सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात क्या आपने कभी सोचा है—इतना ध्यान करने के बाद भीमन क्यों शांत नहीं होता? क्यों भीतर कहीं यह भावना बनी रहती है—“अभी कुछ और करना बाकी है…अभी मुक्ति दूर है…” आत्मबोध का आज का विचारयहीं एक बहुत गहरी बात कहता है— मुक्ति पाने की ज़रूरत नहीं […]

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सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते

क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपके अपने ही विचारआपको इधर-उधर पटकते रहते हैं? कभी डर,कभी चिंता,कभी भविष्य की टेंशन,तो कभी अतीत की यादें। मन जैसे एक तूफ़ान बन जाता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ किइस तूफ़ान के बीच भीएक ऐसी जगह हैजहाँ पूरी शांति है? आत्मबोध का यह प्रसंगयही जगह दिखाता है। […]

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सचेतन- 25 सबसे बड़ा झूठ जो आप रोज़ खुद से बोलते हैं

क्या आप जानते हैंकि आप हर दिन खुद से एक झूठ बोलते हैं? एक ऐसा झूठजो आपको समझदार, स्मार्टऔर कंट्रोल में महसूस कराता है— लेकिन असल मेंयही झूठआपके ज़्यादातर दुखों और संघर्षों की जड़ है। और वो झूठ है— “मैं जानता हूँ।” …. ये तीन छोटे शब्दबहुत मामूली लगते हैं, है न? लेकिन क्या आपने […]

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सचेतन- 23: वह प्राचीन पहचान की भूल, जो आपके सारे दुःख की जड़ है

क्या कभी ऐसा लगता हैकि आपका मन ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष बन गया है? विचार रुकते नहीं…चिंताएँ पीछा नहीं छोड़तीं…और भीतर एक शोर लगातार चलता रहता है। हम शांति की तलाश मेंकभी रिश्ते बदलते हैं,कभी काम,कभी जगहें। पर भीतर का शोरकुछ देर शांत होकरफिर लौट आता है। तो प्रश्न यह है—गलत क्या है? क्या […]

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सचेतन- 17:  आत्मा हर जगह है, फिर भी हमें दिखती क्यों नहीं?

नमस्कार मित्रों,आज सचेतन में एक बहुत ही सरल,पर बहुत गहरी बात पर बातचीत करेंगे। एक सवाल से शुरू करते हैं— क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है किसब कुछ होते हुए भीकुछ अधूरा-सा है? लोग हैं, काम है,हँसी भी है…फिर भी भीतर कहींएक दूरी-सी,एक खालीपन-सा। हम सोचते हैं—शायद कुछ मिल जाए,तो यह भर जाएगा।कोई रिश्ता,कोई […]

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सचेतन- 16:  आत्मबोध की यात्रा -आप सिर्फ एक छिलका हैं असली चावल तो अंदर है

आप सोचते हैं कि आप अपने विचारों को कंट्रोल करते हैं, है ना? लेकिन क्या हो, अगर मैं कहूँ कि आपके विचार, आपकी भावनाएँ, और यहाँ तक कि आपका ये शरीर… आप हैं ही नहीं? सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा, पर क्या हो अगर वो, जिसे आप ‘मैं’ समझते हैं, वो असल में आप हो […]

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सचेतन- 42 वेदांत सूत्र: साधना-चतुष्टय — मोक्ष और आत्मज्ञान के लिए चार आवश्यक योग्यताएँ

नमस्कार दोस्तों,आप सुन रहे हैं सचेतन,जहाँ हम जीवन को भीतर से समझने की कोशिश करते हैं—शांति, विवेक और आत्मज्ञान के रास्तों पर चलने की प्रेरणा लेते हैं। आज का विषय है—“साधना-चतुष्टय: मोक्ष या आत्मज्ञान की राह में ज़रूरी चार योग्यताएँ।” ये चार योग्यताएँ सिर्फ़ आध्यात्मिक साधना के लिए ही नहीं,बल्कि रोज़मर्रा के जीवन को सुंदर, […]

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सचेतन- 03 महापुरुषों का संग – आत्मज्ञान की सीढ़ी

महापुरुषों का संग।अगर हमें जीवन का सत्य जानना है, तो हमें किसी ज्ञानी गुरु के पास जाना होगा, जिससे हम यह अनुभव कर सकें कि — हम ब्रह्म हैं, हम वही चेतना हैं जो सब में व्याप्त है।गुरु की कृपा से ही अज्ञान मिटता है। महापुरुषों का संग – आत्मज्ञान की सीढ़ी अगर हमें इस […]