जब भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ, तो उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया गया। उनकी अस्थियों (धातु), भस्म और कलश को सम्मानपूर्वक कई भागों में विभाजित किया गया। इन पवित्र अवशेषों को विभिन्न स्थानों पर श्रद्धा और भक्ति से स्थापित किया गया। इस प्रकार पृथ्वी पर कुल दस पवित्र स्तूपों का निर्माण हुआ। अब […]
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सचेतन- बुद्धचरितम् 30 बुद्ध का अंतिम उपदेश और निर्वाण
सुभद्र की भक्ति और बुद्ध का आशीर्वाद बुद्ध के निर्वाण के अंतिम समय में एक त्रिदण्डी मुनि, सुभद्र, उनसे मिलने आए। आनन्द के संकोच के बावजूद, बुद्ध ने उन्हें आने दिया और करुणा से धर्म का मार्ग समझाया — एक ऐसा मार्ग जो दुखों से मुक्ति दिलाता है और निर्वाण तक पहुँचाता है। दुख से […]
सचेतन- बुद्धचरितम् 26 बुद्ध का तत्वज्ञान
दुखों से छुटकारा पाने के लिए अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path): यह आठ साधन हैं, जिनसे जीवन में शुद्धि और मुक्ति प्राप्त होती है: सरल शब्दों में निष्कर्ष: जन्म, बुढ़ापा और मृत्यु जैसे दुःख जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं,परंतु बुद्ध ने सिखाया कि इच्छाओं को त्यागकर, सदाचारी जीवन अपनाकर और गहरे ध्यान द्वारा आत्मा को शुद्ध […]
सचेतन- बुद्धचरितम् 24- 21 सर्ग बुद्ध और उनका धर्म-प्रसार
सचेतन- बुद्धचरितम् 24- 21 सर्ग बुद्ध और उनका धर्म-प्रसार भगवान बुद्ध, जिन्हें हम तथागत भी कहते हैं, जब स्वर्ग में अपनी माता और वहाँ के देवताओं को धर्म की दीक्षा दे चुके, तो उन्होंने सोचा कि अब धरती पर चलकर अन्य लोगों को भी सत्य धर्म की शिक्षा दी जाए। “तथागत” शब्द पाली भाषा से […]
सचेतन- बुद्धचरितम् 23- 19-20 सर्ग – बुद्ध का चातुर्मास तक स्वर्ग में रुकना
जब महात्मा बुद्ध ने अपने ज्ञान और उपदेशों से कई शास्त्रज्ञों को जीत लिया, तब वे राजगृह से अपने जन्म स्थान—अपने पिता राजा शुद्धोदन के नगर कपिलवस्तु की ओर लौटे। पुत्र के आने का समाचार सुनकर राजा शुद्धोदन बहुत प्रसन्न हुए। वे नगरवासियों के साथ बुद्ध से मिलने के लिए निकल पड़े। लेकिन जब उन्होंने […]
सचेतन:बुद्धचरितम्-14 कुमारान्वेषणम् – बुद्ध का वन में दृढ़ निश्चय
राजा शुद्धोदन का पुत्र सिद्धार्थ घर छोड़कर संन्यास के लिए वन की ओर चला गया था। यह सुनकर नगर में सब ओर शोक फैल गया। राजा को गहरा दुख हुआ, और उन्होंने अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री और वृद्ध पुरोहित को राजकुमार को ढूँढकर समझाने और वापस लाने के लिए भेजा। मंत्री और पुरोहित चलते-चलते भार्गव […]
सचेतन:बुद्धचरितम्-13 अन्तःपुरविलाप (Lamentation of the Palace):
महल में बुद्ध के जाने के बाद की विलाप का वर्णन। जब राजकुमार सिद्धार्थ ने संन्यास ग्रहण कर वन की ओर प्रस्थान किया, तब उनके प्रिय सारथी छन्दक और उनका घोड़ा कन्धक उन्हें रोकने का पूरा प्रयास करते रहे। लेकिन सिद्धार्थ का संकल्प अडिग था। वे सांसारिक मोह और बंधनों से मुक्त होकर सत्य की […]
सचेतन:बुद्धचरितम्-5 “संवेगोत्पत्तिः
संवेगोत्पत्तिः (मोहभंग) (The Genesis of Disenchantment): बुद्ध के मन में वैराग्य की उत्पत्ति का वर्णन है, जब उन्होंने वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु का सामना किया।”मोहभंग” का अर्थ है भ्रांति का दूर होना, अज्ञान का नाश होना या निराशा की भावना। यह तब होता है जब किसी की उम्मीदें पूरी नहीं होती हैं या जब कोई […]
