“क्या आपको कभी ऐसा लगता है…कि मैं कमज़ोर हूँ, मैं अकेला हूँ, मैं अधूरा हूँ? जैसे जीवन में कुछ ‘कम’ पड़ रहा हो…जैसे मैं ‘सीमित’ हूँ… शंकराचार्य कहते हैं—यह सच नहीं है।यह सिर्फ़ अज्ञान का पर्दा है।” अवच्छिन्न इवाज्ञानात्तन्नाशे सति केवलः। स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेघापायेंऽशुमानिव॥४॥ सरल अर्थ “अज्ञान के कारण आत्मा सीमित-सी लगती है।जब अज्ञान […]
Tag: भ्रम
सचेतन: ज्ञान योग-5: जीवन की सच्ची समझ हासिल करने के लिए भ्रम को पार करना
भारतीय दर्शन में जीवन की सच्ची समझ को हासिल करने के लिए भ्रम को पार करने की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रक्रिया में माया और अविद्या के भ्रम को समझना और उन्हें पार करना शामिल है। यह प्रक्रिया व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है, जिससे वह जीवन की गहराई और इसके असली […]
सचेतन: ज्ञान योग-4: मायावाद – भ्रम का स्वरूप
“अपनी प्रकृति” और “मायावाद” दोनों शब्द भारतीय दर्शन में गहराई से उलझे हुए संकल्पनाएं हैं, जिन्हें समझने के लिए इनके मूल अर्थों पर विचार करना जरूरी है। अपनी प्रकृति “अपनी प्रकृति” का अर्थ है किसी व्यक्ति की वह बुनियादी या मूलभूत प्रकृति जो उसके व्यवहार और निर्णयों को निर्देशित करती है। यह प्रकृति संस्कृतियों, व्यक्तिगत […]
