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सचेतन :83 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: कामदेव का जन्म

#RudraSamhita   श्री शिव पुराण के रूद्र संहिता के इस संवाद में ब्रह्माजी ने मुनिश्रेष्ठ नारद जी को अपने मानसपुत्र तथा सप्तर्षियों में से एक मरीचि जो वायु और कश्यप ऋषि के पिता हैं और उन्होंने कामदेव का नाम कैसे रखा उसके बारे में बताया। ब्रह्मा जी मुनिश्रेष्ठ नारद जी से कहते हैं की हमारे […]

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सचेतन :82 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: पुरुष जन्म लेते ही अपने मन को भी मथने लगते हैं 

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ श्री शिव पुराण के रूद्र संहिता से यह संवाद ब्रह्माजी और मुनिश्रेष्ठ नारद जी के बीच हो रहा है।  ब्रह्मा जी कहते हैं- मुनिश्रेष्ठ हे नारद जी! तदन्नतर मेरे अभिप्राय को जानने वाले मरीचि आदि मेरे पुत्र सभी मुनियों ने उस पुरुष का उचित नाम रखा। दक्ष आदि प्रजापतिओं ने उसका मुंह […]

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सचेतन :81 श्री शिव पुराण- हम वास्तव में कौन हैं? 

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं  के बारे में केशव ने बताया है की काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।   द्वेष का अर्थ है की चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति । वास्तव में राग-द्वेष का अर्थ ‘अहम्’-(मैं-पन-) से है। अहं या […]

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सचेतन :80 श्री शिव पुराण- राग-द्वेष पर विजय पाने के उपाय

मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं के बारे में केशव ने बताया है की -काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।

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सचेतन :79 श्री शिव पुराण- द्वेष से दुःख होता है

केशव के रूप में भगवान श्री कृष्ण ने मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं के बारे में बताया है की -काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।
एक गरीब आत्म छवि होना ईर्ष्या का एक और कारण है। सामान्य और असामान्य: ईर्ष्या सबसे अच्छा दो मुख्य उदाहरण है। परिवार ईर्ष्या, सहोदर स्पर्द्धा ईर्ष्या के इस प्रकार के एक ट्रेडमार्क विशेषता है। असामान्य ईर्ष्या अक्सर, रुग्ण मानसिक रोग, हो गया हो या चिंतित ईर्ष्या के कारण होता है। ईर्ष्या दो लोगों के एक सामाजिक या व्यक्तिगत संबंधों का हिस्सा है।
द्वेष का अर्थ है की चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति । विशेष— योगशास्त्र में द्वेष उस भाव को कहा गया है जो दुःख का साक्षात्कार होने पर उससे या उसके कारण से हटने या बचने की प्रेरणा करता है। द्वेष का भाव चिढ़, शत्रुता, वैर से है।

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सचेतन :78 श्री शिव पुराण-  ईर्ष्या मानवीय रिश्तों में एक विशिष्ट अनुभव है।

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ केशव के रूप में भगवान श्री कृष्ण ने मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं  के बारे में बताया है की -काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।   लोभ: मनुष्य के अंदर वस्तु के अभाव की भावना होते ही प्राप्ति, सान्निध्य या रक्षा की […]

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सचेतन :77 श्री शिव पुराण- मनुष्य के अंदर के छह सबसे बड़े शत्रु (प्रेम से मुक्ति)

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ हमारे जीवन का सत्य यह है की जब तक मनुष्य भक्तिभाव से सनातन यानी सत्य की ओर नहीं झुक जाता है, तब तक ही उसे दरिद्रता, दुख, रोग और शत्रु जनित पीड़ा, ये चारों प्रकार के पाप दुखी करते हैं।  दरिद्रता मनुष्य के भीतर पनपने वाला एक ऐसा हीनभाव है, जो औरों […]

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सचेतन :76 श्री शिव पुराण- मनुष्य के अंदर के छह सबसे बड़े शत्रु

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ हमारे जीवन का सत्य यह है की जब तक मनुष्य भक्तिभाव से सनातन यानी सत्य की ओर नहीं झुक जाता है, तब तक ही उसे दरिद्रता, दुख, रोग और शत्रु जनित पीड़ा, ये चारों प्रकार के पाप दुखी करते हैं।  दरिद्रता मनुष्य के भीतर पनपने वाला एक ऐसा हीनभाव है, जो औरों […]

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सचेतन :74-75 श्री शिव पुराण- मनुष्य के अंदर के छह सबसे बड़े शत्रु

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ भगवान शिव की भक्ति सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है तथा समस्त मनोवांछित फलों को देने वाली है। यह दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश करने वाली है। सनातन का अर्थ है जो शाश्वत हो, सदा के लिए सत्य हो। जिन बातों का शाश्वत महत्व हो वही […]

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सचेतन :74 श्री शिव पुराण- शिव की भक्ति से दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश होता है।-2

#RudraSamhita   भगवान शिव की भक्ति सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है तथा समस्त मनोवांछित फलों को देने वाली है। यह दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश करने वाली है। जब तक मनुष्य भगवान शिव का पूजन नहीं करता और उनकी शरण में नहीं जाता, तब तक ही उसे दरिद्रता, […]