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सचेतन 115 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  तन्नो रुद्र: प्रयोदयात्

आत्मा, परमात्मा या फिर स्वयं की खोज का अभ्यास ही रूद्र है  भगवान शिव के पूर्व मुख का नाम तत्पुरुष है। तत्पुरुष का अर्थ है अपने आत्मा में स्थित रहना। पूर्वमुख का नाम ‘तत्पुरुष’ है। तत्पुरुष वायुतत्व के अधिपति है। तत्पुरुष तपोमूर्ति हैं। भगवान शिव का ‘तत्पुरुष’ नामक तीसरा अवतार पीतवासा नाम के इक्कीसवें कल्प […]

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सचेतन 114 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  तत्पुरुष रूप में स्वतंत्रता का आधार 

हम चाहे किसी भी धर्म, वंश, जाति, लिंग, संप्रदाय के हों और यहाँ तक की जन्‍म का स्‍थान भी भिन्न भिन्न हो अगर हमारे साथ भेदभाव का निषेध होता है तो यही समान अवसर कहलता है। अगर हम अपनी भाषा और विचार को स्‍वतंत्रता रूप से प्रकट कर सकते हैं कहीं  आने-जाने, निवास करने और […]

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सचेतन 113 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  तत्पुरुष रूप में स्वतंत्रता का आधार 

भगवान शिव का तत्पुरुष स्वरूप हमारे स्वतंत्र होने के स्वरूप का बोध कराता है। जहां से हम बंधन मुक्त हो कर जीना शुरू करते हैं। और यह पूर्णतया मानसिक रूप से स्वतंत्र होने का सूचक है। हम सभी का व्यक्तित्व भिन्न है। यही हर व्यक्तियों में पाई जाने वाली असमानता भी है। एक व्यक्ति का […]

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सचेतन 112 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  तत्पुरुष रूप में कर्म और करण एक स्वतंत्र और आध्यात्मिक जीवन का बोध दिलाता है।

भगवान शिव का तत्पुरुष स्वरूप हमारे स्वतंत्र स्वरूप का बोध है। जहां हम बंधन मुक्त हो कर जीते हैं। बंधन मुक्ति का रास्ता हमारे कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, संबंध और अधिकरण से हो कर जाता है। हम सभी को स्वतंत्रता चाहिए लेकिन कैसी? एक बार भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक गांव से दूसरे […]

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सचेतन 111 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  तत्पुरुष रूप से हमारे सुख और दुख के कारण का बोध होता है।

मनुष्य जो कुछ भी करता है उससे कोई फल उत्पन्न होता है। यह फल शुभ, अशुभ अथवा दोनों से भिन्न होता है। फल का यह रूप क्रिया के द्वारा स्थिर होता है। दान शुभ कर्म है पर हिंसा अशुभ कर्म है। कभी कभी यह बात इस भावना पर आधारित होता है कि क्रिया सर्वदा फल […]

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सचेतन 110 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  तत्पुरुष असाधारण कार्य के माध्यम होते हैं। 

कर्म के परिणाम या उसके अभाव को नियंत्रित करने में दैवीय शक्ति की भूमिका के बारे में हिंदू धर्म में कई भिन्न प्रकार के दर्शन हैं, कुछ का स्वरूप आज भी वर्तमान है और कुछ ऐतिहासिक हैं। इस पृथ्वी पर बहुत से ऐसे प्रमुख मत हैं, जिनका मानना है कि ईश्वर, परमात्मा, अपनी भूमिका निभा […]

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सचेतन 109 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  ईश्वर बहुत ही न्यायपूर्ण है-2

कर्म का विभाजन हमारे आध्यात्मिक जीवन से होता है। हम क्या संचय करना चाहते हैं और उस कर्म के फल का ‘प्रारब्ध’ कैसा होगा जिससे हमारे वर्तमान कर्म ‘क्रियमाण’ का निर्धारण हो सकेगा।  पशु और छोटे बच्चे नए कर्म की रचना नहीं करते हैं (इसलिए अपने भावी नियति को प्रभावित नहीं कर सकते हैं) क्योंकि […]

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सचेतन 108 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  ईश्वर बहुत ही न्यायपूर्ण है 

कर्म का विभाजन हमारे आध्यात्मिक जीवन से होता है। हम क्या संचय करना चाहते हैं और उस कर्म के फल का ‘प्रारब्ध’ कैसा होगा जिससे हमारे वर्तमान कर्म ‘क्रियमाण’ का निर्धारण हो सकेगा।  पशु और छोटे बच्चे नए कर्म की रचना नहीं करते हैं (इसलिए अपने भावी नियति को प्रभावित नहीं कर सकते हैं) क्योंकि […]

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सचेतन 107 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- कर्म का विभाजन हमारे आध्यात्मिक जीवन से होता है

पृथ्वी पर जन्म और मृत्यु का चक्र 84 लाख योनियों में चलता है और उनमें से सिर्फ एक मनुष्य योनि है। केवल मनुष्य के रूप में, सही समय पर सही कर्म कर हम अपनी नियति के बारे में कुछ करने की स्थिति में होते हैं। सकारात्मक कर्मों, शुद्ध विचारों, प्रार्थना, मंत्र और ध्यान के माध्यम […]

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सचेतन 106   : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  कर्म-संग्रह

हम चार तरीके से कर्म करते हैं:- “शरीर, वाणी और मन से की गयी क्रिया कर्म है।” मनस, वाचा, कार्मण तीन संस्कृत शब्द हैं। जिसका अर्थ आमतौर पर यह लगाया जाता है कि व्यक्ति को उस स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए जहां उसके विचार, वाणी और कार्यों का आपसी संयोग हो। ‘करणं […]