“कर्म” का शाब्दिक अर्थ है “काम” या “क्रिया” और मोटे तौर पर यह निमित्त और परिणाम तथा क्रिया और प्रतिक्रिया कर्म कहलाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार कर्म हमारी चेतना को नियंत्रित करता है।कर्म भाग्य नहीं है। आदमी मुक्त होकर कर्म करता जाए, इससे उसके भाग्य की रचना होती रहेगी। वेदों के अनुसार, यदि हम […]
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सचेतन 104 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- तत्पुरुष रूप कर्म, करण , सम्प्रदान, अपादान और सम्बन्ध को दर्शाता है -2
भगवद गीता के अध्याय २ का ४७ वा श्लोक है, जब अर्जुन रणभूमि पर अपने सगे सम्बन्धी को देखकर, युद्ध छोड़ देना चाहते है, तब भगवान उसे गीता का उपदेश देते हैं जिसको सम्पूर्ण गीता का सार माना जाता है। कहते हैं की अगर आप इस तत्व को जान लोगे तो आपको दूसरा कुछ समझने […]
सचेतन 103 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- तत्पुरुष रूप कर्म, करण , सम्प्रदान, अपादान और सम्बन्ध को दर्शाता है
भगवद गीता के अध्याय २ का ४७ वा श्लोक है, जब अर्जुन रणभूमि पर अपने सगे सम्बन्धी को देखकर, युद्ध छोड़ देना चाहते है, तब भगवान उसे गीता का उपदेश देते हैं जिसको सम्पूर्ण गीता का सार माना जाता है। कहते हैं की अगर आप इस तत्व को जान लोगे तो आपको दूसरा कुछ समझने […]
सचेतन 102: श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- तत्पुरुष अवतार
हम जीवन को सार्थकता बना कर क्या पाना चाहते हैं? श्वेतलोहित नामक उन्नीसवें कल्प में शिवजी का सद्योजात नामक अवतार हुआ है। यही शिवजी का प्रथम अवतार कहा जाता है। सद्योजात का अर्थ है की जिसने अभी या कुछ ही समय पहले जन्म लिया हो। यह ऐसे भाव को दर्शाता है की मानो एक माँ […]
सचेतन 101: श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- आत्मज्ञान और ब्रह्मविद्या
वामदेव नामक योगी शिव जी के भक्त थे। उन्होंने अपने समस्त शरीर पर भस्म धारण कर रखी थी। एक बार एक व्यभिचारी पापी ब्रह्मराक्षस उन्हें खाने के लिए उनके पास पहुँचा। उसने ज्यों ही वामदेव को पकड़ा, उसके शरीर पर वामदेव के शरीर की भस्म लग गयी, अत: भस्म लग जाने से उसके पापों का […]
सचेतन 100: श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- आत्मज्ञान और ब्रह्मविद्या का साक्षात्कार कब से हो सकता है
पिछले अंक में चर्चा किया था की, एक बार दरिद्रता देवी की कृपा के कारण वामदेव ऋषि को आपद धर्म का पालन करना पड़ा और श्येन पक्षी से कहा था की है चाहो तो तुम भी यज्ञ-कुंड की अग्नि में कुत्ते की पके आंते से संतुष्ट हो सकते हो। वामदेव ने कहा मैंने अपने समस्त […]
सचेतन 99: श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- आपद धर्म या आपद्धर्म
रक्त नामक बीसवें कल्प में रक्तवर्ण वामदेव का अवतार हुआ। शिव के इस स्वरूप वामदेव, का संबंध संरक्षण से है। अपने इस स्वरूप में शिव, कवि भी हैं, पालनकर्ता भी हैं और दयालु भी हैं। शिवलिंग के दाहिनी ओर पर मौजूद शिव का यह स्वरूप उत्तरी दिशा की ओर देखता है। वामदेव पर एक बार […]
सचेतन 98:– श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- दरिद्रता देवी की वामदेव पर कृपा
सचेतन 98:– श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- दरिद्रता देवी की वामदेव पर कृपा शिव का वामदेव अवतार वर्तमान में जीने पर जोर देता है। और वर्तमान आपके लिए रुकता नहीं एक क्षण। वैसे महावीर समय का मतलब ही यह कहते हैंः समय का वह हिस्सा जो हमारे हाथ में होता है। वह आखिरी टुकड़ा काल […]
सचेतन :97 श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- वामदेव, समय और कर्म का अवतार है
रक्त नामक बीसवें कल्प में रक्तवर्ण वामदेव का अवतार हुआ। शिव के इस स्वरूप वामदेव, का संबंध संरक्षण से है। संरक्षण कर्म का और सही समय का होना चाहिए। अपने इस स्वरूप में शिव, कवि भी हैं, पालनकर्ता भी हैं और दयालु भी हैं। शिवलिंग के दाहिनी ओर पर मौजूद शिव का यह स्वरूप उत्तरी […]
सचेतन :95 श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- सद्योजात, पृथ्वी तत्व के अवतार
श्वेतलोहित नामक उन्नीसवें कल्प में शिवजी का सद्योजात नामक अवतार हुआ है। यही शिवजी का प्रथम अवतार कहा जाता है।१०००चतुरयुगी का एक कल्प होता है। सद्योजात का अर्थ है की जिसने अभी या कुछ ही समय पहले जन्म लिया हो। यह ऐसे भाव को दर्शाता है की मानो एक माँ नवजात शिशु को बार-बार दुलार […]
