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सचेतन 2.19: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – हनुमान् जी का वायु वेग से गमन 

हनुमान् ने अपने शरीर को अँगूठे के बराबर संकुचित कर लिया और वे उसी क्षण अँगूठे के बराबर छोटे हो गये। देवताओं द्वारा हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा लेने की इक्षा से देवी सुरसा राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान् जी को घेरकर कहा की मैं तुम्हें खाऊँगी क्योंकि  यह वर दिया […]

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सचेतन 2.18: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – सुरसा ने अपने मुँह का विस्तार सौ योजन का किया था

सूर्य सिद्धान्त में 1 योजन 8 किलोमीटर के बराबर होता है  देवताओं द्वारा हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा लेने की इक्षा को  सत्कारपूर्वक देवी सुरसा ने स्वीकार किया और समुद्र के बीच में राक्षसी का रूप धारण किया। वह समुद्र के पार जाते हुए हनुमान् जी को घेरकर उनसे इस प्रकार बोली- […]

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सचेतन 2.17: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – पराक्रम की परीक्षा से स्वयं के शक्ति और ज्ञान का आकलन होता है

देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियों ने हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा सूर्यतुल्य तेजस्विनी नागमाता सुरसा के द्वारा लिया।  हनुमान जी मैंनाक पर्वत से सत्कार पा कहा – मैनाक मुझे भी आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई है मेरा आतिथ्य हो गया और महाबली वांशिरोमणि हनुमान ने अपने हाथ से मैंनाक का स्पर्श किया […]

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सचेतन 2.16: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – प्रत्युपकार करना धर्म है।

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सचेतन 2.15: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – वसुधैव कुटुंबकम का एकमात्र कल्याण की आकांक्षा रखें

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सचेतन 2.14: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – वसुधैव कुटुंबकम का एकमात्र कल्याण की आकांक्षा रखें

क्षीर सागर और मैनाक पर्वत अपना सनातन धर्म समझकर हनुमान जी को विश्राम करने की पेशकश की  समुद्र की आज्ञा पाकर जल में छिपे उस विशालकाय पर्वत मैनाक ने दो ही घड़ी में हनुमान्जी को अपने शिखरों का दर्शन कराया। उस पर्वत के शिखर सुवर्ण मय थे और उन पर किन्नर और बड़े-बड़े नाग निवास […]

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सचेतन 2.13: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – समुद्र में छिपे हुए मैनाक पर्वत का दर्शन

सचेतन 2.13: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – समुद्र में छिपे हुए मैनाक पर्वत का दर्शन  नव वर्ष की शुभकामनाएँ! हमलोग चर्चा कर रहे थे की हनुमान जी उपमान अलंकार हैं क्योंकि आज के युग में वह अप्रत्यक्ष हैं। वह प्रसिद्ध बिन्दु या प्राणी या पर्वत या समुद्र आदि अभी भी मौजूद है जिसके साथ उपमेय रूप […]

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सचेतन 2.12: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – हनुमान जी अप्रत्यक्ष उपमान अलंकार हैं।

हनुमान जी से आप सीख ले कर सिर्फ़ कर्म को विशिष्टता और उत्कृष्टता के साथ करते रहें।  अलंकार चारुत्व को कहते हैं। यह हनुमान जी  का सौंदर्य, चारुत्व, काव्य रूप में उनकी शोभा का धर्म ही अलंकार का व्यापक अर्थ है। यह अलंकार को महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में प्राणभूत तत्त्व के रूप में लिखा […]

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सचेतन 2.11: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – उत्कृष्टता के प्रदर्शन में विशेष उपमा होती है

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सचेतन 2.10: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – आपके कार्य में उत्कृष्टता स्वाभाविक होनी चाहिये।

हनुमान्जी की पिंगल नेत्र चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होती है। आप को विचार करना है की अगर आपका लक्ष्य और रणनीति सही है तो हर कोई आपके साथ चलने को तैयार है और आपको साथ देंगे।  मेघ के समान विशालकाय हनुमान्जी अपने साथ खींचकर आये हुए वृक्षों के अंकुर और कोर सहित फूलों से […]