सचेतन:बुद्धचरितम्-14 कुमारान्वेषणम् – बुद्ध का वन में दृढ़ निश्चय
राजा शुद्धोदन का पुत्र सिद्धार्थ घर छोड़कर संन्यास के लिए वन की ओर चला गया था। यह सुनकर नगर में सब ओर शोक फैल गया। राजा को गहरा दुख हुआ, और उन्होंने अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री और वृद्ध पुरोहित को राजकुमार को ढूँढकर समझाने और वापस लाने के लिए भेजा।
मंत्री और पुरोहित चलते-चलते भार्गव मुनि के आश्रम पहुँचे। उन्होंने मुनि से पूछा, “हे मुनिवर! हम उस राजकुमार की खोज में हैं जो जरा और मृत्यु के भय से आपकी शरण में आया था। क्या आप बता सकते हैं, वह अब कहाँ है?”
मुनि भार्गव ने उत्तर दिया, “वह राजकुमार अब यहाँ नहीं है। उसने इस संसार में पुनर्जन्म के चक्र को समझा और आत्मज्ञान की जिज्ञासा से वह अराड नामक मुनि के पास गया है, जो एक ज्ञानी और दीर्घबाहु ऋषि हैं।”
यह सुनकर मंत्री और पुरोहित अराड के आश्रम की ओर चल पड़े। रास्ते में थोड़ी ही दूर पर उन्होंने राजकुमार सिद्धार्थ को देख लिया। वे उसके पास पहुँचे और आदरपूर्वक उसके निकट बैठ गए।
फिर पुरोहित ने प्रेमपूर्वक कहा, “हे कुमार! जब राजा को यह समाचार मिला कि तुम वन में चले गए हो, तो वे दुःख से मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े। होश में आने पर उन्होंने आँसू पोंछते हुए कहा—
‘मुझे ज्ञात है कि धर्म के प्रति तुम्हारा गहरा विश्वास है और यह भी जानता हूँ कि यह तुम्हारा भाग्य है। लेकिन तुमने असमय में वनवास का निर्णय लिया है, इसलिए मेरा हृदय अग्नि की तरह जल रहा है। हे धर्मनिष्ठ पुत्र! यदि मेरे प्रति कुछ भी स्नेह है, तो इस समय इस विचार को छोड़ दो और जीवन के चौथे चरण (वृद्धावस्था) में वन जाओ। अनेक राजाओं ने वृद्धावस्था में ही संन्यास लिया और जनक जैसे कई लोग गृहस्थ रहते हुए भी मोक्ष को प्राप्त कर गए।’”
इसके बाद पुरोहित ने सिद्धार्थ को माता गौतमी, पत्नी यशोधरा, और पुत्र राहुल के दुःख का भी विस्तार से वर्णन किया।
लेकिन सिद्धार्थ ने शांत और गंभीर स्वर में उत्तर दिया:
“धर्म के लिए कोई निश्चित समय नहीं होता। जैसे लोग धन या भोग के लिए किसी समय का इंतजार नहीं करते, वैसे ही मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी कोई समय निर्धारित नहीं होता। काल तो सदा ही चलायमान रहता है।”
जब पुरोहित की बातों से कोई असर नहीं हुआ, तब मंत्री ने भी अपने ज्ञान और अनुभव से सिद्धार्थ को समझाया। उन्होंने स्वर्ग, मोक्ष, और पुनर्जन्म जैसे विषयों को समझाकर राजकुमार को लौटने का आग्रह किया।
लेकिन सिद्धार्थ अपने निर्णय में अटल रहे। उन्होंने दृढ़ता से कहा—
“मैं प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर सकता हूँ, लेकिन घर वापस नहीं जाऊँगा। मैं अपनी तपस्या में असफल होकर लौटना स्वीकार नहीं कर सकता।”
यह कहकर वे उठे और एक ओर चल दिए। मंत्री और पुरोहित उनके पीछे-पीछे कुछ दूर तक रोते हुए चले, लेकिन जब देखा कि राजकुमार किसी भी हालत में लौटने को तैयार नहीं हैं, तो वे निराश होकर धीरे-धीरे नगर की ओर लौटने लगे।
इस प्रकार सिद्धार्थ का संन्यास जीवन के लिए दृढ़ निश्चय और त्याग, उनके महान आत्मबल और लक्ष्य के प्रति समर्पण का उदाहरण बन गया।