सचेतन:बुद्धचरितम्-11 तपोवनप्रवेशम् (Entry into the Forest of Austerities)
जब गौतम बुद्ध ने अपने सारथी छन्दक को वापस भेज दिया और वन में स्वतंत्रता से घूमने की इच्छा की, तो उनका तेजस्वी और प्रभावशाली व्यक्तित्व हर ओर चमक रहा था। उनके शरीर की अद्भुत शोभा सिंह के समान थी, जिससे वे किसी भी जगह को अपने प्रभाव से भर देते थे। जब वे एक तपस्वियों भार्गव ऋषि के आश्रम में पहुँचे, तो पूरा आश्रम उनकी दिव्य आभा से प्रभावित हो गया।
आश्रम में रहने वाले सभी ऋषि-मुनि और तपस्वी उनकी ओर खिंच गए। हर कोई बिना पलक झपकाए उन्हें देखने लगा, मानो वे किसी दिव्य शक्ति के अवतार हों। यहाँ तक कि जो लोग गहरे ध्यान में लीन थे, वे भी उनके तेज और प्रभाव से बाहर आ गए और उन्हें देखने लगे।
उस समय कोई भी तपस्वी अपने मठों में नहीं गया। सभी लोग आश्चर्य से देख रहे थे कि यह अद्भुत पुरुष कौन है, जिसकी उपस्थिति ही इतनी प्रभावशाली है।
बुद्ध, जो अब संन्यास के मार्ग पर थे, उन्होंने इस तपोभूमि को देखा, जहाँ विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ हो रही थीं। इस स्थान पर अनेक साधक स्वर्ग की प्राप्ति की कामना से कठोर तप कर रहे थे, लेकिन बुद्ध का मन केवल सच्चे मोक्ष की खोज में था। वे उन सभी तपस्वियों और उनके साधना-स्थलों को देखते हुए शांतिपूर्वक आश्रम में विचरण करने लगे, अपने भीतर सत्य की खोज करते हुए।
शांत स्वभाव वाले राजकुमार सिद्धार्थ जब वन में पहुँचे, तो उन्होंने वहाँ के तपस्वियों को तरह-तरह की कठिन तपस्याएँ करते हुए देखा। उन्होंने यह सब देखकर गहरे चिंतन में पड़ गए और उनके मन में सत्य और ज्ञान की जिज्ञासा जाग उठी। उन्होंने विनम्रतापूर्वक वहाँ के मुनियों से कहा,
“यह मेरा पहला अवसर है जब मैं इस तपोवन में आया हूँ। मैं यहाँ की तपस्या की विधियों और नियमों को नहीं जानता। कृपया मुझे यह बताइए कि आप किस उद्देश्य से इतनी कठिन तपस्या कर रहे हैं? आपका जीवन किस सिद्धांत पर आधारित है?”
उनकी जिज्ञासा को देखकर वहाँ के एक तपस्वी ने उत्तर दिया,
“हे कुमार! हम सभी सत्य और मोक्ष की खोज में तपस्या कर रहे हैं। हमारे जीवन का आधार प्रकृति से प्राप्त वस्तुएँ हैं। कुछ मुनि केवल जंगल में मिलने वाले फल, कंद-मूल खाते हैं, जो जल में गिरने वाले फलों के समान होते हैं। कुछ मुनि पक्षियों की तरह धरती से दाने बीनकर भोजन करते हैं, तो कुछ हिरणों की तरह हरी घास चरते हैं। कुछ तपस्वी अग्नि में प्रतिदिन दो बार आहुति देते हैं और अपनी आत्मा को शुद्ध करने का प्रयास करते हैं। हमारा विश्वास है कि इस कठिन तपस्या से हम आत्मा की शुद्धि कर सकते हैं और सत्य को प्राप्त कर सकते हैं।”
बुद्ध ने यह सब ध्यान से सुना और गहरे विचार में पड़ गए। उन्होंने देखा कि इन तपस्वियों का जीवन बहुत कठिन था, लेकिन उन्हें अब भी वास्तविक ज्ञान और शांति की अनुभूति नहीं हुई थी। यह सब देखकर उनके मन में यह प्रश्न उठा कि क्या केवल कठोर तपस्या ही सत्य का मार्ग हो सकता है, या इसके पीछे कोई और गहरी समझ छिपी हुई है?
बुद्ध ने देखा कि कई लोग वर्षों तक कठोर तपस्या करते हैं ताकि वे स्वर्ग में जा सकें। उन्हें यह विचार समझाया गया कि अच्छे कर्मों और कठोर तप से मनुष्य स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। लेकिन इन बातों से बुद्ध को संतोष नहीं हुआ।
उन्होंने धीरे से स्वगत (मन में) कहा, “यह कैसी तपस्या है, जो केवल दुःख देती है?” उन्होंने सोचा कि इस तरह की कठोर साधना करने से केवल शरीर और मन को कष्ट मिलता है। यदि इस तपस्या का सबसे बड़ा फल स्वर्ग है, तो यह भी स्थायी नहीं है क्योंकि स्वर्ग भी परिवर्तनशील है, वहाँ भी अनंत सुख नहीं है।
बुद्ध को लगा कि यदि संसार और स्वर्ग दोनों बदलते रहते हैं, तो इन आश्रमवासियों का कठिन परिश्रम वास्तव में बहुत छोटे या अल्प फल के लिए है। वे यह समझने लगे कि सच्चा सुख और शांति किसी बाहरी स्थान, जैसे स्वर्ग, में नहीं, बल्कि भीतर की समझ और ज्ञान में है।
बुद्ध ने अपनी साधना की यात्रा में कई तपस्वियों के साथ कुछ समय बिताया। वे उनकी कठिन तपस्याओं को देखते और समझते रहे। कुछ दिन वहां ठहरने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि अब आगे बढ़ना चाहिए।