सचेतन:बुद्धचरितम्-12 तपोवनप्रवेशम् (Entry into the Forest of Austerities):
बुद्ध ने अपनी साधना की यात्रा में कई तपस्वियों के साथ कुछ समय बिताया। वे उनकी कठिन तपस्याओं को देखते और समझते रहे। कुछ दिन वहां ठहरने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि अब आगे बढ़ना चाहिए।
जब वे वहां से जाने लगे, तो आश्रम के साधु-संत उनके पीछे-पीछे चल पड़े। उनमें से एक वृद्ध संत ने अत्यंत आदरपूर्वक कहा,
“हे सौम्य! आपके आने से यह आश्रम जीवन से भर गया है। कृपया इसे छोड़कर मत जाइए। हम सभी तपस्वी आपको अपनी तपस्या में सहभागी बनाना चाहते हैं।”
उनकी इस प्रार्थना को सुनकर बुद्ध ने विनम्रता से उत्तर दिया,
“आप सभी का धर्म स्वर्ग प्राप्ति के लिए है, लेकिन मेरी अभिलाषा केवल मोक्ष की है। मैं संसार के बंधनों से पूरी तरह मुक्त होना चाहता हूँ। इसलिए इस वन में रहना मेरे उद्देश्य के अनुरूप नहीं है, क्योंकि प्रवृत्ति (संसार की ओर झुकाव) और निवृत्ति (संसार से मुक्ति) का धर्म अलग-अलग होता है।”
इसके बाद, एक ब्राह्मण ने बुद्ध की इस गहरी सोच को समझते हुए कहा,
“हे ज्ञानी! आपका विचार वास्तव में बहुत ऊँचा और महान है। इतनी छोटी उम्र में ही आपने जीवन के दुखों और दोषों को पहचान लिया है। यह दर्शाता है कि आपकी बुद्धि बहुत मजबूत और स्थिर है। अब आपको शीघ्र ही विन्ध्य पर्वत के पास स्थित आश्रम जाना चाहिए। वहाँ एक महान मुनि अराड ऋषि रहते हैं। आप उनके पास जाकर सत्य और ज्ञान के मार्ग को सुन सकते हैं और यदि आपको उचित लगे, तो उसे स्वीकार भी कर सकते हैं। लेकिन मैं यह मानता हूँ कि आपकी गहरी समझ और बुद्धि इतनी तेज है कि अंततः आप उनकी विचारधारा को भी पार कर जाएंगे।”
यह सुनकर राजकुमार सिद्धार्थ ने “यह तो बहुत उत्तम विचार है!” ऐसा कहते हुए उन ऋषियों को प्रणाम किया और वहाँ से निकल पड़े। उधर, वे ऋषिगण भी अपने तपोवन की ओर बढ़ गए।इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि सिद्धार्थ का ज्ञान और सत्य की खोज में अटूट विश्वास था। वे किसी भी मार्ग को सुनने और परखने को तैयार थे, लेकिन उनकी सोच इतनी गहरी थी कि वे सिर्फ किसी भी विचार को स्वीकार नहीं करते थे, बल्कि उसकी सच्चाई को परखते और स्वयं के अनुभव से ही सत्य को खोजते थे। यही उनकी बुद्धत्व की ओर यात्रा का महत्वपूर्ण चरण था।