सचेतन- 43 –आत्मबोध “सूरज को जगाना नहीं पड़ता”
क्या आपने कभी सूर्योदय को ध्यान से देखा है?
सूरज अचानक नहीं निकलता।
पहले हल्की लालिमा फैलती है।
अंधेरा थोड़ा कम होता है।
फिर धीरे-धीरे सूरज खुद दिखाई देने लगता है।
आत्मबोध के आज के विचार में हम यही बात करेंगे की —
आत्मा को जगाना नहीं पड़ता।
सिर्फ अज्ञान हटाना पड़ता है।
और जैसे ही अज्ञान हटता है,
आत्मा अपने आप प्रकट हो जाती है।
आज इसे बहुत सरल और दिल से समझते हैं।
सूरज का उदाहरण
आज का विचार है की :
जैसे अरुणोदय — सुबह की लालिमा —
रात के घने अंधेरे को हटाती है,
और फिर सूरज स्वयं चमकने लगता है।
वैसे ही
सही ज्ञान पहले अज्ञान को हटाता है,
फिर आत्मा स्वयं प्रकाशित हो जाती है।
ध्यान दीजिए —
सूरज को किसी ने जलाया नहीं।
वह पहले से था।
बस अंधेरा हटना था।
आत्मा को रोशनी की ज़रूरत नहीं
हम सोचते हैं —
“मुझे आत्मा का अनुभव करना है।”
“मुझे आत्मज्ञान पाना है।”
लेकिन शंकराचार्य कह रहे हैं —
आत्मा को अनुभव की ज़रूरत नहीं।
वह पहले से प्रकाशित है।
जैसे बिजली पहले से घर में है,
बस स्विच ऑन करना है।
जैसे आईना साफ़ हो जाए तो चेहरा दिखने लगता है,
चेहरा नया नहीं बनता।
अज्ञान क्या है?
अज्ञान क्या है?
- मैं शरीर हूँ
- मैं दुखी हूँ
- मैं अधूरा हूँ
- मुझे ही सब सँभालना है
- मैं अकेला हूँ
ये सारे विचार
रात के अंधेरे की तरह हैं।
और ज्ञान क्या है?
“मैं चैतन्य हूँ।”
“मैं साक्षी हूँ।”
“मैं पूर्ण हूँ।”
ये सुबह की लालिमा है।
ज्ञान का काम क्या है?
यहाँ एक गहरी बात है।
बाहरी वस्तु को जानने में दो काम होते हैं:
- अज्ञान हटाना
- वस्तु को प्रकाशित करना
लेकिन आत्मा के मामले में
सिर्फ एक काम है —
अज्ञान हटाना।
क्यों?
क्योंकि आत्मा स्वयं प्रकाश है।
जैसे जलती हुई मोमबत्ती पर रखा हुआ ढक्कन हटा दें —
तो वह अपने आप चमकने लगेगी।
हमें उसे अलग से टॉर्च से दिखाने की ज़रूरत नहीं।
मोमबत्ती का उदाहरण (बहुत सरल)
मान लीजिए कमरे में दो मोमबत्तियाँ हैं।
एक जली हुई है।
एक बुझी हुई।
दोनों पर बर्तन ढका हुआ है।
पहली (जली हुई) मोमबत्ती के लिए
हमें सिर्फ ढक्कन हटाना है।
दूसरी (बुझी हुई) के लिए
ढक्कन भी हटाना होगा
और उसे जलाना भी होगा।
आत्मा पहली वाली मोमबत्ती है।
वह पहले से जली हुई है।
ज्ञान सिर्फ ढक्कन हटाता है।
जीवन में इसका मतलब
अब इसे जीवन में समझिए।
आप सोचते हैं:
“मैं दुखी हूँ।”
“मेरी ज़िंदगी अधूरी है।”
“जब ये समस्या खत्म होगी तब मैं खुश होऊँगा।”
ये सब अंधेरा है।
ज्ञान क्या कहता है?
“समस्या परिस्थिति में है,
पर मैं परिस्थिति नहीं हूँ।”
जैसे ही यह समझ स्पष्ट होती है,
भीतर हल्कापन आता है।
कुछ नया नहीं मिला।
बस पर्दा हटा।
अनुभव क्यों नहीं होता?
लोग पूछते हैं —
“अगर मैं आत्मा हूँ तो मुझे अनुभव क्यों नहीं होता?”
उत्तर है —
अनुभव की ज़रूरत ही नहीं।
क्या आपको अपने होने का अनुभव अलग से करना पड़ता है?
क्या आपको खुद को देखने के लिए आईना चाहिए?
नहीं।
आप स्वयं प्रकाश हैं।
छोटा ध्यान अभ्यास
आँखें बंद करें…
कल्पना करें कि रात है।
घना अंधेरा।
अब पूर्व दिशा में हल्की लालिमा फैल रही है।
वह लालिमा है —
सही समझ।
धीरे-धीरे अंधेरा कम हो रहा है।
अब सूरज दिख रहा है।
सूरज आपने नहीं बनाया।
वह पहले से था।
बस अंधेरा हट गया।
उसी तरह
आपका सच्चा स्वरूप
पहले से है।
आज का विचार भी कुछ ऐसा ही है —
तुम्हें आत्मा बनना नहीं है।
तुम पहले से हो।
तुम्हें रोशनी पैदा नहीं करनी।
तुम स्वयं रोशनी हो।
सिर्फ अज्ञान हटाना है।
और जब अज्ञान हटता है,
तो आत्मा अपने आप प्रकट होती है —
जैसे सूरज।
आज का चिंतन
क्या मैं सूरज को खोज रहा हूँ?
या अंधेरा हटाने पर काम कर रहा हूँ?
अगर यह बात आपके दिल को छू गई हो,
तो आज से हर परिस्थिति में बस इतना याद रखें —
“मैं प्रकाश हूँ,
अंधेरा नहीं।”
यही सचेतन जीवन है। 🌅
