सचेतन- 22: आप तनावग्रस्त क्यों महसूस करते हैं?

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सचेतन- 22: आप तनावग्रस्त क्यों महसूस करते हैं?

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एक छोटा-सा विचार सुनिए—
आप तनाव नहीं हैं।
आप केवल उन विचारों के सचेत साक्षी हैं, जो तनाव जैसे महसूस होते हैं।

यह फर्क बहुत छोटा लगता है,
लेकिन यही फर्क
आपको बेचैनी से शांति की ओर ले जाता है।

कभी आपने देखा है—
तालाब में चाँद का प्रतिबिंब हिल रहा हो,
और लगे कि चाँद ही काँप रहा है?

पर क्या सच में चाँद काँपता है?
या केवल पानी की सतह हिल रही होती है?

आज हम इसी भ्रम को समझेंगे—
क्यों हम अपने जीवन को गलत जगह से देख रहे हैं।

‘करने वाला मैं’ और तनाव की कहानी

ज़रा अपने भीतर झाँकिए।

सीने में हल्की-सी जकड़न,
मन में वही विचार बार-बार घूमते हुए—
“यह भी करना है… वो भी संभालना है…
सब मुझ पर ही क्यों है?”

ऐसा लगता है जैसे
आप किसी कहानी के मुख्य पात्र हों,
जिसके लिए आपने कभी ऑडिशन ही नहीं दिया।

इस कहानी में
आप ही करने वाले हैं—
सब कुछ सही करने की ज़िम्मेदारी आपकी,
गलती हो जाए तो दोष भी आपका।

जब हम इस “करने वाले मैं” में फँस जाते हैं,
तो हर समस्या व्यक्तिगत लगती है,
हर रुकावट हमारी क़ीमत तय करती हुई लगती है।

आधुनिक मनोविज्ञान इसे कहता है—
विचारों से चिपक जाना।

जब मन कहता है—
“मैं यह नहीं संभाल पाऊँगा,”
तो हम उसे एक विचार नहीं,
एक सच मान लेते हैं।

और यहीं से तनाव पैदा होता है—
जब हम मान लेते हैं कि
पूरी दुनिया को सँभालने की ज़िम्मेदारी
सिर्फ हमारी है।

एक प्राचीन समाधान—एक ही श्लोक में

हज़ारों साल पहले,
जब ‘तनाव’ शब्द भी नहीं था,
भारतीय ऋषियों ने
मन की इस उलझन को गहराई से समझा।

उन्होंने समाधान
और ज़्यादा करने में नहीं,
पहचान बदलने में दिया।

एक प्राचीन श्लोक का भाव कुछ ऐसा है—

“अज्ञान के कारण
मन की हलचल
आत्मा पर आरोपित हो जाती है।

जैसे पानी में हिलते चाँद को
हम असली चाँद समझ लेते हैं।”

यह श्लोक
आपसे कुछ बदलने को नहीं कहता।
यह केवल दिखाता है।

और कभी-कभी
सिर्फ सही जगह से देख लेना
पूरी कहानी बदल देता है।

चाँद और पानी का उदाहरण

कल्पना कीजिए—

आसमान में पूरा चाँद है।
शांत। स्थिर। अडिग।

नीचे एक तालाब है—
जिसमें चाँद का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा है।

अब हवा चलती है।
पानी में लहरें उठती हैं।

प्रतिबिंब टूटता-सा लगता है।
काँपता हुआ। बिखरा हुआ।

अब ध्यान दीजिए—

चाँद क्या कर रहा है?
कुछ भी नहीं।

वह वहीं है।
जैसा था, वैसा ही।

यहाँ—
चाँद आप हैं।
और पानी आपका मन।

विचार, भावनाएँ, चिंताएँ—
ये सब लहरें हैं।

लेकिन हम क्या करते हैं?

हम उस हिलते प्रतिबिंब को देखकर कहते हैं—
“मैं टूट रहा हूँ।”
“मैं ठीक नहीं हूँ।”
“मैं ही समस्या हूँ।”

और फिर हम
पानी में कूदकर
प्रतिबिंब को ठीक करने लगते हैं।

यही थकान…
यही बेचैनी…
यही तनाव है।

‘आहा’ क्षण — मैं प्रतिबिंब नहीं हूँ

सच तो यह है—

आप विचार नहीं हैं।
आप वह हैं
जो विचारों को देख रहा है।

आप चिंता नहीं हैं।
आप वह हैं
जिसके सामने चिंता आती-जाती है।

चाँद कभी हिलता नहीं,
सिर्फ उसका प्रतिबिंब हिलता है।

जीवन में लहरें आएँगी।
पर अब आप उनमें डूबे नहीं होंगे।

तनाव का अर्थ है—
खुद को प्रतिबिंब समझ लेना।

शांति का अर्थ है—
याद कर लेना कि
मैं चाँद हूँ।

जीवन में कैसे उतारें

अब एक छोटा-सा अभ्यास।

अगली बार जब तनाव आए—

“I am stressed”
के बजाय कहिए—

“मैं तनाव को महसूस कर रहा हूँ।”

“मैं चिंतित हूँ”
के बजाय—

“मैं उस चिंता को देख रहा हूँ।”

बस इतना-सा फर्क।

इस छोटे-से अंतर में
एक बड़ा-सा सुकून छुपा है।

आप बादल नहीं हैं।
आप आकाश हैं।

आप लहर नहीं हैं।
आप गहराई हैं।

आप प्रतिबिंब नहीं हैं।
आप चाँद हैं।

यह ज्ञान
लहरों को रोकने का वादा नहीं करता।
यह उससे भी बड़ा उपहार देता है—

यह याद दिलाता है कि
आप कभी पानी थे ही नहीं।

आप सदा से
शांत, स्थिर प्रकाश रहे हैं—
जो सब कुछ देखता है।

आप तनाव नहीं हैं।
आप वह शांति हैं
जो उसे देख रही है।

अगर यह बात आपके भीतर कहीं ठहरी हो,
तो इसे कुछ देर अपने साथ रहने दीजिए।

और अगर आप
जीवन को देखने का यह नया दृष्टिकोण
और गहराई से समझना चाहते हैं—
तो “सचेतन” से जुड़े रहिए।

धन्यवाद।

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