सचेतन- 23: वह प्राचीन पहचान की भूल, जो आपके सारे दुःख की जड़ है
क्या कभी ऐसा लगता है
कि आपका मन ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष बन गया है?
विचार रुकते नहीं…
चिंताएँ पीछा नहीं छोड़तीं…
और भीतर एक शोर लगातार चलता रहता है।
हम शांति की तलाश में
कभी रिश्ते बदलते हैं,
कभी काम,
कभी जगहें।
पर भीतर का शोर
कुछ देर शांत होकर
फिर लौट आता है।
तो प्रश्न यह है—
गलत क्या है?
क्या दुनिया में कुछ कमी है?
या कहीं हमारी पहचान में ही कोई गड़बड़ी है?
आज हम उसी प्राचीन भूल को समझेंगे—
एक ऐसी भूल, जिसे ऋषियों ने हज़ारों साल पहले पहचान लिया था।
और जिसे उन्होंने
सभी दुःखों की जड़ कहा।
“मैं” की समस्या
ज़रा ध्यान दीजिए
अपने भीतर उठने वाले उस “मैं” पर।
“मैं परेशान हूँ।”
“मैं अकेला हूँ।”
“मैं पर्याप्त नहीं हूँ।”
“मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”
यह “मैं”
हमेशा कुछ चाहता है,
कुछ बचाना चाहता है,
कुछ साबित करना चाहता है।
यह “मैं”
अपने आपको छोटा, सीमित और असुरक्षित मानता है।
सुबह उठते ही
यही “मैं”
ज़िंदगी संभालने बैठ जाता है।
हम पूरी ज़िंदगी
इसी “मैं” को खुश करने में लगा देते हैं—
पैसा, सम्मान, सुरक्षा, प्यार।
पर अजीब बात है—
यह “मैं” कभी संतुष्ट नहीं होता।
क्यों?
क्योंकि हम
भीतरी समस्या का
बाहरी समाधान खोज रहे हैं।
जैसे टेढ़े आईने में
अपना चेहरा देखकर
चेहरे को ही बदलने लगें।
ऋषियों ने कहा—
दुःख दुनिया से नहीं,
पहचान की गलती से पैदा होता है।
पहचान की यह भूल — ‘अध्यास’
इस गलती को वे कहते हैं—
अध्यास।
अध्यास का अर्थ है—
एक चीज़ को दूसरी समझ लेना।
कल्पना कीजिए—
अँधेरे में ज़मीन पर पड़ी एक रस्सी।
आप उसे साँप समझ लेते हैं।
दिल तेज़ धड़कता है।
डर पसीने बनकर बहने लगता है।
फिर रोशनी होती है—
और पता चलता है,
वहाँ साँप था ही नहीं।
डर असली था,
पर कारण नहीं।
ऋषि कहते हैं—
हम यही गलती
हर पल अपने साथ कर रहे हैं।
रस्सी, साँप… और आप
यहाँ—
- रस्सी है आपकी असली पहचान
—शांत, स्थिर, जागरूक चेतना। - साँप है मन का नाटक
—विचार, भावनाएँ, डर, इच्छाएँ।
अज्ञान के कारण
हम मन के गुण
खुद पर थोप लेते हैं।
हम कहते हैं—
“मैं दुखी हूँ।”
“मैं डर हूँ।”
“मैं असफल हूँ।”
पर एक क्षण रुककर देखिए—
क्या आप दुख हैं?
या दुख को जानने वाले हैं?
क्या आप विचार हैं?
या विचारों को देखने वाले?
जैसे अभिनेता मंच पर
राजा बनता है, रोता है, मरता है—
पर पर्दा गिरते ही
वह सुरक्षित लौट आता है।
हम उस अभिनेता की तरह हैं
जो भूमिका को ही
अपनी असली पहचान मान बैठा है।
अनुभव से प्रमाण
ऋषियों ने केवल विश्वास नहीं माँगा।
उन्होंने अनुभव से प्रमाण दिया।
तीन अवस्थाएँ देखिए—
जाग्रत अवस्था —
मन सक्रिय,
चिंता, सुख-दुःख मौजूद।
स्वप्न अवस्था —
मन सक्रिय,
डर और आनंद फिर भी।
गहरी नींद —
मन नहीं,
विचार नहीं,
दुःख भी नहीं।
पर सुबह आप कहते हैं—
“मैं गहरी नींद सोया।”
तो प्रश्न है—
जो नींद में भी मौजूद था,
वह कौन था?
ऋषि कहते हैं—
वह आप थे।
साक्षी।
मन नहीं था,
पर आप थे।
इसका अर्थ साफ़ है—
दुःख मन का है,
आपका नहीं।
समाधान — पहचान बदलना
तो उपाय क्या है?
मन से लड़ना नहीं।
विचारों को दबाना नहीं।
उपाय है—
पहचान बदलना।
हर बार जब विचार आए—
“मैं परेशान हूँ”
तो बस देखिए—
“मैं उस परेशानी को देख रहा हूँ।”
धीरे-धीरे
आप साक्षी की जगह बैठने लगेंगे।
जैसे कमरे की रोशनी
सब कुछ दिखाती है
पर खुद कुछ नहीं बनती—
वैसे ही आप
सब अनुभव करते हैं,
पर उनसे बनते नहीं।
यही है वह प्राचीन पहचान की भूल—
मन को अपना “मैं” मान लेना।
मुक्ति कोई नई उपलब्धि नहीं है।
मुक्ति है—
याद कर लेना।
आप विचार नहीं हैं।
आप भाव नहीं हैं।
आप वह मौन चेतना हैं
जो सब देख रही है।
आप बादल नहीं हैं।
आप आकाश हैं।
और यह आकाश
अभी भी उतना ही शांत है
जितना हमेशा था।
यदि यह बात
कहीं भीतर छू गई हो,
तो इसे यहीं छोड़ मत दीजिए।
इसे अपने अनुभव में जाँचिए।
और यदि आप
ऐसी ही गहराई भरी यात्राओं में रुचि रखते हैं,
तो “सचेतन” से जुड़े रहिए।
पर याद रखिए—
असली उत्तर
इन शब्दों में नहीं,
बल्कि उस शांति में है
जो इन्हें सुन रही है।
धन्यवाद।
