सचेतन- 24: आप पहले से ही मुक्त हैं — लेकिन एक भ्रम में जी रहे हैं

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सचेतन- 24: आप पहले से ही मुक्त हैं — लेकिन एक भ्रम में जी रहे हैं

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ज़रा यह कल्पना कीजिए—

अगर जिस पिंजरे में आप खुद को क़ैद महसूस करते हैं,
उसमें सलाखें ही न हों?

अगर दरवाज़ा
शुरू से ही खुला हो?

अँधेरे कमरे में
ज़मीन पर पड़ी एक चीज़ को देखकर
आप डर से काँप उठते हैं—
साँप है!

दिल तेज़ धड़कता है।
साँस रुक-सी जाती है।

और तभी
कोई बत्ती जला देता है।

वह साँप नहीं…
सिर्फ़ एक रस्सी थी।

आज जो चिंता, डर, बेचैनी
आप रोज़ जीते हैं—
वह भी कुछ ऐसा ही है।

आप मुक्त नहीं बनने वाले नहीं हैं।
आप पहले से ही मुक्त हैं।
बस एक बहुत गहरा भ्रम
आपको यह दिखने नहीं देता।

साँप — यानी हमारी रोज़ की बेचैनी

ईमानदारी से देखें—

ज़िंदगी अक्सर एक संघर्ष जैसी लगती है।

कुछ पाने की दौड़।
कुछ बचाने की चिंता।
और भीतर यह लगातार एहसास—
“मैं पर्याप्त नहीं हूँ।”

बॉस का एक फोन—
और मन में डर की बाढ़।
अकेले बैठें—
तो बेचैनी, फोन उठाने की जल्दी।

यही है वह “साँप”।

हम पूरी ज़िंदगी
इसी साँप से लड़ते रहते हैं—

“अगर यह मिल जाए,
तो सब ठीक हो जाएगा।”

“अगर वह बदल जाए,
तो मैं शांत हो जाऊँगा।”

लेकिन भीतर की बेचैनी
बार-बार लौट आती है।

क्यों?

क्योंकि हमने मान लिया है
कि हम एक छोटे, अधूरे, डरे हुए “मैं” हैं—
जिसे दुनिया से लड़ना है।

यही मूल भ्रम है।
यही असली समस्या है।

साँप को मारना नहीं, देखना है

ध्यान दीजिए—
समाधान साँप से लड़ना नहीं है।

समाधान है—
उसे ठीक से देखना।

अगली बार जब चिंता उठे,
बस यह पूछिए—

“यह ‘मैं’ कौन है
जो परेशान हो रहा है?”

क्या यह शरीर है?
शरीर तो हर पल बदल रहा है।

क्या यह विचार है?
विचार तो आते-जाते रहते हैं।

क्या यह भावना है?
भावनाएँ तो मेहमान हैं।

तो फिर
वह ‘मैं’ कहाँ है
जो इतना डर रहा है?

जब आप खोजते हैं,
तो वह ठोस “मैं”
मिलता ही नहीं।

बस विचारों, भावनाओं,
और संवेदनाओं की एक धारा मिलती है।

और फिर एक शांति-सी।

रस्सी और साँप का रहस्य

भारतीय दर्शन इसे कहता है—
अध्यास

यानी—
एक चीज़ पर
दूसरी चीज़ का भ्रम।

रस्सी पर साँप का आरोप।

ठीक वैसे ही
हम चेतना पर
मन का आरोप कर देते हैं।

मन डरता है—
और हम कहते हैं,
“मैं डर रहा हूँ।”

मन दुखी है—
और हम कहते हैं,
“मैं दुखी हूँ।”

पर सच यह है—

आप डर नहीं हैं।
आप दुख नहीं हैं।

आप वह हैं
जो डर और दुख को जान रहा है

एक अभिनेता की तरह
जो मंच पर रोता है,
पर भीतर जानता है—
“यह भूमिका है।”

हम भूमिका को ही
असल समझ बैठे हैं।

आप हर हाल में मौजूद हैं

एक सरल अनुभव देखें—

जागते हैं—
तो विचार हैं, चिंता है।

सपने में—
तो फिर भावनाएँ हैं।

गहरी नींद में—
कुछ भी नहीं।

पर सुबह आप कहते हैं—
“मैं अच्छी नींद सोया।”

तो जो गहरी नींद में भी मौजूद था,
वह कौन था?

वही आप।

शांत।
निर्लिप्त।
साक्षी।

दुख मन में आता है,
आपमें नहीं।

मुक्ति कोई उपलब्धि नहीं

यहाँ सबसे बड़ी बात समझिए—

मुक्ति कोई मंज़िल नहीं है।
मुक्ति कोई उपलब्धि नहीं है।

मुक्ति है—
पहचान।

आपको कुछ बनना नहीं है।
आपको कुछ पाना नहीं है।

बस यह देखना है
कि साँप कभी था ही नहीं।

ध्यान, साधना, प्रश्न—
ये सब रस्सी को साफ़ देखने के तरीके हैं।
रस्सी को बदलने के नहीं।

तो याद रखिए—

पिंजरे में सलाखें नहीं थीं।
दरवाज़ा खुला ही था।

डर सच था,
पर कारण नहीं।

आप बंधे नहीं हैं।
आप कभी बंधे थे ही नहीं।

आप विचार नहीं हैं।
आप डर नहीं हैं।

आप वह शांत चेतना हैं
जिसमें यह सब आता-जाता है।

साँप को मत घूरिए।
रोशनी जला दीजिए।

और जब आप सचमुच देखेंगे—
तो पाएँगे—

आप पहले से ही मुक्त हैं।

अज्ञान के समय भी आत्मा मुक्त ही आका स्वभाव है।
बंधन सिर्फ़ मान लिया गया है।

स्वभाव’ का अर्थ क्या है?

शंकराचार्य यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण शब्द इस्तेमाल करते हैं—
स्वभाव।

स्वभाव वह है
जो कभी जाता नहीं।

जो आता-जाता है,
वह स्वभाव नहीं हो सकता।

दुख आता है—जाता है।
विचार बदलते हैं।
भावनाएँ उठती हैं—डूबती हैं।

इसलिए—

आप दुख नहीं हो सकते।
आप विचार नहीं हो सकते।

आपका असली स्वभाव क्या है?

सत् — जो कभी नहीं मिटता
चित् — जो सब जानता है
आनंद — जो किसी कारण पर निर्भर नहीं
नित्य — जो सदा है
निर्मल — जिस पर कोई दाग नहीं लगता

यह कोई गुण नहीं हैं जो आपको मिलेंगे
यह आपकी पहचान है।

फिर साधना क्यों?

अब यहाँ एक बहुत स्वाभाविक सवाल उठता है—

अगर आत्मा सदा शुद्ध है,
तो फिर साधना क्यों?

कर्मयोग, ध्यान, जप—
इन सब की ज़रूरत क्यों?

उत्तर बहुत सीधा है—

आत्मा को शुद्ध करने के लिए नहीं।
मन को शुद्ध करने के लिए।

आत्मा को कोई मैल छू ही नहीं सकता।

पर मन—
धारणाओं, आदतों, डर, अहंकार से भरा होता है।

गीता में जब कहा जाता है
“आत्मा-विशुद्धि”—
तो उसका अर्थ आत्मा नहीं,
अंतःकरण है।

साधना का उद्देश्य है—

“मैं शुद्ध बनूँ” — नहीं

बल्कि

“मैं शुद्ध हूँ — यह जान सकूँ”

अगर यह बात
कहीं भीतर गूँजी हो,
तो इसे केवल सुनकर छोड़ मत दीजिए।

इसे अपने अनुभव में जाँचिए।

और अगर आप
ऐसी ही जागरूक यात्राओं में रुचि रखते हैं,
तो “सचेतन” से जुड़े रहिए।धन्यवाद।

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