सचेतन- 25 सबसे बड़ा झूठ जो आप रोज़ खुद से बोलते हैं
क्या आप जानते हैं
कि आप हर दिन खुद से एक झूठ बोलते हैं?
एक ऐसा झूठ
जो आपको समझदार, स्मार्ट
और कंट्रोल में महसूस कराता है—
लेकिन असल में
यही झूठ
आपके ज़्यादातर दुखों और संघर्षों की जड़ है।
और वो झूठ है—
“मैं जानता हूँ।”
….
ये तीन छोटे शब्द
बहुत मामूली लगते हैं, है न?
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है—
जिस पल आप कहते हैं “मैं जानता हूँ”,
उसी पल आप
सीखने, बदलने और समझने
के सारे दरवाज़े बंद कर देते हैं?
आज हम इसी झूठ को
धीरे-धीरे खोलेंगे।
और उस सबसे गहरे सवाल तक पहुँचेंगे—
“आख़िर मैं हूँ कौन?”
समस्या — ‘मैं जानता हूँ’ की जेल
ज़रा सोचिए—
कोई आपको सलाह देता है,
कोई नया नज़रिया सामने रखता है,
और मन में तुरंत आवाज़ आती है—
“हाँ-हाँ, ये तो मुझे पता है।”
उस पल क्या होता है?
बात वहीं रुक जाती है।
सीख वहीं रुक जाती है।
“मैं जानता हूँ”
एक फुल-स्टॉप है।
यह कहता है—
इसके आगे कुछ नहीं।
और ये सिर्फ़ दूसरों के साथ नहीं होता—
यह हमारे अंदर लगातार चलता है।
हम कहते हैं—
“मैं जानता हूँ ज़िंदगी कैसे चलती है।”
“मैं जानता हूँ लोग कैसे होते हैं।”
“मैं तो खुद को भी जानता हूँ।”
लेकिन क्या सच में?
यही “मैं जानता हूँ”
अहंकार की सबसे पसंदीदा खुराक है।
अहंकार को ज़िंदा रहने के लिए
लगातार यह महसूस होना चाहिए कि—
मैं सही हूँ।
मुझे ज़्यादा पता है।
और जैसे ही कोई
हमारे इस ‘ज्ञान’ को चुनौती देता है,
हमें गुस्सा आता है,
असहजता होती है।
क्यों?
क्योंकि हमने
अपने अस्तित्व को
अपने ज्ञान से जोड़ लिया है।
यही दुख की जड़ है।
यह एक मीठा ज़हर है—
दुनिया को अपने चश्मे से देखने की ज़िद।
और जब दुनिया वैसी नहीं चलती,
तो गुस्सा, तनाव और पीड़ा।
यह एक जेल है—
जिसकी दीवारें ज्ञान से बनी हैं
और ताला है—
“मैं जानता हूँ।”
भ्रम — यह ‘ज्ञान’ आखिर है क्या?
अब ज़रा
इस ‘ज्ञान’ को ही देख लेते हैं।
जिसे हम ज्ञान कहते हैं,
वो ज़्यादातर जानकारी होती है।
यादें।
अनुभव।
सुनी-पढ़ी बातें।
मन एक हार्ड-ड्राइव की तरह है—
जो लगातार डेटा जमा करता रहता है।
लेकिन क्या
हार्ड-ड्राइव में भरा डेटा
समझ बन जाता है?
नहीं।
और इस मन का स्वभाव क्या है?
यह कभी स्थिर नहीं रहता।
कभी अतीत में,
कभी भविष्य में।
जो विचार आज सही लगते हैं,
कल बचकाने लग सकते हैं।
तो सवाल यह है—
अगर आपका ज्ञान
लगातार बदल रहा है,
तो आप इतने विश्वास से
कैसे कह सकते हैं—
“मैं जानता हूँ”?
असल में
जिसे आप “मैं” कहते हैं,
वो भी तो बदल रहा है।
मैं डॉक्टर हूँ।
मैं पिता हूँ।
मैं गुस्सैल हूँ।
मैं दयालु हूँ।
ये सब लेबल हैं।
और इन्हीं लेबल्स के ढेर को
हम “मैं” समझ बैठते हैं।
यही सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है।
हम स्क्रीन पर चलती तस्वीरों को
असल मान लेते हैं,
और उस बिजली को भूल जाते हैं
जिससे स्क्रीन चल रही है।
सत्य — जो कभी नहीं बदलता
इस भ्रम को
आदि शंकराचार्य
आत्मबोध में साफ़ करते हैं।
वो कहते हैं—
आत्मा की चेतना
और बुद्धि का विचार—
ये दोनों अलग हैं।
लेकिन नासमझी में
हम दोनों को मिला देते हैं
और कहते हैं—
“मैं जानता हूँ।”
आत्मा क्या है?
वो शुद्ध चेतना है।
जो बदलती नहीं।
जो बस है।
मन क्या है?
एक मशीन।
जिसमें विचार, भावनाएँ
बादलों की तरह आती-जाती हैं।
जैसे—
आग में तपा लोहा।
लोहा खुद नहीं जलता,
आग की गर्मी उस पर चढ़ जाती है।
लेकिन हम कहते हैं—
“लोहा जल रहा है।”
यही भ्रम है।
आत्मा की चेतना
मन पर पड़ती है—
और हम सोच लेते हैं
कि मन के विचार
आत्मा के अनुभव हैं।
लेकिन आत्मा तो साक्षी है।
वो आग की तरह है—
जिसे फ़र्क नहीं पड़ता
कि वो लोहे को छू रही है
या नहीं।
समाधान — ‘मैं नहीं जानता’ की शक्ति
तो बाहर निकलने की चाबी क्या है?
“मैं नहीं जानता।”
……..
इसका मतलब अज्ञान नहीं।
इसका मतलब है—
जिज्ञासा।
खुलापन।
विनम्रता।
जब आप कहते हैं—
“मैं नहीं जानता”
तभी आप सीखना शुरू करते हैं।
दुनिया के सबसे महान दिमाग
इसी हैरानी में जिए—
यह क्या है?
यह कैसे होता है?
तो अगली बार
जब भीतर से आवाज़ आए—
“मैं यह जानता हूँ”—
बस एक पल रुकिए।
और पूछिए—
“क्या सच में मैं जानता हूँ?
या यह सिर्फ़ मन का एक और बादल है?”
अज्ञानी कहता है—
“मैं जानता हूँ।”
ज्ञानी जानता है—
“मैं चेतना हूँ,
विचारों का गवाह।”
सच्चा ज्ञान
कुछ जान लेने में नहीं,
होने में है।
आप ज्ञान पाते नहीं—
आप स्वयं ज्ञान हैं।
और यह यात्रा
“मैं जानता हूँ” से नहीं,
बल्कि—
“मैं कौन हूँ?”
इस सवाल से शुरू होती है।
अगर ये बातें
आपके भीतर कुछ हिला गई हों,
तो इस आत्म-खोज की यात्रा में
“सचेतन” से जुड़े रहिए।हम साथ-साथ
इस झूठ से आज़ादी की ओर बढ़ेंगे।
