सचेतन- 26 सबसे बड़ा झूठ जो आपका मन हर पल आपसे बोलता है
क्या हो अगर
आपको बताया गया सबसे बड़ा झूठ
किसी और ने नहीं…
आपके अपने मन ने बताया हो?
और वो भी—
हर सेकंड।
हर पल।
वो आवाज़ जो कहती है—
“मैं सोच रहा हूँ।”
“मैं कर रहा हूँ।”
“मैं देख रहा हूँ।”
लेकिन एक पल रुककर सोचिए—
अगर यह “मैं” ही असली न हो तो?
अगर यह सिर्फ़ एक नक़ली पहचान हो—
जो उस शक्ति का क्रेडिट ले रही हो
जो असल में उसकी है ही नहीं?
एक बहुत पुराना, गहरा ज्ञान है
जो इस भ्रम का पर्दा हटा देता है।
और जब आप उसे सच में देख लेते हैं,
तो अहंकार की पूरी इमारत
धीरे-धीरे ढहने लगती है।
आपके मन में बैठा नक़ली ‘मैं’
सुबह आँख खुलते ही
आपके सिर में एक कथावाचक चालू हो जाता है।
“मैं जानता हूँ।”
“मुझे यह चाहिए।”
“मुझे ऐसा लग रहा है।”
हम पूरी ज़िंदगी
इसी आवाज़ को
अपना असली रूप मान लेते हैं।
जैसे यही “मैं”
हमारी ज़िंदगी का CEO हो—
जो हर सोच और हर काम का मालिक है।
लेकिन यही “मैं”
हमारे ज़्यादातर तनाव और दुखों की जड़ है।
क्योंकि जब हम खुद को
इस छोटे, नाज़ुक “मैं” मान लेते हैं,
तो डर शुरू हो जाता है—
असफल होने का डर।
लोग क्या कहेंगे, इसका डर।
पर्याप्त न होने का डर।
यह अहंकार
एक बहुत सख़्त बॉस है।
उसे हमेशा सही होना है,
कंट्रोल चाहिए,
और मान्यता चाहिए।
और इसकी पहचान टिकी होती है—
पद, उपलब्धियाँ,
और दूसरों की राय पर।
लेकिन सच्चाई यह है—
यह पहचान की भूल है।
और इसी भूल को
8वीं शताब्दी के एक महान ग्रंथ
आत्मबोध में
आदि शंकराचार्य
बहुत साफ़ शब्दों में दिखाते हैं।
आत्मबोध से आने वाला खुलासा
आत्मबोध का श्लोक 26 कहता है—
आत्मा कोई क्रिया नहीं करती,
और बुद्धि अपने आप चेतन नहीं है।
फिर भी जीव भ्रम में
खुद को जानने वाला और देखने वाला मान लेता है।
अब इसे बहुत आसान भाषा में समझिए।
आपका असली स्वरूप—
आत्मा—
कुछ करता नहीं है।
वो कमरे की खाली जगह जैसा है।
फर्नीचर आता-जाता है,
पर जगह कुछ नहीं करती—
वो बस है।
इसलिए आत्मा
“जानने” की क्रिया नहीं कर सकती।
अब मन को देखिए—
आपकी बुद्धि।
वो एक औज़ार है।
एक मशीन।
बल्ब की तरह।
बल्ब अपने आप रोशनी नहीं बना सकता।
उसे बिजली चाहिए।
उसी तरह मन
विचार तो बना सकता है,
लेकिन चेतना नहीं।
तो फिर
“मैं जानता हूँ”
यह अनुभव आता कहाँ से है?
यहीं पर भ्रम पैदा होता है।
जब आत्मा की चेतना
मन से होकर गुजरती है,
तो मन कह उठता है—
“मैं जान रहा हूँ।”
जैसे बल्ब कह दे—
“मैं चमक रहा हूँ,”
और बिजली को पूरी तरह भूल जाए।
असल में
चेतना आत्मा की है।
मन सिर्फ़ माध्यम है।
लेकिन यह नक़ली “मैं”
पूरा क्रेडिट खुद ले लेता है।
‘कोई नहीं होने’ की आज़ादी
अब ज़रा सोचिए—
अगर यह सच समझ में आ जाए
तो क्या बदलता है?
बहुत कुछ।
सबसे पहले—
दबाव ख़त्म होने लगता है।
खुद को साबित करने की ज़रूरत।
हर नतीजे की ज़िम्मेदारी।
सफलता और असफलता का बोझ।
जब आप देख लेते हैं
कि आप “करने वाले” नहीं हैं,
तो ज़िंदगी हल्की हो जाती है।
काम होते हैं,
लेकिन आपके ज़रिये—
आपके द्वारा नहीं।
विचार आते हैं,
पर आप उन्हें पकड़ते नहीं।
आप बादल नहीं हैं।
आप आकाश हैं।
डर इसलिए कम हो जाता है
क्योंकि अब बचाने के लिए
कोई छोटा “मैं” बचा ही नहीं।
चिंता शांत होने लगती है
क्योंकि हर विचार से
आप अपनी पहचान नहीं जोड़ते।
आप लहर नहीं रहते—
आप पूरा समुद्र बन जाते हैं।
सबसे बड़ा झूठ यही है—
कि आप अपने मन की आवाज़ हैं।
कि आप सोचने वाले हैं।
कि आप करने वाले हैं।
प्राचीन ज्ञान
हमें बस यह याद दिलाता है—
आप वो नहीं हैं।
आप वो शांत चेतना हैं
जिसमें यह सब घट रहा है।
मन एक औज़ार है।
अहंकार एक भ्रम है।
और जिस पल
आप इस झूठ पर विश्वास करना छोड़ देते हैं—
उसी पल
सच्ची आज़ादी शुरू होती है।
आप कहानी के किरदार नहीं हैं।
आप वो जगह हैं
जहाँ पूरी कहानी घट रही है।
अगर यह बात
कहीं भीतर गूँज गई हो,
और आप इस समझ को
और गहराई से जीना चाहते हों—
तो “सचेतन” से जुड़े रहिए।
और चाहें तो
अपने अनुभव कमेंट में ज़रूर साझा करें।
धन्यवाद।
