सचेतन- 27 इस 5 मिनट की बात ने मेरी सालों पुरानी चिंता खत्म कर दी

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सचेतन- 27 इस 5 मिनट की बात ने मेरी सालों पुरानी चिंता खत्म कर दी

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मैं पूरी ज़िंदगी एक ही लाइन पर जी रहा था—

“अगर कुछ ग़लत हो गया तो?”

यह एक छोटा-सा सवाल था,
लेकिन यही सवाल
हर मौके को डर में बदल देता था।

मैं शरीर से तो सामने मौजूद रहता था,
लेकिन मेरा मन
हज़ारों ऐसे भविष्य में जी रहा होता था
जो अभी आए ही नहीं थे।

लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ—
कि सिर्फ़ एक लाइन बदलने से
सब कुछ बदल सकता है?

एक ऐसी लाइन,
जो मुझे प्राचीन ज्ञान में मिली
और जिसने मेरी चिंता को जड़ से हिला दिया।

कहानी: रस्सी और साँप

मेरी चिंता मामूली नहीं थी।
मैं हर समय खतरे ढूँढता रहता था।

किसी ने देर से जवाब दिया—
तो मन बोला, “कुछ गड़बड़ है।”

बॉस का छोटा-सा मैसेज—
तो मन बोला, “अब नौकरी गई।”

मैं बातचीत को बार-बार
मन में दोहराता रहता था,
जब तक उसका कोई मतलब ही न रह जाए।

फिर मुझे
वेदांत की एक पुरानी कहानी पता चली—

शाम के अँधेरे में
एक आदमी रास्ते पर
कुछ पड़ा देखता है।

उसे लगता है—
साँप है।

डर के मारे भाग जाता है।

अगली सुबह
हिम्मत करके लौटता है
तो देखता है—

वहाँ सिर्फ़ एक रस्सी थी।

साँप कभी था ही नहीं।
डर असली था,
लेकिन वजह ग़लत थी।

और मुझे लगा—
यही तो मेरी ज़िंदगी है।

मैं हर चीज़ पर
खतरा थोप देता था
जो असल में नुकसानदेह थी ही नहीं।

और मैं उन साँपों से लड़ता रहा
जो थे ही नहीं।

बदलाव का पल: असली सीख

मुझे समझ आया—

समस्या साँप से लड़ने की नहीं है।
समस्या है—
रोशनी न होने की।

मुझे एक बहुत सरल बात समझ में आई,
जो वेदांत सिखाता है—

हम अपने विचार नहीं हैं।
हम उन विचारों को देखने वाले हैं।

इस एक लाइन ने
सब कुछ बदल दिया—

“मैं विचार नहीं हूँ, मैं विचारों का गवाह हूँ।”

इसे थोड़ा आसान करते हैं।

आपका मन
आसमान जैसा है।

और आपके विचार—
बादलों जैसे।

बादल आते हैं,
जाते हैं।

लेकिन आसमान
वैसा ही रहता है।

मैं सालों तक सोचता रहा—
“मैं चिंतित हूँ।”

जैसे चिंता ही मेरी पहचान हो।

लेकिन सच यह है—

चिंता मेरे अंदर आ रही थी,
मैं चिंता नहीं था।

5 मिनट का आसान अभ्यास

यह सिर्फ़ समझने की बात नहीं है,
यह करने की बात है।

अगली बार जब चिंता आए,
तो बस यह कीजिए—

पहला कदम: रुकिए

जो कर रहे हैं,
बस एक पल रुकिए।

एक गहरी साँस लीजिए।

बस इतना।

दूसरा कदम: नाम दीजिए

अपने आप से कहिए—

“चिंता आ रही है।”

यह मत कहिए—
“मैं चिंतित हूँ।”

फर्क महसूस कीजिए।

तीसरा कदम: याद दिलाइए

धीरे से अपने आप से कहिए—

“मैं इस चिंता को देख रहा हूँ।
मैं यह चिंता नहीं हूँ।”

बस देखिए।
लड़िए मत।
भगाइए मत।

जैसे बादल को देखते हैं।

आप पाएँगे—
विचार कमज़ोर पड़ने लगते हैं।

क्योंकि अब
आप उनके अंदर नहीं हैं,
उनके बाहर खड़े हैं।

शांति का मतलब यह नहीं
कि चिंता कभी आएगी ही नहीं।

शांति का मतलब है—

चिंता आए,
लेकिन वह आपको छू न पाए।

आप तूफ़ान नहीं हैं।
आप आसमान हैं।

इस एक लाइन ने
मुझे मेरी ज़िंदगी वापस दे दी—

“मैं विचार नहीं हूँ,
मैं उनका साक्षी हूँ।”

आपको अँधेरे में
साँपों से लड़ने की ज़रूरत नहीं है।

बस
अपने भीतर की रोशनी जलाइए।

और आप देखेंगे—
जिनसे आप डर रहे थे,
वे कभी थे ही नहीं।

अगर यह बात
आपके दिल तक पहुँची हो,
तो इसे आज ही
अपने जीवन में आज़माइए।क्योंकि कभी-कभी
ज़िंदगी बदलने के लिए
सिर्फ़ 5 मिनट काफी होते हैं

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