सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात

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सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात

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सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात

क्या आपने कभी सोचा है—
इतना ध्यान करने के बाद भी
मन क्यों शांत नहीं होता?

क्यों भीतर कहीं यह भावना बनी रहती है—
“अभी कुछ और करना बाकी है…
अभी मुक्ति दूर है…”

आत्मबोध का आज का विचार
यहीं एक बहुत गहरी बात कहता है—

मुक्ति पाने की ज़रूरत नहीं है,
क्योंकि आप कभी बंधे ही नहीं थे।

ध्यान का सही अर्थ

आमतौर पर हम सोचते हैं—
ध्यान का मतलब है
कोई खास अनुभव पाना,
कोई विशेष अवस्था हासिल करना।

लेकिन शंकराचार्य बहुत स्पष्ट कहते हैं—

आत्मा का कोई नया अनुभव नहीं होता।

क्यों?

क्योंकि आत्मा तो
हर अनुभव में पहले से मौजूद है।

जैसे—
जब आप मेज़ देखते हैं,
तो क्या रोशनी का अनुभव नहीं हो रहा?

रोशनी के बिना
मेज़ दिखाई ही नहीं देगी।

ठीक वैसे ही—
हर ज्ञान में,
हर अनुभव में
चेतना पहले से ही है।

इसलिए ध्यान
आत्मा का अनुभव पाने के लिए नहीं है।

तो ध्यान किस लिए है?

ध्यान है—

पुरानी आदतों को छोड़ने के लिए।
पुरानी पहचान को ढीला करने के लिए।
गहरे बैठे डर, असुरक्षा और अपेक्षाओं को
समझकर गिराने के लिए।

हमारे भीतर लगातार यह माँग चलती रहती है—

  • कोई मुझे प्यार करे
  • कोई मेरा साथ दे
  • कोई मुझे सुरक्षित महसूस कराए

लेकिन आत्मबोध कहता है—

मैं स्वयं प्रेम का स्वरूप हूँ।
मुझे प्रेम चाहिए नहीं,
मैं प्रेम दे सकता हूँ।

यही समझ
निदिध्यासन है।

आत्मबोध के आज का विचार में शंकराचार्य
ध्यान के लिए कुछ वाक्य देते हैं—
ये वाक्य नहीं,
पहचान के सूत्र हैं।

वे कहते हैं—

मैं—

  • निर्गुण हूँ – मुझमें तुलना करने योग्य गुण नहीं
  • निष्क्रिय हूँ – मैं करने वाला नहीं
  • नित्य हूँ – मैं कभी नष्ट नहीं होता
  • निर्विकल्प हूँ – मुझमें भेद नहीं
  • निरंजन हूँ – मुझ पर कोई मैल नहीं
  • निर्विकार हूँ – मैं बदलता नहीं
  • निराकार हूँ – मेरा कोई रूप नहीं
  • नित्यमुक्त हूँ – मैं सदा मुक्त हूँ
  • निर्मल हूँ – मैं स्वभाव से ही शुद्ध हूँ

समस्या के अनुसार ध्यान

शंकराचार्य बहुत व्यावहारिक हैं।
वे कहते हैं—

हर समस्या का ध्यान अलग होगा।

अगर—

  • लगाव परेशान कर रहा है →
    मैं असंग हूँ
  • इच्छाएँ परेशान कर रही हैं →
    मैं तृप्त हूँ
  • क्रोध हावी है →
    मैं शांत हूँ
  • अधूरापन महसूस हो रहा है →
    मैं पूर्ण हूँ

ध्यान का अर्थ
एक ही वाक्य दोहराना नहीं है।

ध्यान का अर्थ है—
गलत धारणा के सामने
सही पहचान को टिकाना।

“नित्यमुक्त” का सबसे बड़ा रहस्य

सबसे बड़ी भूल यह है—

हम सोचते हैं कि
ध्यान करते-करते
एक दिन मुक्त हो जाएँगे।

शंकराचार्य साफ़ कहते हैं—

मुक्ति कोई भविष्य की घटना नहीं है।

अगर आप मुक्ति की तारीख
भविष्य में रखते हैं,
तो वह कभी नहीं आएगी।

जैसे क्षितिज—
जितना पास जाओ,
उतना दूर चला जाता है।

मुक्ति अभी है।
यहीं है।
इसी क्षण है।

बस उसे
स्वीकार करना है।

आत्मबोध के आज का विचार
हमें कुछ नया बनने को नहीं कहता।

यह बस याद दिलाता है—

आप—

बंधे नहीं हैं,
अशुद्ध नहीं हैं,
अधूरे नहीं हैं।

आप वही हैं—

जो सदा मुक्त है,
सदा शुद्ध है,
और सदा पूर्ण है।

ध्यान कोई साधना नहीं,
एक स्वीकृति है—

“मैं जैसा हूँ,
वैसा ही पूर्ण हूँ।”यही है
सचेतन जीवन है।

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