सचेतन- 33 –आत्मबोध – दुख, डर और अशांति आप नहीं हैं

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सचेतन- 33 –आत्मबोध – दुख, डर और अशांति आप नहीं हैं

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क्या आपने कभी महसूस किया है कि
मन लगातार बेचैन रहता है?

कभी चिंता,
कभी डर,
कभी किसी से लगाव,
तो कभी किसी से चिढ़।

और फिर हम कहते हैं—
“मैं बहुत परेशान हूँ।”

लेकिन ज़रा ठहरिए—

अगर यह परेशानी
आपकी नहीं,
आपके मन की हो तो?

आत्मबोध का श्लोक 33
यही क्रांतिकारी बात कहता है—

आप मन नहीं हैं,
और इसलिए दुख, डर, राग-द्वेष
आपके नहीं हैं।

आदि शंकराचार्य कहते हैं—

“मैं मन नहीं हूँ,
इसलिए दुख, लगाव, द्वेष और भय
मुझमें नहीं हैं।”

और वे यह भी कहते हैं कि
यह कोई कल्पना नहीं है,
यह उपनिषदों का स्पष्ट निर्देश है—

आत्मा
प्राण रहित है,
मन रहित है,
और शुद्ध है।

अब इसे बहुत सरल भाषा में समझते हैं।

हमारी आम शंका

यहाँ एक बहुत स्वाभाविक सवाल उठता है—

अगर मैं ब्रह्म हूँ,
अगर मैं शांति का स्वरूप हूँ,
तो फिर मैं इतना परेशान क्यों रहता हूँ?

क्यों मन हर समय उलझा रहता है?
क्यों डर और चिंता पीछा नहीं छोड़ते?

आत्मबोध इसका उत्तर देता है—

परेशानी आत्मा की नहीं है।
परेशानी मन की है।

लेकिन हमने मन को ही
“मैं” मान लिया है।

मन और “मैं” का भ्रम

जब मन में कोई विचार उठता है—
“कुछ गड़बड़ हो जाएगी”
तो हम कहते हैं— मैं डर गया।

जब मन किसी से चिपक जाता है—
तो हम कहते हैं— मुझे बहुत लगाव है।

जब मन नाराज़ होता है—
तो हम कहते हैं— मैं गुस्से में हूँ।

असल में हुआ क्या?

मन में जो हो रहा है,
उसे हमने अपने ऊपर ओढ़ लिया।

लेकिन आत्मबोध कहता है—

मन मिथ्या है,
और आत्मा सत्य है।

मिथ्या का अर्थ—
जो दिखाई तो देता है,
लेकिन स्थायी नहीं है।

आत्मा क्यों दुखी नहीं हो सकती?

श्लोक कहता है—

आत्मा
प्राण से रहित है—
यानी श्वास-प्रश्वास की गतिविधि से अलग।

आत्मा
मन से रहित है—
यानी विचारों की हलचल से अलग।

आत्मा
शुद्ध है—
यानी अज्ञान से भी अलग।

इसका अर्थ यह हुआ कि—

  • शरीर की परेशानी शरीर की है
  • मन की उलझन मन की है
  • भावनाओं का उतार-चढ़ाव मन का है

लेकिन आप—
आप वह चेतना हैं
जो यह सब देख रही है।

तीन शरीर और अंतिम समझ

वेदांत कहता है—

हम तीन स्तरों पर खुद को समझते हैं—

  1. स्थूल शरीर – यह दिखाई देने वाला शरीर
  2. सूक्ष्म शरीर – मन, बुद्धि, अहंकार
  3. कारण शरीर – अज्ञान, “मुझे नहीं पता” की अवस्था

पहले चरण में
हम समझते हैं—

मैं इनसे अलग हूँ।

यह द्वैत की अवस्था है—
मैं अलग, शरीर-मन अलग।

लेकिन आत्मबोध यहाँ नहीं रुकता।

अगले चरण में
वह कहता है—

ये तीनों शरीर
असल में स्वतंत्र सत्ता नहीं हैं।
ये नाम-रूप हैं।
कल्पना हैं।
अध्यास हैं।

सत्य तो केवल आत्मा है।

“अहं ब्रह्मास्मि” का सही अर्थ

जब हम कहते हैं—
“अहं ब्रह्मास्मि”,
तो उसका अर्थ यह नहीं कि—

मैं यह शरीर हूँ और ब्रह्म हूँ।

उसका सही अर्थ है—

जब मैं शरीर, मन, बुद्धि
सबको छोड़कर
केवल चेतना के रूप में स्थित हूँ—
तभी यह वाक्य सत्य है।

आत्मबोध का श्लोक 33  हमें एक गहरी राहत देता है—

दुख आपका नहीं है।
डर आपका नहीं है।
अशांति आपकी नहीं है।

ये सब
मन की तरंगें हैं।

आप वह शांत समुद्र हैं
जिसमें ये लहरें उठती और मिटती हैं।

जब यह समझ
बार-बार याद आती है,

तो जीवन की हलचल
आपको छूती तो है,
लेकिन हिला नहीं पाती।

यही है
असली शांति।

यही है
सचेतन होना।

अगर यह बात
आपके भीतर कुछ खोल गई हो,
तो इस यात्रा में
हम साथ आगे बढ़ें—सचेतन के साथ। 🙏

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