सचेतन- 15: आत्मबोध की यात्रा “मैं कौन हूँ — या सिर्फ़ परतों का रंग?”
नमस्कार मित्रों,
क्या कभी ऐसा हुआ है कि—
आप हँस रहे हैं…
लेकिन भीतर कुछ भारी है?
सब आपको मज़बूत समझते हैं…
लेकिन मन चाहता है कि
कोई बस पूछ ले—
“तुम ठीक हो?”
आज का सवाल बहुत छोटा है,
लेकिन बहुत गहरा है—
“मैं कौन हूँ?”
क्या मैं वही हूँ जो दिखता हूँ?
क्या मैं वही हूँ
जो लोग मेरे बारे में सोचते हैं?
क्या मैं वही हूँ
जो मैं दुनिया को दिखाता हूँ?
या फिर…
मैं इन सबसे कुछ और हूँ?
आज की यह बात
किसी परीक्षा के लिए नहीं है।
यह बस एक याद दिलाना है।
अगर मन थोड़ा खुला हो,
तो मेरे साथ चलिए।
क्रिस्टल की छोटी-सी कहानी
कल्पना कीजिए—
एक बिल्कुल साफ़,
बेरंग क्रिस्टल।
उसके पास नीला कपड़ा रख दें—
वह नीला दिखने लगता है।
लाल कपड़ा रख दें—
वह लाल दिखने लगता है।
लेकिन क्या क्रिस्टल सच में बदल जाता है?
नहीं।
वह बस रंग पकड़ता है।
हमारी भावनाएँ,
हमारी भूमिकाएँ,
हमारे नाम और पहचान—
ये सब रंग हैं।
और हम?
हम वह क्रिस्टल हैं।
आत्मबोध का सूत्र — शंकराचार्य की दृष्टि
हज़ारों साल पहले
आदि शंकराचार्य ने आत्मबोध में लिखा:
“पञ्चकोशादियोगेन
तत्तन्मय इव स्थितः।
शुद्धात्मा नीलवस्त्रादियोगेन
स्फटिको यथा॥”
सरल अर्थ—
शुद्ध आत्मा,
शरीर-मन की परतों से जुड़कर
उन्हीं जैसी दिखने लगती है,
जैसे क्रिस्टल पास के कपड़े का रंग पकड़ लेता है।
यहाँ कहा गया है—
आत्मा बदलती नहीं,
बदली हुई दिखती है।
अब सवाल है—
ये परतें कौन-सी हैं?
आदि शंकराचार्य कहते हैं—
जैसे क्रिस्टल
पास के कपड़े का रंग पकड़ लेता है,
वैसे ही हमारी आत्मा
शरीर और मन की परतों से जुड़कर
उन्हीं जैसी दिखने लगती है।
लेकिन भीतर से
वह हमेशा शुद्ध रहती है।
पहली परत — शरीर
हम सबसे पहले कहते हैं—
“मैं यह शरीर हूँ”
मैं थक गया हूँ
मैं बीमार हूँ
मैं सुंदर हूँ
लेकिन ज़रा सोचिए—
आपका बचपन का शरीर कहाँ है?
वह तो बदल गया।
जो बदलता है,
वह आप नहीं हो सकते।
आप शरीर को जानते हैं,
इसलिए—
दूसरी परत — मन और भावनाएँ
अब हम कहते हैं—
“मैं दुखी हूँ”
“मैं परेशान हूँ”
“मैं डर गया हूँ”
लेकिन दुख कहाँ होता है?
मन में।
विचार आते हैं,
विचार जाते हैं।
जैसे आकाश में बादल—
बादल आते-जाते हैं,
आकाश वही रहता है।
विचार बादल हैं,
और आप आकाश हैं।
👉 आप मन नहीं हैं।
बुद्धि और नींद
अब कहते हैं—
“मैं समझदार हूँ”
“मुझसे यह नहीं हुआ”
यह बुद्धि है—
एक औज़ार।
लेकिन औज़ार चलाने वाला
औज़ार नहीं होता।
फिर आती है गहरी नींद—
जहाँ न शरीर याद रहता है,
न मन,
न दुनिया।
फिर भी सुबह कहते हैं—
“नींद बहुत अच्छी थी।”
किसने जाना?
👉 वह आप थे।
तो फिर मैं कौन हूँ?
अगर मैं—
शरीर नहीं हूँ
मन नहीं हूँ
भावना नहीं हूँ
बुद्धि नहीं हूँ
तो मैं क्या हूँ?
👉 जो सबको जानता है।
👉 जो सब देखता है।
👉 जो बदलता नहीं।
आप साक्षी चेतना हैं।
जैसे सिनेमा का पर्दा—
फिल्म बदलती है,
पर्दा नहीं।
शांति और एकता
जब यह समझ आने लगती है—
दुख हल्का हो जाता है,
डर ढीला पड़ जाता है।
और सबसे सुंदर बात—
यह चेतना
सिर्फ़ आप में नहीं है।
यह मुझमें भी है,
और हर इंसान में भी।
हम सब अलग कहानियाँ हैं,
लेकिन एक ही चेतना पर चल रही हैं।
अंत में बस इतना
आपको कुछ बनना नहीं है।
कुछ पाना नहीं है।
बस याद करना है—
आप परतों का रंग नहीं हैं।
आप वह शुद्ध क्रिस्टल हैं।
शांत।
जागरूक।
पूर्ण।
🙏
