सचेतन- 01:  आत्मबोध की यात्रा -स्वयं को जानने की शुरुआत

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सचेतन- 01:  आत्मबोध की यात्रा -स्वयं को जानने की शुरुआत

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आत्मबोध — स्वयं को जानने की शुरुआत

“क्या आपने कभी अपने आप से पूछा है—
मैं कौन हूँ?

नाम… पद… पहचान…
ये सब तो बाहर के शब्द हैं।

लेकिन जो भीतर महसूस करता है—
वह कौन है?”

भीतर की पुकार 

“हर इंसान के जीवन में
एक ऐसा क्षण आता है
जब वह रुकता है।

सब कुछ होते हुए भी
कुछ अधूरा लगता है।

मन पूछता है—
क्या यही जीवन है?
क्या यही मैं हूँ?

यहीं से आत्मबोध की यात्रा शुरू होती है—
खुद को जानने की यात्रा।”

“आत्मबोध का अर्थ है—
स्वयं को जानना।

वह जानना कि
मैं केवल यह शरीर नहीं हूँ,
मैं केवल यह मन नहीं हूँ।

प्राचीन भारत की शिक्षा का यही उद्देश्य था—
इंसान को बाहर नहीं,
भीतर की ओर ले जाना।

शंकराचार्य और आत्मबोध

“आदि शंकराचार्य ने
वेदांत के गहन ग्रंथों से पहले
कुछ छोटे ग्रंथ लिखे—
ताकि साधक की बुद्धि तैयार हो सके।

आत्मबोध
उन्हीं में से एक है।

सिर्फ़ 68 श्लोकों में
शंकराचार्य बताते हैं—
आत्मा क्या है,
उसे जानने का मार्ग क्या है,
और आत्मबोध से
जीवन कैसे बदलता है।”

आत्मबोध का पहला श्लोक

तपोभिः क्षीणपापानां शान्तानां वीतरागिणाम् ।
मुमुक्षूणामपेक्ष्योऽयमात्मबोधो विधीयते ॥१॥

🌼 सरल अर्थ

यह ग्रन्थ उन लोगों के लिए है—

  • जिन्होंने तप और साधना से
    अपने भीतर की अशुद्धियाँ कम की हैं
  • जिनका मन अब कुछ हद तक शांत हो गया है
  • जो राग-द्वेष और आसक्ति से
    धीरे-धीरे मुक्त हो रहे हैं
  • और जिनके भीतर
    मोक्ष की सच्ची इच्छा (मुमुक्षुत्व) जाग चुकी है

ऐसे साधकों के लिए
शंकराचार्य यह ग्रन्थ रचते हैं —
ताकि वे स्वयं को पहचान सकें।

“आत्मबोध का पहला श्लोक
हमें बताता है कि
यह ज्ञान किसके लिए है—

उनके लिए
जिनका मन तप से शुद्ध हुआ है,
जिनका चित्त शांत हुआ है,
जिनके भीतर से
राग और आसक्ति ढीली पड़ने लगी है,
और जिनके दिल में
मोक्ष की सच्ची इच्छा जाग चुकी है।”

“यानी आत्मबोध
तैयार मन के लिए है—
जागते हुए हृदय के लिए है।”

आत्मबोध क्यों ज़रूरी है? 

“आज हम बहुत कुछ जानते हैं—
पर खुद को नहीं जानते।

दुनिया की खबरें हैं,
पर भीतर की आवाज़ नहीं सुनी।

आत्मबोध हमें याद दिलाता है—
शांति बाहर नहीं,
पहचान के भीतर है।

जब आत्मबोध होता है,
तो डर ढीला पड़ जाता है,
अहंकार हल्का हो जाता है,
और जीवन सरल हो जाता है।”

“यह सचेतन के विचार का सत्र
आपको कोई नया व्यक्ति नहीं बनाएगा।
यह आपको
वही बना देगा जो आप हमेशा से थे।

इस यात्रा में
ना जल्दी है,
ना ज़ोर।

बस सुनिए…
ठहरिए…
और खुद से मिलिए।

स्वागत है
आत्मबोध की यात्रा में।Stay Sachetan…
Stay Aware…
Stay True.”

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