सचेतन- 16: आत्मबोध की यात्रा -आप सिर्फ एक छिलका हैं असली चावल तो अंदर है
आप सोचते हैं कि आप अपने विचारों को कंट्रोल करते हैं, है ना? लेकिन क्या हो, अगर मैं कहूँ कि आपके विचार, आपकी भावनाएँ, और यहाँ तक कि आपका ये शरीर… आप हैं ही नहीं?
सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा, पर क्या हो अगर वो, जिसे आप ‘मैं’ समझते हैं, वो असल में आप हो ही नहीं? आज मैं एक ऐसा राज़ खोलने वाला हूँ, जिसे हज़ारों सालों से हमारे ऋषि-मुनि समझाते आए हैं: आप सिर्फ एक छिलका हैं… असली, कीमती चावल तो अंदर छिपा है।
तो चलिए, आज उस छिलके की परतों को एक-एक करके उतारते हैं और उस असली चावल को ढूँढ़ते हैं, जो आप सच में हैं। इस सफ़र में मेरे साथ अंत तक बने रहिएगा, क्योंकि हो सकता है इस वीडियो के खत्म होने तक, खुद को देखने का आपका नज़रिया हमेशा के लिए बदल जाए।
“आप सिर्फ़ एक छिलका हैं, असली चावल तो अंदर है”
नमस्कार मित्रों,
आज मैं आपसे एक बहुत साधारण बात करने आया हूँ।
कोई भारी शब्द नहीं,
कोई कठिन दर्शन नहीं।
बस एक छोटी सी समझ।
आज का सवाल है—
“क्या जो मैं हूँ, वही सच में मैं हूँ?”
🌾 धान और चावल की बात
क्या आपने कभी धान देखा है?
धान के बाहर एक सख़्त छिलका होता है।
वह छिलका खाने लायक नहीं होता।
वह सिर्फ़ बाहर से ढकता है।
लेकिन उसी छिलके के अंदर
साफ़, सफ़ेद चावल होता है।
वही असली होता है।
वही हमें पोषण देता है।
अगर कोई छिलके को ही चावल समझ ले,
तो क्या होगा?
न पेट भरेगा,
न स्वाद मिलेगा।
इसलिए धान को कूटा जाता है,
छिलका हटाया जाता है,
और चावल अलग किया जाता है।
🌱 अब ज़रा खुद को देखिए
हम भी कुछ ऐसे ही हैं।
हम भी कई परतों में ढके हुए हैं।
हम कहते हैं—
“मैं यह शरीर हूँ”
“मैं दुखी हूँ”
“मैं परेशान हूँ”
“मैं सफल हूँ”
“मैं असफल हूँ”
लेकिन ज़रा रुकिए…
क्या आप सच में ये सब हैं?
या ये सब
आपके ऊपर चढ़ी हुई परतें हैं?
👤 पहली परत – शरीर
यह शरीर बदलता रहता है।
बचपन का शरीर चला गया।
आज का शरीर अलग है।
कल फिर बदलेगा।
जो बदलता है,
वह स्थायी ‘मैं’ कैसे हो सकता है?
आप शरीर को जानते हैं।
आप कहते हैं—
“मेरे पैर में दर्द है।”
जो जानता है,
वह जाना हुआ नहीं होता।
👉 इसलिए आप शरीर नहीं हैं।
🧠 दूसरी परत – मन और विचार
अब मन को देखिए।
कभी खुशी,
कभी डर,
कभी चिंता।
विचार आते हैं,
विचार जाते हैं।
अगर आप विचारों को देख पा रहे हैं,
तो आप विचार कैसे हो सकते हैं?
👉 इसलिए आप मन भी नहीं हैं।
🌧️ तीसरी परत – भावनाएँ
दुख आता है,
फिर चला जाता है।
खुशी आती है,
फिर बदल जाती है।
जैसे आसमान में बादल आते-जाते हैं।
बादल बदलते हैं,
आसमान नहीं।
👉 आप भावनाएँ नहीं हैं।
आप वह हैं
जो भावनाओं को देख रहा है।
🌟 तो फिर असली चावल कौन है?
अगर मैं शरीर नहीं हूँ,
मन नहीं हूँ,
भावना नहीं हूँ—
तो मैं क्या हूँ?
मैं हूँ—
वह शांत साक्षी
जो सबको देख रहा है।
जो कभी बदलता नहीं।
जो हमेशा मौजूद है।
वही असली चावल है।
वही आत्मा है।
🌼 आज का छोटा अभ्यास
आज जब दुख आए,
बस इतना कहिए—
“दुख आया है… मैं उसे देख रहा हूँ।”
जब मन भागे,
कहिए—
“विचार चल रहे हैं… मैं उन्हें देख रहा हूँ।”
यही जागरूकता
छिलके से चावल तक पहुँचने का रास्ता है।
🙏 समापन
आपको कुछ बनना नहीं है।
आप पहले से पूरे हैं।
बस
छिलकों को पहचानना है
और
अपने असली स्वरूप को याद करना है।
आप छिलका नहीं हैं।
आप असली चावल हैं।
शांत रहिए।
जागरूक रहिए।
खुद से जुड़े रहिए।
सचेतन।
