सचेतन- 19:भागते हुए चाँद का वो रहस्य जो शंकराचार्य ने बताया

SACHETAN  > Atmbodh, Manushyat-मनुष्यत, Uncategorized, vedant >  सचेतन- 19:भागते हुए चाँद का वो रहस्य जो शंकराचार्य ने बताया

सचेतन- 19:भागते हुए चाँद का वो रहस्य जो शंकराचार्य ने बताया

| | 0 Comments

“भागते हुए चाँद का रहस्य—जो चलता दिखता है, वो आप नहीं हैं”

 कभी रात में आसमान को देर तक देखा है?
खासकर तब, जब बादल तेज़ी से भाग रहे हों?
एक पल को लगता है—चाँद ही भाग रहा है।
पर सच क्या है?
चाँद नहीं भागता… बादल भागते हैं।
और वही भागते बादल हमें धोखा दे देते हैं।

आज इसी छोटे से धोखे में
जीवन का बहुत बड़ा रहस्य छुपा है—
“मैं कौन हूँ?”

भाग 1: क्या ये धोखा हमारी ज़िंदगी जैसा है?

अब ज़रा सोचिए…
क्या हो अगर ये “भागता हुआ चाँद”
हमारी पूरी ज़िंदगी की कहानी हो?

हम रोज़ बोलते हैं—
“मैं परेशान हूँ”
“मैं दुखी हूँ”
“मैं गुस्से में हूँ”
“मैं डर गया”

लेकिन ये सब कहाँ होता है?
मन में।
शरीर में।
इन्द्रियों में।

फिर हम ये कैसे कह देते हैं—
“मैं ही दुख हूँ, मैं ही डर हूँ”?

यहाँ ही भ्रम शुरू होता है।

भाग 2: शंकराचार्य क्या कहते हैं?

आदि शंकराचार्य ने आत्मबोध में एक श्लोक कहा है:

“व्यापृतेष्विन्द्रियेष्वात्मा…
धावन्निव यथा शशी।”

सरल अर्थ:
जैसे बादल चलते हैं,
और चाँद चलता हुआ लगता है—
वैसे ही,
जब हमारी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि काम करते हैं,
तो आत्मा भी “कर्ता” लगने लगती है।
लेकिन आत्मा कर्ता नहीं है।
वह तो सिर्फ साक्षी है—देखने वाली चेतना।

भाग 3: चाँद कौन है, बादल कौन?

चाँद—
आपकी आत्मा
शांत, स्थिर, उजली

बादल—
शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि
जो हर समय बदलते रहते हैं

आँख देखती है—मन कहता है “मैं देख रहा हूँ।”
मन दुखी होता है—आप कह देते हैं “मैं दुखी हूँ।”
शरीर थकता है—आप बोल देते हैं “मैं थक गया।”

यह वही गलती है—
बादलों की गति चाँद पर चिपका देना।

भाग 4: तो सच क्या है?

सच ये है—
आप वो नहीं हैं जो चल रहा है।
आप वो हैं जो देख रहा है।

मन में विचार उठते हैं—
आप उन्हें देख सकते हैं।
भावनाएँ आती-जाती हैं—
आप उन्हें जान सकते हैं।
शरीर बदलता है—
आप उसे महसूस कर सकते हैं।

जो देखने वाला है,
वो देखी जाने वाली चीज़ नहीं हो सकता।

इसलिए—
आप बादल नहीं हैं।
आप चाँद हैं।
आप साक्षी हैं।

इस ज्ञान का रोज़ का अभ्यास

अब सबसे काम की बात—
इसे जीवन में कैसे उतारें?

अगली बार जब गुस्सा आए—
ये मत कहिए “मैं गुस्सा हूँ।”
बस कहिए—
“मन में गुस्सा आया है।”

चिंता आए—
“मन में चिंता के बादल हैं।”

दुख आए—
“मन में दुख की लहर उठी है।”

बस इतना सा फर्क—
और आप अपने दर्द से अलग होने लगते हैं।
दर्द रहेगा,
पर वह आपको तोड़ेगा नहीं।

तो अगली बार
जब बादल तेज़ चलें
और चाँद भागता हुआ लगे—
मुस्कुरा दीजिए।

और खुद से कहिए—
“जैसे चाँद नहीं भागता,
वैसे ही मैं भी नहीं भाग रहा।
चल तो मन रहा है…
मैं तो बस देख रहा हूँ।”

आपका असली स्वरूप
शांत प्रकाश है।
यही आत्मबोध है।
यही सचेतन है।अगर ये बात दिल को छू गई हो,
तो इसे किसी एक व्यक्ति तक ज़रूर पहुँचाइए—
क्योंकि कभी-कभी
एक छोटा सा “सच”
किसी की पूरी ज़िंदगी बदल देता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *