सचेतन- 17: आत्मा हर जगह है, फिर भी हमें दिखती क्यों नहीं?
नमस्कार मित्रों,
आज सचेतन में एक बहुत ही सरल,
पर बहुत गहरी बात पर बातचीत करेंगे।
एक सवाल से शुरू करते हैं—
क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि
सब कुछ होते हुए भी
कुछ अधूरा-सा है?
लोग हैं, काम है,
हँसी भी है…
फिर भी भीतर कहीं
एक दूरी-सी,
एक खालीपन-सा।
हम सोचते हैं—
शायद कुछ मिल जाए,
तो यह भर जाएगा।
कोई रिश्ता,
कोई सफलता,
कोई ज्ञान,
कोई साधना।
लेकिन फिर भी…
वह कमी बनी रहती है।
आज आदि शंकराचार्य
आत्मबोध के एक छोटे से श्लोक में
इस पूरे रहस्य को
बहुत आसान तरीके से समझाते हैं।
असली समस्या क्या है?
हम मान लेते हैं कि
जिस शांति, जिस आत्मा,
जिस “सच्चे मैं” को हम खोज रहे हैं—
वह कहीं बाहर है।
हम कहते हैं—
“मुझे खुद को पाना है”
“मुझे ईश्वर से जुड़ना है”
“मुझे आत्मा को देखना है”
लेकिन यही मान्यता
हमारी सबसे बड़ी भूल है।
यह बिल्कुल वैसा है जैसे—
गले में माला पहनकर
हम घर-घर उसे ढूँढते फिरें।
माला कभी खोई ही नहीं थी।
बस ध्यान बाहर था।
शंकराचार्य का सूत्र (श्लोक 17)
श्लोक कहता है—
आत्मा सदा और सर्वत्र है,
फिर भी हर जगह प्रकट नहीं होती।
वह केवल बुद्धि में ही प्रकट होती है,
जैसे साफ़ दर्पण में प्रतिबिंब।
अब इसे बहुत आसान उदाहरण से समझते हैं।
सूरज और दर्पण का उदाहरण
सूरज आकाश में है।
क्या सूरज हर जगह है?
हाँ।
लेकिन क्या सूरज हर जगह दिखाई देता है?
नहीं।
अगर शीशा गंदा हो—
तो सूरज नहीं दिखेगा।
अगर शीशा साफ़ हो—
तो सूरज तुरंत दिखने लगेगा।
क्या सूरज नया आया?
नहीं।
बस…
दर्पण साफ़ हुआ।
आत्मा और हमारी बुद्धि
आत्मा भी बिल्कुल ऐसी ही है।
आत्मा
दीवार में भी है,
पेड़ में भी है,
आपमें भी है।
लेकिन वह दिखती कहाँ है?
केवल वहाँ,
जहाँ माध्यम साफ़ हो।
वह माध्यम है—
बुद्धि।
बुद्धि यानी
समझने की शक्ति,
जागरूकता,
होश।
जब बुद्धि उलझी होती है—
डर, चिंता, तुलना,
अहंकार, अपेक्षा से भरी—
तो आत्मा छिपी हुई लगती है।
जब बुद्धि शांत होती है—
तो आत्मा अपने आप झलकने लगती है।
इसलिए हम “मैं” कहते हैं
जब आप कहते हैं—
“मैं जानता हूँ”
“मैं देख रहा हूँ”
“मैं समझ रहा हूँ”
यह “मैं”
शरीर नहीं है।
यह मन भी नहीं है।
यह आत्मा है
जो बुद्धि में
प्रतिबिंबित हो रही है।
इसीलिए पत्थर में चेतना नहीं दिखती,
और इंसान में दिखती है।
आत्मा दोनों में है,
पर दर्पण केवल एक के पास है।
🌱 हमें क्या करना है?
हमें आत्मा को
कहीं ढूँढने नहीं जाना।
हमें बस
अपनी बुद्धि को
थोड़ा साफ़ करना है।
कैसे?
• विचारों को बस देखना
• भावनाओं से थोड़ा पीछे हटना
• हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया न देना
• कभी-कभी चुप बैठना
यही “दर्पण साफ़ करना” है।
एक छोटा सा अभ्यास
आज जब कोई विचार आए—
बस कहिए:
“यह विचार है… मैं इसे देख रहा हूँ।”
जब कोई भावना आए—
कहिए:
“यह भावना है… मैं इसे जान रहा हूँ।”
जो देख रहा है,
जो जान रहा है—
वही आप हैं।
निष्कर्ष
आपको आत्मा बनना नहीं है।
आप आत्मा को पाना नहीं है।
आप पहले से वही हैं।
बस दर्पण साफ़ होता जाए—
तो जो सदा से था,
वह खुद ही चमक उठेगा।🙏
सचेतन
