सचेतन- 39 –आत्मबोध – “दृश्य जगत का आत्मा में विलय”

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सचेतन- 39 –आत्मबोध – “दृश्य जगत का आत्मा में विलय”

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क्या आपने कभी सोचा है—
दुनिया हमें इतना परेशान क्यों करती है?

क्यों किसी की बात चुभ जाती है,
क्यों किसी का जाना हमें तोड़ देता है,
और क्यों कुछ चीज़ें हमारे जीवन में
लगातार डर और दुख बन जाती हैं?

आत्मबोध के आज का विचार एक बहुत गहरी बात कहता है—

👉 समस्या दुनिया में नहीं है,
समस्या इस विश्वास में है
कि दुनिया मुझसे अलग और वास्तविक है।

शंकराचार्य कहते हैं—

बुद्धि द्वारा
पूरे दृश्य जगत को
आत्मा में ही विलीन करके,
उस एक, निर्मल आत्मा का
निरंतर चिंतन करो—
जो आकाश की तरह
सदा निष्कलंक है।

यह श्लोक
ध्यान की सबसे परिपक्व अवस्था बताता है।

दृश्य और द्रष्टा की मूल समस्या

हमारा सारा जीवन
दृश्य जगत में उलझा रहता है—

  • लोग
  • संबंध
  • शरीर
  • घटनाएँ
  • सुख–दुख

जब तक हम इन सबको
पूरी तरह वास्तविक मानते हैं,
तब तक प्रतिक्रिया आना तय है—

  • राग (आसक्ति)
  • द्वेष (नफरत)
  • भय (डर)

👉 जितनी ज़्यादा वास्तविकता,
उतनी ज़्यादा पीड़ा।

‘प्रविलाप्य’ – विलय का अर्थ

श्लोक में एक बहुत महत्वपूर्ण शब्द है—

प्रविलाप्य
यानि— विलीन करना।

इसका अर्थ
दुनिया को नष्ट करना नहीं है।

वेदांत में
घड़े को तोड़कर नहीं,
समझ से मिटाया जाता है।

जब आप समझते हैं—

घड़ा मिट्टी से अलग नहीं है,

तो घड़ा
अपने आप मिट्टी में
विलीन हो जाता है।

इसी तरह—

👉 जगत आत्मा से अलग नहीं है।
यह केवल नाम–रूप है।

नाम–रूप को ज़्यादा सच मानने की समस्या

हम दुखी इसलिए नहीं होते
कि कोई चीज़ चली गई—

हम दुखी इसलिए होते हैं
क्योंकि हमने उसे
बहुत ज़्यादा वास्तविक मान लिया।

जैसे—

समुद्र में लहरें आती-जाती रहती हैं।
अगर आप जानते हैं
कि लहर पानी ही है,
तो उसके जाने से दुख नहीं होता।

लेकिन अगर आप
किसी एक लहर से
भावनात्मक रूप से चिपक जाएँ—

तो उसके जाने से
दिल टूटता है।

👉 दुख का कारण लहर नहीं,
लहर को सच मानना है।

बुद्धि की भूमिका – कोई रहस्य नहीं

शंकराचार्य साफ कहते हैं—

धिया
यानि— बुद्धि द्वारा।

यह कोई रहस्यमय साधना नहीं है,
कोई चमत्कार नहीं है।

यह स्पष्ट समझ है—

  • मैं द्रष्टा हूँ
  • जगत दृश्य है
  • दृश्य मुझसे अलग नहीं
  • इसलिए मुझे बाँध नहीं सकता

यह समझ
धीरे–धीरे जीवन में उतरती है।

एक ही आत्मा का चिंतन

जब पूरा दृश्य जगत
आत्मा में विलीन हो जाता है—

तो बचता क्या है?

👉 एक ही आत्मा।

जैसे—

जब सारी लहरें
पानी में विलीन हो जाती हैं,
तो केवल पानी ही रहता है।

उसी तरह—

“मैं ही सबका आधार हूँ।”
“मुझसे अलग कुछ नहीं।”

इसी का नाम है—

एकम् आत्मानं भावयेत्

आकाश का उदाहरण

श्लोक कहता है—

निर्मल आकाशवत्

आकाश में—

  • बादल आते हैं
  • जाते हैं
  • धूल, धुआँ, पक्षी सब होते हैं

लेकिन—

👉 आकाश कभी गंदा नहीं होता।

सब कुछ
उसमें आता–जाता है,
पर उसे छूता नहीं।

इसी तरह—

आपमें विचार आते हैं,
भावनाएँ आती हैं,
घटनाएँ होती हैं—

लेकिन
आप उनसे अछूते रहते हैं।

‘सदा’ – निरंतर अभ्यास

शंकराचार्य कहते हैं—

सदा
यानि— हमेशा।

यह एक दिन का ध्यान नहीं,
यह जीवन की दृष्टि है।

बार–बार
नाम–रूप को सच मानने की आदत है,
तो बार–बार
इस समझ में लौटना पड़ेगा।

यही है—

👉 निदिध्यासन।

आत्मबोध में आज का यह विचार
हमें यह सिखाता है—

👉 दुनिया से भागना समाधान नहीं,
दुनिया को समझना समाधान है।

जब दृश्य जगत
आत्मा में विलीन हो जाता है—

  • प्रतिक्रिया कम हो जाती है
  • स्वीकार बढ़ जाता है
  • शांति सहज हो जाती है

तब जीवन
संघर्ष नहीं,
एक सुंदर प्रवाह बन जाता है।

आप आकाश की तरह हैं—
सब कुछ आपमें आता–जाता है,
लेकिन आप सदा
निर्मल और मुक्त रहते हैं।यही है
सचेतन साक्षात्कार। 🙏

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