सचेतन- 18:   मैं राजा हूँ, मेरे भीतर सब चल रहा है

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सचेतन- 18:   मैं राजा हूँ, मेरे भीतर सब चल रहा है

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क्या आपने कभी उस बेचैनी, उस हल्की-सी घबराहट पर गौर किया है जो हर समय हमारे साथ चलती रहती है? वो एक एहसास कि कुछ तो गड़बड़ है—बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि हमारे अपने अंदर। यह एक खामोश तकलीफ है, सीने में एक तनाव जिसके साथ हम सुबह उठते हैं और बस… उसे पूरे दिन ढोते रहते हैं।

और हम इसे ठीक करने के लिए क्या कुछ नहीं करते? हम इससे लड़ते हैं, ध्यान से इसे भगाने की कोशिश करते हैं, और सेहत की दुनिया के हर कोने से मिली सलाह को अपनाते हैं। लेकिन वो घबराहट की धीमी आवाज़ हमारे जीवन का हिस्सा बनकर रह जाती है। ऐसा लगता है जैसे हम अपने ही मन में कैद हैं, अपने ही विचारों और भावनाओं से लगातार जंग लड़ रहे हैं।

लेकिन क्या हो अगर यह पूरी लड़ाई सिर्फ एक गहरी भूल पर आधारित हो?

आज से 1200 साल पहले, एक महान ऋषि ने एक ग्रंथ लिखा था। उसमें उन्होंने बताया कि हमारे सारे दुखों की जड़ सिर्फ एक है—देखने की गलती, जिसे उन्होंने ‘अध्यास’ कहा। यह प्राचीन ज्ञान कोई इलाज नहीं है; यह एक teşhis (diagnosis) है। और जब आप इस teşhis को गहराई से समझ जाते हैं, तो आपको एहसास होता है कि आपको कभी किसी इलाज की ज़रूरत ही नहीं थी। आप कभी बीमार थे ही नहीं। आपने बस खुद को पहचानने में गलती कर दी थी।

यह ग्रंथ है ‘आत्म-बोध’, जिसे 8वीं सदी के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य ने लिखा था। और इसका ज्ञान, आपकी चिंता के बारे में आपकी पूरी सोच को बदलने वाला है।क्या आपने कभी गौर किया है—

आपके शरीर में बहुत कुछ चलता रहता है,
साँस चलती है,
दिल धड़कता है,
मन सोचता है,
भावनाएँ उठती हैं…

लेकिन इन सबको कौन देख रहा है?

आज हम एक बहुत सरल, लेकिन बहुत गहरी बात समझेंगे—
आप ये सब नहीं हैं…
आप वो हैं, जो इन सबको देख रहा है।

राजा और राज्य की कहानी

ज़रा एक राजा की कल्पना कीजिए।

राजा के राज्य में—
कोई खेत जोत रहा है,
कोई खाना पका रहा है,
कोई पहरा दे रहा है,
कोई संदेश ला रहा है।

राजा क्या करता है?

राजा बस देखता है।
राजा आदेश देता है,
लेकिन खुद खेत नहीं जोतता,
खुद खाना नहीं पकाता।

राजा अलग है…
और उसका राज्य अलग।

अब यही बात अपने ऊपर लगाइए

आपके भीतर भी एक पूरा “राज्य” है।

  • शरीर काम करता है
  • इंद्रियाँ देखती–सुनती हैं
  • मन सोचता है
  • बुद्धि निर्णय लेती है

लेकिन एक सवाल पूछिए—

👉 इन सबको कौन जान रहा है?

जब मन में विचार आता है—
आप जानते हैं।

जब शरीर थकता है—
आप जानते हैं।

जब खुशी या दुख आता है—
आप जानते हैं।

तो जो जान रहा है…
वो मन कैसे हो सकता है?
वो शरीर कैसे हो सकता है?

शंकराचार्य क्या कहते हैं? (बहुत सरल शब्दों में)

आदि शंकराचार्य कहते हैं—

आप शरीर नहीं हैं,
आप इंद्रियाँ नहीं हैं,
आप मन नहीं हैं,
आप बुद्धि भी नहीं हैं।

आप इन सबके साक्षी हैं।

जैसे राजा अपने राज्य का साक्षी होता है।

तीन छोटे उदाहरण

1️⃣ शरीर का उदाहरण
आप कहते हैं—
“मेरा हाथ दुख रहा है।”

ध्यान दीजिए—
आप “हाथ” को देख रहे हैं।
तो आप हाथ नहीं हैं।

2️⃣ मन का उदाहरण
आप कहते हैं—
“मेरा मन बहुत परेशान है।”

अगर आप मन को जान पा रहे हैं,
तो आप मन नहीं हैं।

3️⃣ नींद का उदाहरण
गहरी नींद में—
न शरीर का पता
न मन का शोर

फिर भी सुबह आप कहते हैं—
“मैं अच्छी नींद सोया।”

👉 कौन जानता था कि नींद अच्छी थी?

वही आप हैं।

तो फिर मैं कौन हूँ?

आप—

  • करने वाले नहीं
  • सोचने वाले नहीं
  • बदलने वाले नहीं

आप हैं—

👉 देखने वाले
👉 जानने वाले
👉 साक्षी

आप राजा हैं।
शरीर–मन–बुद्धि आपकी “प्रजा” हैं।

एक छोटा अभ्यास (30 सेकंड)

अभी जहाँ हैं, वहीं—

  • एक गहरी साँस लीजिए
  • शरीर को महसूस कीजिए
  • मन में जो चल रहा है, उसे देखिए

अब खुद से कहिए—

“मैं ये सब नहीं हूँ…
मैं इन्हें देखने वाला हूँ।”

बस इतना।

जब यह समझ आती है—

तो दुख थोड़ा हल्का हो जाता है,
डर ढीला पड़ जाता है,
और जीवन आसान लगने लगता है।

आपको कुछ बदलना नहीं है।
कुछ सुधारना नहीं है।

जब यह समझ आती है—

तो दुख थोड़ा हल्का हो जाता है,
डर ढीला पड़ जाता है,
और जीवन आसान लगने लगता है।

आपको कुछ बदलना नहीं है।
कुछ सुधारना नहीं है।

बस याद करना है—
मैं राजा हूँ,
और सब कुछ मेरे सामने चल रहा है।

आज के लिए इतना ही।

शांत रहिए।
जागरूक रहिए।
और याद रखिए—

आप शरीर नहीं हैं…
आप मन नहीं हैं…
आप साक्षी हैं।

🙏
सचेतन

बस याद करना है—
मैं राजा हूँ,
और सब कुछ मेरे सामने चल रहा है।

आज के लिए इतना ही।

शांत रहिए।
जागरूक रहिए।
और याद रखिए—

आप शरीर नहीं हैं…
आप मन नहीं हैं…
आप साक्षी हैं।🙏
सचेतन

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