सचेतन- 53 वेदांत सूत्र: मुमुक्षुत्व — भीतर की पुकार
“क्या आपको कभी ऐसा लगा है…
कि बाहर सब ठीक है,
सब है—
फिर भी दिल के अंदर
एक खालीपन है?
एक कमी…
जिसका नाम आप नहीं जानते।
वेदांत कहता है—
इस खालीपन का नाम है मुमुक्षुत्व…
मुक्त होने की पुकार…
सच्ची शांति को छू लेने की प्यास।”
“दोस्तों…
हम सबके जीवन में एक समय आता है
जब मन थक जाता है।
थकान शरीर की नहीं—
अंदर की होती है।
आप सबकुछ करते हैं—
काम, परिवार, ज़िम्मेदारियाँ…
फिर भी मन कहता है—
अब बस…
मुझे कुछ और चाहिए।
मुझे शांति चाहिए।
यही आवाज़…
यही पुकार…
मुमुक्षुत्व है।”
“कभी मैं भी ऐसी ही हालत में था…
सब कुछ होते हुए भी
अंदर बेचैनी थी।
रात को नींद नहीं आती थी।
दिल जैसे भारी हो गया था।
जैसे मन कह रहा हो—
‘ये जीवन पूरा नहीं…
कुछ बाकी है।’
मैंने एक साधु से पूछा—
‘मैं इतना बेचैन क्यों हूँ?’
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
‘क्योंकि तुम्हारी खोज शुरू हो चुकी है।
यह बेचैनी कमजोरी नहीं—
जागृति है।’
उस एक लाइन ने
मेरा जीवन बदल दिया।”
“हम सबके दिल में
कभी न कभी यह तलाश जागती है—
मैं कौन हूँ?
मेरा रास्ता क्या है?
मुझे शांति कब मिलेगी?
और वेदांत एक सरल बात कहता है—
जिस दिन सवाल सच्चा हो जाए,
उसी दिन रास्ता खुल जाता है।
मुमुक्षुत्व वही सवाल है—
जो दिल को हिला देता है…
और दिशा बदल देता है।”
“मुमुक्षुत्व का मतलब है—
दिल की सारी इच्छाओं में से
बस एक इच्छा बच जाना:
मैं मुक्त होना चाहता हूँ।
मैं सच्चाई जानना चाहता हूँ।
मैं शांति चाहता हूँ।
जब यह एक इच्छा जागती है—
मन बिखरना बंद कर देता है।
जीवन सरल हो जाता है।
कदम अपने-आप सही दिशा में चलने लगते हैं।”
“कभी-कभी हम रोते हैं…
पर समझ नहीं आता क्यों।
कभी हम चुप हो जाते हैं…
जैसे अंदर कोई आवाज़ कह रही हो—
‘ये रास्ता मेरा नहीं।’
कभी लोगों के बीच खड़े रहते हैं…
पर अंदर अकेले महसूस करते हैं।
दोस्तों,
यह कमजोरी नहीं है।
यह आपकी आत्मा की खिड़की है।
वह पुकार रही है—
‘तुम्हें आगे बढ़ना है…
तुम्हें सच तक पहुँचना है।’
यही मुमुक्षुत्व है—
भीतर की जागृति।”
“अगर यह पुकार आपका साथ दे रही है—
तो रोज़ तीन छोटे काम करें:
1️⃣ सुबह खुद से पूछें—
‘आज मैं किस बोझ से मुक्त होना चाहता हूँ?’
2️⃣ दिन में एक बार
आँखें बंद करके कहें—
‘मुझे सत्य चाहिए।’
बस यही वाक्य मन की दिशा बदल देता है।
3️⃣ रात को सोचें—
‘आज मेरी कौन-सी इच्छा ने मुझे बाँधा?
और कौन-सी इच्छा ने मुझे हल्का किया?’
यही साधना है।”
“दोस्तों…
मुमुक्षुत्व कोई शास्त्र नहीं,
कोई कठिन साधना नहीं…
यह बस मन की एक धीमी पुकार है—
मुझे शांति चाहिए… मुझे सत्य चाहिए…
और जिस दिन आप इस पुकार को सुन लेते हैं—
जीवन बदलने लगता है।
इस यात्रा में
मैं आपके साथ हूँ…
और आप अकेले नहीं हैं।Stay Sachetan…
Stay Awake…
Stay Free…”
