सचेतन- 40 –आत्मबोध – “नाम–रूप से परे, चिदानन्द में स्थित होना”
क्या आत्मज्ञान पाने के बाद
इंसान सब कुछ छोड़ देता है?
क्या उसे शरीर, संसार, रिश्ते—
सब त्यागकर कहीं अलग बैठ जाना पड़ता है?
आत्मबोध में आज का यह विचार
एक बहुत ही गलतफहमी को साफ करता है।
शंकराचार्य कहते हैं—
ज्ञानी भागता नहीं है,
वह भ्रम से मुक्त हो जाता है।
आत्मबोध का श्लोक 40 कहता है—
जो परम सत्य को जान चुका है,
वह रूप, रंग, नाम और पहचान से
अपने जुड़ाव को छोड़ देता है
और स्वयं को
पूर्ण चैतन्य और आनंद
के रूप में स्थित जानता है।
यहाँ “छोड़ देना”
किसी चीज़ को फेंक देना नहीं है,
बल्कि गलत पहचान छोड़ देना है।
‘विहाय’ का सही अर्थ
श्लोक में शब्द है— विहाय
अर्थात् छोड़ देना।
लेकिन ध्यान दीजिए—
ज्ञानी शरीर नहीं छोड़ता,
नाम नहीं छोड़ता,
समाज नहीं छोड़ता।
वह छोड़ता है—
👉 “मैं यही हूँ”
इस झूठी पहचान को।
- मैं सिर्फ शरीर हूँ
- मैं यही भूमिका हूँ
- मैं यही जाति, यही पद हूँ
यह सब
नाम–रूप की पहचान है।
सच्चा त्याग क्या है?
वेदांत कहता है—
👉 वस्तु का त्याग नहीं,
वस्तु की “सत्यता” का त्याग।
इसे कहते हैं—
मिथ्यात्व बुद्धि
जब आप जान लेते हैं—
- यह शरीर बदलने वाला है
- यह भूमिका अस्थायी है
- यह पहचान स्थायी नहीं है
तो वे आपको बाँध नहीं पातीं।
यहाँ एक गहरी बात है—
ब्रह्म होने के बाद
आप कुछ छोड़ ही नहीं सकते,
क्योंकि सब कुछ आपमें ही है।
ज्ञानी क्या करता है?
श्लोक कहता है—
परमार्थवित्
अर्थात्— परम सत्य को जानने वाला।
वह—
- भागता नहीं
- छिपता नहीं
- संसार से डरता नहीं
वह बस इतना जानता है—
👉 “मैं इन सबमें होते हुए भी,
इनमें सीमित नहीं हूँ।”
‘अवतिष्ठते’ – स्थित रहना
श्लोक का अंतिम भाग कहता है—
वह पूर्ण चिदानन्द स्वरूप में स्थित रहता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि—
वह ध्यान में बैठा रहता है,
या समाधि में चला जाता है।
इसका अर्थ है—
👉 ज्ञान को भूलता नहीं।
सुख में भी—
मैं ब्रह्म हूँ।
दुख में भी—
मैं ब्रह्म हूँ।
आलोचना में भी—
मैं ब्रह्म हूँ।
यही है—
ज्ञान-अविस्मृति
ज्ञान को न भूलना।
जीवन में इसका अर्थ
ज्ञानी भी—
- काम करता है
- रिश्ते निभाता है
- निर्णय लेता है
लेकिन एक फर्क होता है—
👉 उसकी शांति
परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती।
वह लोगों को सुधारना चाहेगा,
लेकिन अपनी खुशी
उन पर टिका नहीं देगा।
यही है जीवन-मुक्ति
श्लोक 40
जीवन-मुक्ति का स्वरूप बताता है—
- शरीर में रहते हुए मुक्त
- संसार में रहते हुए असंग
- कर्म करते हुए अकर्ता
यह कोई नया अनुभव नहीं,
यह पहचान की स्पष्टता है।
आत्मबोध में आज का यह विचार
हमें यह सिखाता है—
👉 ज्ञान का फल त्याग नहीं,
स्वतंत्रता है।
जब नाम–रूप की पकड़ ढीली पड़ती है,
तो जीवन हल्का हो जाता है।
आप वही रहते हैं—
लेकिन बोझ नहीं रहता।
यही है—
परिपूर्ण चिदानन्द में स्थित होना।
यही है—सचेतन जीवन। 🙏
