“ध्यान कोई तकनीक नहीं, एक परिपक्व स्थिति है” क्या आपने कभी यह महसूस किया है किआप ध्यान करना चाहते हैं,लेकिन मन बैठने को तैयार ही नहीं होता? शरीर बैठ जाता है,आँखें बंद हो जाती हैं,पर मन बाहर ही भटकता रहता है। आत्मबोध में आज का यह विचारहमें एक बहुत स्पष्ट बात सिखाता है— 👉 ध्यान […]
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सचेतन- 37 –आत्मबोध – “निरंतर अभ्यास ही अज्ञान की बीमारी की औषधि है”
क्या आपने कभी महसूस किया है किआप सही बात समझते हैं…फिर भी वही पुरानी बेचैनी,वही प्रतिक्रिया,वही डर लौट आता है? हम कहते हैं—“मैं आत्मा हूँ” “मैं ब्रह्म हूँ” लेकिन ज़रा-सी परिस्थिति बदलते हीहम फिर वही पुराने “मैं” बन जाते हैं। आत्मबोध में आज का विचारयही प्रश्न उठाता है—समझ आ जाने के बाद भी मन अशांत […]
सचेतन- 36 –आत्मबोध – “मैं कौन हूँ?”
हम जीवन भर एक ही प्रश्न से जूझते रहते हैं—“मैं कौन हूँ?” कभी हम स्वयं को शरीर मान लेते हैं,कभी मन,कभी रिश्ते,कभी सफलता या असफलता। लेकिन आत्मबोध का यह अंतिम श्लोकहमें सीधा, स्पष्ट और निर्भय उत्तर देता है— “तुम वही हो, जिसे तुम खोज रहे थे।” शंकराचार्य कहते हैं— मैं नित्य शुद्ध हूँ, सदा मुक्त […]
सचेतन- 35 –आत्मबोध – “मैं आकाश के समान हूँ”
क्या आपने कभी ध्यान दिया है— आपके जीवन मेंलोग आते हैं, जाते हैं…परिस्थितियाँ बदलती हैं…सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं… लेकिन फिर भीआपके भीतर कहींकुछ ऐसा हैजो इन सबके बीचबिलकुल शांत बना रहता है? आत्मबोध के आज के विचार में हम बात करेंगे कीयही मौन सत्य की ओर इशारा करता है— “मैं आकाश के समान हूँ।” शंकराचार्य […]
सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात
सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात क्या आपने कभी सोचा है—इतना ध्यान करने के बाद भीमन क्यों शांत नहीं होता? क्यों भीतर कहीं यह भावना बनी रहती है—“अभी कुछ और करना बाकी है…अभी मुक्ति दूर है…” आत्मबोध का आज का विचारयहीं एक बहुत गहरी बात कहता है— मुक्ति पाने की ज़रूरत नहीं […]
सचेतन- 33 –आत्मबोध – दुख, डर और अशांति आप नहीं हैं
क्या आपने कभी महसूस किया है किमन लगातार बेचैन रहता है? कभी चिंता,कभी डर,कभी किसी से लगाव,तो कभी किसी से चिढ़। और फिर हम कहते हैं—“मैं बहुत परेशान हूँ।” लेकिन ज़रा ठहरिए— अगर यह परेशानीआपकी नहीं,आपके मन की हो तो? आत्मबोध का श्लोक 33यही क्रांतिकारी बात कहता है— आप मन नहीं हैं, और इसलिए दुख, […]
सचेतन- 32 – आप अपना शरीर नहीं हैं
आप अपना शरीर नहीं हैं। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है,क्योंकि बचपन से हमें यही सिखाया गया है— “मैं यह शरीर हूँ।”इसीलिए हम इसके लिए डरते हैं,बीमार पड़ने से घबराते हैं,बुढ़ापे से डरते हैं,और मौत का ख़याल आते ही काँप जाते हैं। लेकिन सोचिए—अगर यह मान्यता ही ग़लत हो तो? अगर यह शरीर […]
सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते
क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपके अपने ही विचारआपको इधर-उधर पटकते रहते हैं? कभी डर,कभी चिंता,कभी भविष्य की टेंशन,तो कभी अतीत की यादें। मन जैसे एक तूफ़ान बन जाता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ किइस तूफ़ान के बीच भीएक ऐसी जगह हैजहाँ पूरी शांति है? आत्मबोध का यह प्रसंगयही जगह दिखाता है। […]
सचेतन- 30 – अहंकार का जन्म
(Ātmabodha Verse 30: The Birth of the Ego) आपने अहंकार के बारे में बहुत कुछ सुना होगा।कभी कहा जाता है—“ईगो छोड़ो।”“अहंकार को मारो।”“ईगो सबसे बड़ी समस्या है।” लेकिन ज़रा एक पल रुककर सोचिए— अगर अहंकार से लड़ना हीअहंकार को और मज़बूत कर देता हो तो? अगर अहंकार कोई दुश्मन नहीं,बल्कि एक गलत पहचान हो? आत्मबोध […]
सचेतन- 29 आपकी चेतना एक स्वयं-प्रकाशित सूर्य है
क्या आपने कभी रुककर यह सोचा है—कि आपकी आँखों से जो देख रहा है,वो कौन नहीं… बल्कि क्या है? हम पूरी ज़िंदगी यह मानकर चलते हैंकि हम एक शरीर के अंदर बैठे हुएएक छोटे से इंसान हैं—जो बाहर की दुनिया को देख रहे हैं। जैसे हम एक छोटी-सी मोमबत्ती हों,और दुनिया बहुत बड़ी और अँधेरी। […]
