“आनन्दो ब्रह्मेति” ✨इसका अर्थ है — परम आनन्द ही ब्रह्म है। तैत्तिरीयोपनिषद् का भाव कि साधक जब अन्न (शरीर), प्राण (जीवन-शक्ति), मन (विचार-भावना) और विज्ञान (विवेक-ज्ञान) की सीमाओं को पार कर लेता है, तब वह पहुँचता है आनन्दमय कोश में।यहीं अनुभव होता है कि — यही अवस्था है — आनन्दो ब्रह्मेति। क्यों कहा गया “आनन्द […]
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सचेतन- 24: तैत्तिरीय उपनिषद्:रथ रूपक
“रथ रूपक”। यह आत्मा और शरीर के संबंध को बहुत सरल और प्रभावी तरीके से समझाता है। आत्मा क्या है? आत्मा हमारी असली पहचान है। यह अमर, शाश्वत और अविनाशी है। यह न दिखाई देती है, न ही छूई जा सकती है, लेकिन हर प्राणी में इसका अस्तित्व है। आत्मा ही वह चेतना है, जिससे […]
सचेतन- 19:तैत्तिरीय उपनिषद्: ज्ञान और विवेक ही ब्रह्म है
“विज्ञानं ब्रह्मेति” = ज्ञान और विवेक ही ब्रह्म है। विज्ञान यहाँ केवल भौतिक विज्ञान (Science) नहीं है, बल्कि आत्म-बोध और विवेकपूर्ण ज्ञान है।यह वह स्तर है जहाँ साधक केवल मन और भावना (मनोमय कोश) से ऊपर उठकर सही-गलत को पहचानने वाली बुद्धि (विज्ञानमय कोश) तक पहुँचता है।यही विवेक उसे ब्रह्म की ओर ले जाता है।क्यों […]
सचेतन- 18: तैत्तिरीय उपनिषद्: मन ही ब्रह्म है
सचेतन- 18: तैत्तिरीय उपनिषद्: मन ही ब्रह्म है “मनो ब्रह्मेति” का अर्थ है —मन ही ब्रह्म है, क्योंकि मन ही वह केंद्र है जहाँ विचार, भावना, इच्छा और संकल्प जन्म लेते हैं। मन क्यों ब्रह्म है? मन केवल सोचने का यंत्र नहीं है, बल्कि चेतना का दर्पण है। हर अनुभव (सुख, दुख, प्रेम, क्रोध, शांति) […]
सचेतन- 15:तैत्तिरीय उपनिषद्: ब्रह्मानंदवल्ली-तप, सत्य, और आत्म-संयम
ब्रह्मानंदवल्ली — उस साधक को ब्रह्मानंद (ब्रह्म का आनंद) की अनुभूति तक ले जाती है। तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्म को केवल जानने की बात नहीं करता, बल्कि ब्रह्म “होने” की बात करता है। और इसका माध्यम है — तप, सत्य, और आत्म-संयम। तैत्तिरीयोपनिषद् में ब्रह्म केवल एक ज्ञान का विषय नहीं है कि हम उसे “जान” लें, […]
सचेतन- 13:तैत्तिरीय उपनिषद्: शिक्षावल्ली -शुद्ध उच्चारण क्यों आवश्यक है?
शिक्षावल्ली तैत्तिरीय उपनिषद् (यजुर्वेद की शाखा) का प्रथम भाग है। “वल्ली” का अर्थ है — लता या शाखा। इसलिए शिक्षावल्ली = वह शाखा जिसमें शिक्षा (उच्चारण, स्वर, लय और पाठ की शुद्धि) के विषय में ज्ञान दिया गया है। शिक्षा में उच्चारण, स्वर, मात्रा और बल की शुद्ध परंपरा।इसके छः अंग (तत्त्व) हैं शिष्य को […]
सचेतन- 11: तैत्तिरीयोपनिषद् — आत्मानुभूति और ब्रह्मविद्या का रहस्य
साधना में आत्मानुभूति और ब्रह्मविद्या साधना के मार्ग में आत्मानुभूति मंज़िल है और ब्रह्मविद्या उसका नक्शा। आत्मानुभूति — स्वयं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार।यह केवल “मैं कौन हूँ” का उत्तर नहीं, बल्कि गहराई से जिया हुआ अनुभव है कि हम शरीर या मन नहीं, बल्कि शुद्ध, अविनाशी चेतना हैं।जैसे अंधेरे में दीप जलने पर सब स्पष्ट दिखने […]
सचेतन- 10: “ऋतम् वद” — सत्य और नियम में जियो, वही परम जीवन है।
ऋत के माध्यम से अमृत (ज्ञान, आत्मा, स्वर्ग) की अनुभूति होती है। “ऋतम् वद” का अर्थ है — सत्य बोलो, सत्य जियो, और जीवन को नियम व नैतिकता के मार्ग पर चलाओ।यह केवल सच बोलने की बात नहीं, बल्कि अपने विचार, वाणी और कर्म में सत्य, न्याय, और ब्रह्मांडीय व्यवस्था को अपनाने की शिक्षा है। […]
सचेतन- 09-10: “ऋत” (ऋतम्) — सत्य, नियम, नैतिकता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था
“ऋत” (ऋतम्) — यह वेदों का एक अत्यंत गूढ़ और केंद्रीय सिद्धांत है, जो सत्य, नियम, नैतिकता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। यह केवल एक नैतिक संहिता नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि का नैतिक और प्राकृतिक नियम है। “ऋत” (ऋतम्) का मतलब है — वह सच्चा और अटल नियम, जिस पर पूरी सृष्टि चलती […]
सचेतन- 09: “ऋत” (ऋतम्) — सत्य, नियम, नैतिकता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था
“ऋत” (ऋतम्) — यह वेदों का एक अत्यंत गूढ़ और केंद्रीय सिद्धांत है, जो सत्य, नियम, नैतिकता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। यह केवल एक नैतिक संहिता नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि का नैतिक और प्राकृतिक नियम है। “ऋत” (ऋतम्) का मतलब है — वह सच्चा और अटल नियम, जिस पर पूरी सृष्टि चलती […]
