“कल रात आप सोए थे…ना कोई विचार था,ना कोई चिंता,ना कोई डर,ना कोई पहचान। लेकिन सुबह उठकर आपने कहा—‘मैं बहुत अच्छी नींद सोया।’ अब ज़रा सोचिए—जब सब कुछ सो गया था,तब यह ‘मैं’ कौन था जो नींद का अनुभव कर रहा था?” अनाद्यविद्यानिर्वाच्या कारणोपाधिरुच्यते। उपाधित्रितयादन्यमात्मानमवधारयेत्॥ बहुत सरल अर्थ जो अज्ञानशुरुआत से चला आ रहा है,जिसे […]
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सचेतन- 13: आत्मबोध की यात्रा – “मेरे अनुभव कहाँ से आते हैं?”
“कभी आपने कहा है—मुझे भूख लगी है…मुझे डर लग रहा है…मैं बहुत खुश हूँ…मुझे गुस्सा आ रहा है… लेकिन कभी आपने खुद से पूछा—ये सब महसूस कौन कर रहा है? क्या आत्मा को भूख लगती है?क्या आत्मा डरती है?या ये सब किसी और से आ रहा है?” पञ्चप्राणमनोबुद्धिदशेन्द्रियसमन्वितम्। अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं भोगसाधनम्॥ सरल अर्थ हमारे अंदरसाँस, […]
सचेतन- 12: आत्मबोध की यात्रा – “यह शरीर मेरा घर है, मैं घर नहीं हूँ”
“कभी आपने अपने शरीर से कहा है—तुम थक गए हो…तुम बीमार हो…तुम बूढ़े हो रहे हो… लेकिन कभी आपने खुद से पूछा—क्या मैं ही यह शरीर हूँ? अगर शरीर बदलता है,बीमार होता है,थकता है…तो क्या मैं भी बदल जाता हूँ? आज की बात बहुत छोटी है,लेकिन जीवन को हल्का कर देने वाली है।” पञ्चीकृतमहाभूतसंभवं कर्मसंचितम्। […]
सचेतन- 11: आत्मबोध की यात्रा – “मैं कौन हूँ? – पानी, रंग और मैं”
“अगर मैं आपसे पूछूँ—आप कौन हैं? आप कहेंगे—मैं इस नाम का हूँ…मैं इस काम का हूँ…मैं इस परिवार से हूँ… लेकिन अगर ये सब एक दिन हट जाए—नाम… काम… पहचान…तो क्या आप तब भी होंगे? आज की बात बहुत छोटी है…लेकिन दिल को छू लेने वाली है। आज हम जानेंगे—हम सच में कौन हैं।” नानोपाधिवशादेव […]
सचेतन- 10: आत्मबोध की यात्रा – “उपाधियाँ बदलती हैं— मैं नहीं”
“कभी आपने सोचा है—हम इतने अलग क्यों दिखते हैं? मेरा शरीर अलग, आपका अलग…मेरी उम्र अलग, आपकी अलग…मेरी कहानी अलग, आपकी अलग… लेकिन क्या मैं सच में अलग हूँ?या अलग-अलग सिर्फ़ ‘कवर’ हैं?” यथाकाशो हृषीकेशो नानोपाधिगतो विभुः। तद्भेदाद्भिन्नवद्भाति तन्नाशे केवलो भवेत्॥१०॥ सरल अर्थ “जैसे आकाश एक होते हुए भीअलग-अलग घड़ों/कमरों (उपाधियों) के कारणअनेक-सा प्रतीत होता […]
सचेतन- 09: आत्मबोध की यात्रा – “सब एक ही सत्य से बने हैं”
“कभी आपने सोचा है—हम सब इतने अलग क्यों दिखते हैं? कोई अमीर, कोई गरीब…कोई मनुष्य, कोई पशु…कोई देव, कोई साधारण… लेकिन अगर भीतर से देखा जाए—तो क्या हम सच में अलग हैं?” सच्चिदात्मन्यनुस्यूते नित्ये विष्णौ प्रकल्पिताः। व्यक्तयो विविधाः सर्वा हाटके कटकादिवत्॥९॥ सरल अर्थ “सच्चिदानंद स्वरूप,सर्वत्र व्याप्त,नित्य ब्रह्म (विष्णु) मेंयह सारी विविध सृष्टिकल्पना से प्रकट हुई […]
सचेतन- 08: आत्मबोध की यात्रा – “जगत बुदबुदों जैसा है”
“कभी आपने पानी में उठते बुदबुदे देखे हैं?वे अचानक पैदा होते हैं…कुछ देर टिकते हैं…और फिर बिना कोई निशान छोड़ेखुद ही विलीन हो जाते हैं। शंकराचार्य कहते हैं—हमारा जीवन और यह पूरा जगत भी कुछ ऐसा ही है।” उपादानेऽखिलाधारे जगन्ति परमेश्वरे। सर्गस्थितिलयान्यान्ति बुद्बुदानीव वारिणि॥८॥ सरल अर्थ “यह सम्पूर्ण जगतउस परमेश्वर में उत्पन्न होता है,उसी में […]
सचेतन- 07: आत्मबोध की यात्रा -“जब तक ब्रह्म नहीं जाना— जगत सत्य लगता है”
“कभी आपने दूर से चमकती हुई कोई चीज़ देखी है…और लगा हो— यह तो चाँदी है? आप पास गए…और पता चला— वह तो सीप थी।चाँदी नहीं। शंकराचार्य कहते हैं—जगत का ‘सत्य’ भी कुछ ऐसा ही है।” तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा। यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम्॥७॥ “यह जगत तब तक सत्य जैसा प्रतीत होता है,जब तक ब्रह्म— […]
सचेतन- 06: आत्मबोध की यात्रा -“संसार: एक जागता हुआ स्वप्न है”
“क्या आपने कभी सपना देखा है…और सपने में ही रोए हैं, डर गए हैं, खुश हो गए हैं? उस समय सपना बिल्कुल सच लगता है।लेकिन जागने के बाद हम कहते हैं—‘अरे, यह तो बस सपना था।’ शंकराचार्य कहते हैं—संसार भी कुछ ऐसा ही है।” संसारः स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुलः। स्वकाले सत्यवद्भाति प्रबोधे सत्यसद्भवेत्॥६॥ सरल अर्थ “यह […]
सचेतन- 05: आत्मबोध की यात्रा – “ज्ञान शुद्ध करता है… और फिर स्वयं विलीन हो जाता है”
“क्या आपने कभी महसूस किया है—कि भीतर कुछ धुँधला-सा है?जैसे मन साफ़ होना चाहता है…लेकिन कोई परत, कोई मैल, हट नहीं रही? शंकराचार्य कहते हैं—यह मैल अज्ञान का है।और इसे हटाने का एक ही उपाय है—ज्ञान का अभ्यास।” अज्ञानकलुषं जीवं ज्ञानाभ्यासाद्विनिर्मलम्। कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येज्जलं कतकरेणुवत्॥५॥ सरल अर्थ “अज्ञान से मलिन हुआ जीवनिरंतर ज्ञान-अभ्यास से […]
