सचेतन 225: शिवपुराण- वायवीय संहिता – अभीष्ट इच्छा की वासना ही तमोगुण है

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सचेतन 225: शिवपुराण- वायवीय संहिता – अभीष्ट इच्छा की वासना ही तमोगुण है

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जब आप मन में बहुत सारी कामनाएँ और ख़ूब सारा ख़याली प्लाव पकाने लगते हैं तो तमोगुण का आगमन आपके अंदर होने लगता है।

आपका गुण आपसे और आपके शरीर से बंधा रहता है यह आपसे बाहर नहीं है। हमारे अपने गुण के कारण ही जीवन में माया और भ्रम पैदा होता है। यह त्रिगुनात्मक है जो सत्त्व, रज और तम कहलाता है।  

इन तीनों गुणों मे सत्त्वगुण तो निर्मल होता है और इसका आवरण सुख की अनुभूति और ज्ञान का विस्तार करता है। इस गुण से आपका आत्म सम्मान और हर कार्य में  स्वयं की मौजूदगी महसूस होती है जिससे आप प्रभावशाली और उद्यमशील हो जाते हैं। 

स्वयं के बारे में नहीं जान पाना या अज्ञानता के कारण किसी भी कर्म को करते रहना सिर्फ़ आपको स्वार्थ और अहंकार जैसे मूल शत्रु को ओर ले जाता है। आप घमंडी बन जाते हैं। अगर आपके साथ ऐसा कुछ हो रहा है तो समझिए रजोगुण और तमोगुण उत्पन्न होना शुरू हो गया है। 

रजो गुण जब बढ़ता है तो हम विषयों में सुख की कल्पना करने लगते हैं और मैं सुखी हूँ वाला भाव ही आपका धर्म बनाने लगता है। रजो गुण के  कारण से व्यक्तियों की बौद्धिक क्षमता विकृत हो जाती है उनका ज्ञान अभिमान में बदल जाता है। रजोगुण से वेशक आप इष्ट विषय की प्राप्ति कर लें लेकिन बुद्धि और स्वभाव की स्थिरता नहीं हो पाती है।

जब आपके मन में बहुत सारी कामनाएँ पैदा होने लगे ख़ूब सारा ख़याली प्लाव आप जब पकाने लगें जिसको हम कहते हैं की मुंगेरी लाल के हसीन सपने तो समझिए की तमोगुण का आगमन आपके अंदर शुरू होने लगा है। और इसके कारण आपको जो करना चाहिये, वह नहीं करते और जो नहीं करना चाहिये, वह कर बैठते हैं। इस प्रकार कामना देहाभिमानी कहलाती है जो पुरुष को अपने शारीरिक अवस्था में ही मोहित कर देती है।यानी आप शरीर की जड़ता में बांध जाते हैं आप ना ही कुछ मानसिक रूप से सोच पाते हैं और ना ही कुछ सदबुद्धि का उपयोग कर पाते हैं।

आपकी स्थित सिर्फ़ और सिर्फ़ अभीष्ट या हार्दिक इच्छा की वासना में लगा होता है। आप सोचते  रहते हैं की हमारे हार्दिक इच्छा से जो मनोरथ है उसकी पूर्ति हो जाये तो हमको आनंद की प्राप्ति होगी। 

ऐसी कामना उत्पन्न होने पर मनुष्य पहले इन्द्रियों से भोग को भोगने की कामना करता है। यानी हम देख, कर सुन, कर बोलकर, स्वाद लेकर, छूकर कोई भी चीज पाना चाहते हैं। इस तरह से भोग-पदार्थ मिलना कठिन होता है और मिल भी जाये तो टिकते नहीं। इसलिये उन्हें किसी तरह प्राप्त करने के लिये वह मन में तरह-तरह की कामनाएँ करता है। छुद्र बुद्धि लगा कर में उन्हें प्राप्त करने के लिये तरह-तरह के उपाय सोचते रहते हैं। इस प्रकार कामना पहले इन्द्रियों को संयोगजन्य सुख के प्रलोभन में लगाती है। फिर इन्द्रियाँ मन को अपनी ओर खींचती हैं और उसके बाद इन्द्रियाँ और मन मिलकर बुद्धि को भी अपनी ओर खींच लेते हैं। इस तरह काम देहाभिमान के ज्ञान को ढककर इन्द्रियोँ, मन और बुद्धिके द्वारा उसे मोहित कर देता है तथा उसे पतन के गड्ढे में डाल देता है।

यह सिद्धान्त है कि नौकर अच्छा हो, पर मालिक तिरस्कार पूर्वक उसे निकाल दे तो फिर उसे अच्छा नौकर नहीं मिलेगा। ऐसे ही मालिक अच्छा हो, पर नौकर उसका तिरस्कार कर दे तो फिर उसे अच्छा मालिक नहीं मिलेगा। इसी प्रकार मनुष्य परमात्म से प्राप्ति किये शरीर को सांसारिक भोग और संग्रह में ही खो देता है तो फिर उसे मनुष्य शरीर नहीं मिलेगा। अच्छी वस्तु का तिरस्कार आप अपने अन्तःकरण की अशुद्धि कारण करते हैं और यह अशुद्ध कामना के कारण होता है। इसलिये सबसे पहले कामना का नाश करना चाहिये।

तमोगुण आपकी अज्ञानता  से उत्पन्न होता है और यह आपको प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बांधता है। शिव पुराण में वायुदेवता इस प्रकार सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणों का स्वरूप और उनके द्वारा जीवात्मा के बांधे जाने का प्रकार बतलाकर उन तीनों गुणों की स्वाभाविक वृत्ति बतलाते हैं। 

तामसी वृत्ति अधोगति में डालने वाली होती है। जब आप अपने कर्म के माध्यम से पतन की ओर जा रहे हों आपके काम की गुणवत्ता में गिरावट होने लगे तो आप समझ जाइए की तामसी मनोवृत्ति से अपना व्यवसाय अथवा पेशा या काम धंधा करके जीवन यापन या  जीविका चला रहे हैं।

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