सचेतन 196: अस्मिता (ईगो) आपके जीवन का क्लेश स्वरूप है

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सचेतन 196: अस्मिता (ईगो) आपके जीवन का क्लेश स्वरूप है

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अस्मिता, अहंकार आपका निर्माण है, जिसको आप क्रिएशन कहते हैं 

जब जब हमारा अहंकार जितना-जितना पुष्ट हो जाता है स्वयं को जानना उतना ही असंभव हो जाता है। जितनी अस्मिता गहरी हो जाती है। यह जो ईगो है, यह जो मैं हूँ, यह जितना सख्त और ठोस हो जाता है उतना ही उसे जानना मुश्किल हो जाता है जो मैं हूं, जो मेरा वास्तविक होना है, क्यों? क्योंकि अस्मिता मेरे द्वारा निर्मित है। अहंकार मेरा निर्माण है और मैं, मैं मेरा निर्माण नहीं हूँ। मेरा होना, मेरी आत्मा, मेरी वास्तविकता मेरा निर्माण नहीं है। 

​​अस्मिता को योगशास्त्र के अनुसार पाँच प्रकार के क्लेशों में से एक माना गया है। द्रक, द्रष्टा और दर्शन शक्ति को एक मानना या पुरुष (आत्मा) और बुद्धि में अभेद मानना ।

योगदर्शन के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश पाँच क्लेश हैं। (अविद्याऽस्मिता रागद्वेषभिनिवेशा: पंच क्लेशा:, योगदर्शन २.३)। भाष्यकर व्यास ने इन्हें विपर्यय कहा है और इनके पाँच अन्य नाम बताए हैं- तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अंधतामिस्र (यो. सू. १.८ का भाष्य)। इन क्लेशों का सामान्य लक्षण है – कष्टदायिकता। इनके रहते आत्मस्वरूप का दर्शन नहीं हो सकता।

योगशास्त्र में ​​अस्मिता यानी द्रक, द्रष्टा और दर्शन शक्ति को एक मानना या पुरुष (आत्मा) और बुद्धि में अभेद मानना यानी एकरूप, समान मानना।

दृक् शक्ति अर्थात जिसके द्वारा देखा जाए – दर्शन शक्ति अर्थात जिस साधन के द्वारा देखा जाए इन दोनों की एकात्मता (एकरूपता अर्थात इन दोनों को एक ही समझना ) अस्मिता, ( अस्मिता नामक क्लेश है ।)

जिसके द्वारा देखा जाता है अर्थात पुरुष या मनुष्य व जिसके माध्यम से देखा जाता है अर्थात बुद्धि । इन दोनों को एक ही मानना अस्मिता कहलाती है ।

अस्मिता को क्लेश के स्वरूप को बताया गया है ।

दृक् शक्ति का अर्थ है जिससे द्वारा देखा जाता है वह पुरुष होता है । जो त्रिगुणों (सत्त्व, रज व तम) से रहित है व चेतन है वही पुरुष है । इसके विपरीत जिस साधन के द्वारा देखा जाता है अथवा किसी का ज्ञान होता है वह दर्शन शक्ति होती है । वह दर्शन शक्ति बुद्धि होती है । बुद्धि सत्त्व, रज व तम से निर्मित व अचेतन अर्थात जड़ पदार्थ है ।

इस प्रकार दृक् शक्ति अर्थात पुरुष और दर्शन शक्ति अर्थात बुद्धि दोनों ही एक – दूसरे के विपरीत हैं । पुरूष चेतन तो बुद्धि अचेतन अर्थात जड़ पदार्थ है । जब व्यक्ति अविद्या के कारण इन दो अलग – अलग पदार्थों में भेद नहीं कर पाता है । और इन दोनों को एक ही तत्त्व मानने की गलती करता है तो यह अस्मिता नामक क्लेश कहलाता है ।

अस्मिता के कारण आप आदर, आन-बान, आबरू, इज़्ज़त, इफ्तिखार, धाक, नाक, नाम, पत, पतपानी, पूछ, प्रतिष्ठा, मर्यादा, मान-सम्मान, रुतबा, लाज, सम्मान, साख को अपना रूप मान बैठते हैं। 

अस्मिता, अहंकार मेरा निर्माण है, मेरा क्रिएशन है। एक ने बड़े मकान को बना कर अपने अहंकार को निर्मित किया है, एक ने धन इकट्ठा करके, एक ने राष्ट्रपति तक की यात्रा पूरी करके अपने अहंकार को इकट्ठा किया है, एक ने ज्ञान को इकट्ठा करके अपने अहंकार को इकट्ठा किया है। यह हमारा निर्माण है यह हमने बनाया है और ‘मैं’ मेरा निर्माण नहीं हूँ। तो वह जो मेरे भीतर अनिर्मित है असृष्ट है जो मेरे भीतर, मेरे जानने, मेरे होने के पहले है, मेरे करने के पहले है, मेरे जन्म के पहले जो मेरे भीतर है उसे जानने के लिए जिस अहंकार को मैंने निर्मित किया है, यह बाधा बन जाएगा।

इसलिए न तो त्यागी जानता है और न ज्ञानी और न धनी, और न पदलोलुप और न महत्वाकांक्षी। कौन जानता है? जानने के द्वार पर पहली तो बात यही है कि वह जान पाता है जो सब भांति नहीं जानता हो, इसकी स्वीकृति को उपलब्ध होता है। इस स्वीकृति को जानते ही, पहचानते ही कि मैं नही जानता हूँ और कोई पकड़ने का खयाल नहीं रह जाता, मैं खाली हाथ खड़ा रह जाता हूँ। 

खाली हाथ खड़ा रहा जाता हूँ। खाली मन… मैं आपसे पूछूं कि आपका नाम क्या है आप बहुत जल्दी उत्तर दे देते हैं कि मेरा नाम राम है, विष्णु है या कुछ और है, क्यों? इतने विश्वस्त हैं कि आपका यह नाम है। कभी सोचा कभी विचारा कि यह मैं क्या कह रहा हूँ। एक जल्दी से नाम निकल आता है और हम उत्तर दे देते हैं। उत्तर दे देते हैं बात खत्म हो जाती है। कभी थोड़ी देर ठहर जाएं और सोचें,मेरा नाम है! कुछ तो शायद भीतर एक सन्नाटा हो जाए, एक साइलेंस हो जाए, एक मौन हो जाए,कोई नाम खोजे से न मिले तो एक मौन पैदा हो जाए।

हम किसी से कोई प्रश्न पूछते हैं, उसे मालूम होता है तो शीघ्र उत्तर दे देता है। मालूम होने का मतलब अगर उसकी स्मृति में कुछ होता है तो उत्तर दे देता है। मैं पूछूं-दो और दो कितने होते हैं आप कह देते हैं चार क्योंकि आपकी स्मृति ने सीख रखा है दो और दो चार होते हैं। पूछा, उत्तर दे दिया। 

मैं आपसे पूछूं: भीतर कौन है तो आप कह देगें -आत्मा। यह भी स्मृति ने सीख रखा है दो और दो चार वाला उत्तर है दे दिया गया। लेकिन स्मृति ज्ञान नहीं है। तो स्वयं की खोज में पूछते वक्त कि मैं कौन हूँ उत्तर की अपेक्षा न करें क्योंकि जो भी उत्तर आएगा वह स्मृति से आएगा, झूठा होगा, सीखा हुआ होगा। सब सीखी हुई बातें झूठी होती हैं, ज्ञान नहीं बनती हैं। कुछ भी सीखा हुआ ज्ञान नहीं बनता है। जीवन में जो क्षुद्र है वह सीखा जा सकता है क्योंकि वह बाहर है। जीवन में जो विराट है वह सीखा नहीं जा सकता क्योंकि वह भीतर है। जो भीतर है उसे बाहर से नहीं सीखा जा सकता; उसे जाना जा सकता है; उसे उघाड़ा जा सकता है; उसे डिस्कवर किया जा सकता है; उसे पहचाना जा सकता है लेकिन सीखा नहीं जा सकता। उसे जाना जा सकता है लेकिन याद नहीं किया जा सकता। तो जब भी प्रश्न पूछें, पूछें कि मैं कौन हूं?

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