सचेतन 2.95 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध

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सचेतन 2.95 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध

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“धर्म युद्ध की गाथा: हनुमानजी का पराक्रम”

नमस्कार श्रोताओं! स्वागत है आपका “धर्मयुद्ध के बारे में सचेतन के इस विचार के सत्र में। आज की हमारी रोमांचक कथा है ‘इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध’। इस कहानी में हम देखेंगे कि कैसे हनुमान जी ने इन्द्रजित के साथ हुए भीषण युद्ध का सामना किया और रावण के दरबार में उपस्थित हुए। तो आइए, सुनते हैं यह रोमांचक गाथा।

अक्षकुमार के मारे जाने के बाद, राक्षसों के स्वामी रावण ने अपने क्रोध को संभालते हुए देवताओं के तुल्य पराक्रमी पुत्र इन्द्रजित को आज्ञा दी। रावण ने कहा: 

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।

मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ।।

पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने ( अपने जेठे पुत्र ) बलवान् मेघनाद को भेजा । ( उससे कहा की –  हे पुत्र ! मारना नही उसे बाँध लाना । उस बंदर को देखा जाए कि कहाँ का है. 

“बेटा! तुमने ब्रह्माजी की आराधना करके अनेक प्रकार के अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है। तुम अस्त्रवेत्ता हो, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हो, और देवताओं और असुरों को भी शोक प्रदान करने वाले हो। तुम्हारा पराक्रम इन्द्र सहित समस्त देवताओं ने देखा है।”

रावण ने इन्द्रजित की वीरता और तपस्या की प्रशंसा करते हुए उसे हनुमान जी से मुकाबला करने के लिए भेजा। उसने कहा:- “देखो, किंकर नाम के समस्त राक्षस मार डाले गए। जम्बुमाली नाम का राक्षस भी जीवित नहीं बचा, और मन्त्री के सातों वीर पुत्र तथा मेरे पाँच सेनापति भी काल के गाल में चले गए। हाथी, घोड़े और रथों सहित मेरी बहुत-सी सेना भी नष्ट हो गई, और तुम्हारा प्रिय बन्धु अक्ष भी मारा गया। अब यह वानर को परास्त करना तुम्हारी जिम्मेदारी है।

रावण के आदेश का पालन करते हुए, इन्द्रजित ने अपनी सेना के बिना ही हनुमान जी से युद्ध करने का निर्णय लिया। रावण ने उसे सावधान रहने की सलाह दी और कहा:

“वीरवर! हनुमान की शक्ति और गति का कोई माप-तौल नहीं है। वह अग्नि-तुल्य तेजस्वी वानर किसी साधन विशेष से नहीं मारा जा सकता। इन सब बातों का अच्छी तरह विचार करके प्रतिपक्षी में अपने समान ही पराक्रम समझकर तुम अपने चित्त को एकाग्र कर लो और ऐसा पराक्रम करो जो खाली न जाए।”

अपने पिता के वचन सुनकर, मेघनाद ने युद्ध के लिए निश्चित विचार किया और जल्दी से रावण की परिक्रमा करके युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किया। वह अपने विशाल नेत्रों और महातेजस्वी रूप में, हर्ष और उत्साह से भरकर राजमहल से बाहर निकला।

युद्ध की तैयारी होने लगी – 

इन्द्रजित अपने उत्तम रथ पर आरूढ़ हुआ, जो चार सिंहों से जुता हुआ था और युद्ध के लिए निकल पड़ा। जब वानरवीर हनुमान जी ने इन्द्रजित के रथ की गर्जना सुनी, तो वे भी उत्साह से भर उठे।

चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।

कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा ।। 

इंद्र को जीतने वाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला । भाई का मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया । हनुमान् जी ने देखा कि अब की भयानक योद्धा आया है । तब वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े।

हनुमान इन्द्रजित को देख कर कहते हैं की – “आओ, राक्षस! तुम्हारा सामना करने के लिए मैं तैयार हूँ।”

‘इन्द्रजित् और हनुमान का युद्ध’। यह कहानी हमें ले चलती है उस अद्भुत युद्धभूमि में जहाँ वीरता और साहस की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। 

रावण का पुत्र, इन्द्रजित्, युद्ध की कला में प्रवीण था। वह धनुष और तीखे बाणों को लेकर हनुमान जी को लक्ष्य करके आगे बढ़ा। जैसे ही वह युद्ध के लिए निकला, दिशाएँ मलिन हो गईं और भयानक पशु आर्तनाद करने लगे। इस समय, नाग, यक्ष, महर्षि और सिद्धगण भी आकाश में आ गए। पक्षियों के समूह आकाश को आच्छादित करके चहचहाने लगे।

इन्द्राकार चिह्नवाली ध्वजा से सुशोभित रथ पर बैठकर मेघनाद (इंद्रजीत) हनुमान जी के सामने आया। दोनों वीर, कपिवर हनुमान और राक्षसराजकुमार मेघनाद, एक-दूसरे से भिड़ गए। हनुमान जी ने अपने शरीर को बढ़ाया और मेघनाद ने अपने धनुष को खींचा, जो बिजली की गड़गड़ाहट के समान टंकार कर रहा था।

दोनों वीरों के बीच भयंकर युद्ध प्रारंभ हुआ। हनुमान जी ने अपनी विशाल शक्ति से मेघनाद के बाणों को व्यर्थ कर दिया। मेघनाद ने सोने की विचित्र पंखों से सुशोभित बाणों की वर्षा शुरू की। हनुमान जी ने ऊपर की ओर उछलकर बाणों से बचाव किया। बारंबार बाणों के सामने आकर हनुमान जी उड़ जाते और मेघनाद को हर वार व्यर्थ करना पड़ा।

यह युद्ध अद्भुत था। दोनों वीर महान् वेग और युद्धकला में चतुर थे। वे सम्पूर्ण भूतों के चित्त को आकर्षित करने वाला युद्ध कर रहे थे। मेघनाद हनुमान जी पर प्रहार करने का अवसर नहीं पा रहा था और हनुमान जी भी उसे धर दबाने का मौका नहीं पा रहे थे। दोनों परस्पर भिड़कर एक-दूसरे के लिये दुःसह हो उठे थे।

अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।

रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा ।।

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।

मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई। 

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया। 

हनुमान जी ने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और लंकेश्र्वर रावण के पुत्र मेघनाद को बिना रथ का कर दिया । ( रथ को तोड़कर उसे नीचे पटक दिया । ) उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे , उनको पकड़-पकड़कर हनुमान् जी अपने शरीर से मसलने लगे। 

उन सबको मारकर फिर मेघनाद से लड़ने लगे । (लड़ते हुए वे ऐसे मालूम  होते थे ) मानो दो गजराज भिड़ गए हो । हनुमान जी उसे एक घूँसा मारकर वृक्ष पर जा चढ़े । मेघनाद को क्षणभर के लिए मूर्छा आ गई । फिर उठकर उसने बहुत माया रची, परन्तु पवन के पुत्र उससे जीते नही जाते। 

मेघनाद अपनी आवाज में कहा की – “यह वानर साधारण नहीं है। इसे पकड़ना होगा।”

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