सचेतन 2.11: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – उत्कृष्टता के प्रदर्शन में विशेष उपमा होती है

कपिकेसरी अपने प्रचण्ड वेग से समुद्र में बहुत ऊँची-ऊँची तरंगों को आकर्षित करते हुए सीता माता की खोज में आगे बढ़ रहे थे 

कल हमने बात किया था की आपके कार्य में उत्कृष्टता स्वाभाविक होनी चाहिये। सीता माता की खोज में चलते हुए सूर्य के समान विशालकाय हनुमान्जी अपनी पूँछ के कारण ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो कोई बड़ा गजराज अपनी कमर में बँधी हुई रस्सी से सुशोभित हो रहा हो। हनुमान्जी का शरीर समुद्र से ऊपर- ऊपर चल रहा था और उनकी परछाईं जल में डूबी हुई सी दिखायी देती थी। इस प्रकार शरीर और परछाईं दोनों से उपलक्षित हुए वे कपिवर हनुमान् समुद्र के जल में पड़ी हुई उस नौका के समान प्रतीत हो रहे थे, जिसका ऊपरी भाग (पाल) वायु से परिपूर्ण हो और निम्न भाग समुद्र के जल से लगा हुआ हो। वे समुद्र के जिस- जिस भाग में जाते थे, वहाँ-वहाँ उनके अंग के वेग से उत्ताल तरंगें उठने लगती थीं। अतः वह भाग उन्मत्त (विक्षुब्ध)-सा दिखायी देता था। महान् वेगशाली – महाकपि हनुमान् पर्वतों के समान ऊँची महासागर की रंग-मालाओं को अपनी छाती से चूर-चूर करते हुए आगे बढ़ रहे थे। कपिश्रेठ हनुमान्के शरीर से उठी हुई तथा मेघों की घटा में व्याप्त हुई प्रबल वायु ने भीषण गर्जना करने वाले समुद्र में भारी हलचल मचा दी। 
आप यह जान लीजिए की उत्कृष्टता का प्रदर्शन तब नहीं होती जब तक की कुछ और विशेष उपमा यानी आपके कार्य कुशलता के प्रशंसा के लिए और जोड़ना या लगाना  विस्तार का जिस रूप में वर्णन किया जाता है वह तब संपूर्ण नहीं होता है जब उसमें कुछ हटाने के लिये नहीं बचे। 
कपिकेसरी अपने प्रचण्ड वेग से समुद्र में बहुत ऊँची-ऊँची तरंगों को आकर्षित करते हुए इस प्रकार उड़े जा रहे थे, मानो पृथ्वी और आकाश दोनोंको विक्षुब्ध कर रहे हैं। वे महान् वेगशाली वानरवीर उस महा समुद्रमें उठी हुई सुमेरु और मन्दराचलके समान उत्ताल तरंगों की मानो गणना करते हुए आगे बढ़ रहे थे। आप ऐसा समझे की आकर्षण कभी-कभी हमारी इच्छा या विचारों से परे होता है।
उस समय उनके वेग से ऊँचे उठकर मेघ-मण्डल के साथ आकाश में स्थित हुआ समुद्र का जल शरत्काल के फैले हुए मेघों के समान जान पड़ता था। जल हट जाने के कारण समुद्र के भीतर रहने वाले मगर, नावें, मछलियाँ और कछुए साफ-साफ दिखायी देते थे। जैसे वस्त्र खींच लेने पर देहधारियों के शरीर नंगे दीखने लगते हैं। समुद्र में विचरने वाले सर्प आकाश में जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी को देखकर उन्हें गरुड़ के ही समान समझने लगे।
अगर आपके द्वारा विशिष्ट क्षेत्र के संदर्भ में कोई काम या उपलब्धि मिल  जाता है तो उस उत्कृष्टता का अर्थ क़्या होगा। उस उच्च अवस्था का निर्णय और उसका उल्लेख ऐसा होगा की आनेवाली पीढ़ी की उसका अनुसरण करने लगे। आपके गुण उन नये नये लोगों में दिखाई देना शुरू कर दे। आपके शैली और पद्धति का अनुकरण करना लोग शुरू कर दे। 
इसी प्रकार हनुमान जी को कपिकेसरी के रूप में इतना विशाल रूप में देखा गया है की जब वे हवा मार्ग से सीता जी की खोज कर रहे थे तो उनके शरीर का आकर दस योजन चौड़ी और तीस योजन लम्बी थी जिसकी छाया वेग के कारण अत्यन्त रमणीय जान पड़ती थी। खारे पानी के समुद्रमें पड़ी हुई पवनपुत्र हनुमान्का अनुसरण करनेवाली उनकी वह छाया श्वेत बादलोंकी पंक्तिके समान शोभा पाती थी।  
हनुमान जी की कौशलता और उनके हरेक क्रियाकलाप की उत्कृष्टता को विशेष उपमा यानी प्रशंसा के लिए पर्वत, समुद्र से जोड़ा गया है। आपके जीवन में भी ऐसा होता है तब आप अपने क्रियाशीलता का विस्तार इतना कीजिए की उपमा यानी प्रशंसा के लिए रूप में किया गया वर्णन तब संपूर्ण होता है जब उसमें कुछ हटाने के लिये नहीं बचे। 

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