सचेतन 178: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- दुःख और सुख- सृष्टि का नियम है

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सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए!

सच पूछो तो सुख और दुःख दोनों पर ही तुम्हारी सत्ता है। सत्ता द्वारा ही तुम उनमें से जो चाहो सो ग्रहण कर सकते हो। यह इच्छा योग्य नहीं कि हमें कभी दुःख मिले ही नहीं, किन्तु दुःख से सुख किस प्रकार उत्पन्न करना होता है इस कला की सामर्थ्य प्राप्त करना तुम्हारे लिये योग्य है। 

क्या तुम समझते हो कि जिसे तुम इस समय प्रतिकूल कहते हो, उसमें से क्या तुम्हारे लायक कुछ भी लाभदायक नहीं मिल सकता? परन्तु ऐसा समझने का कुछ भी कारण नहीं! वास्तव में जब तक सुख की एकरसता को वेदना की विषमता का गहरा आघात नहीं लगता तब तक जीवन के यथार्थ सत्य का परिणाम नहीं मिल सकता। याद रहे कि “काले बादलों के अँधेरे में ही बिजली की चमक छिपी होती है, दुःख के बाद सुख- निराशा के बाद आशा- पतझड़ के बाद बसन्त ही सृष्टि का नियम है।” 

सच तो यह है कि दुःखादि के आधीन होकर जो मनुष्य उसे सहन करते हैं, वे दुःख से कुछ भी लाभ नहीं प्राप्त कर सकते। परन्तु जो दुखादि को अपने अधीन जानकर उनको भोगते हैं वे ही उनमें से वास्तविक सुख तथा हित प्राप्त करते हैं। दुःख के आधीन तुम नहीं वरन् तुम्हारे आधीन दुःख है, यह जानकर, जिस समय दुःख प्राप्त हो उस समय उसमें लाभ संशोधन के लिए तैयार हो जाना चाहिये। 

मैं एक कथा सुनाता हूँ – एक बैल किसी कुएँ में गिर गया और वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं।

अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।।

किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी।

जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर, अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।

सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया..

अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।

जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया ।

ध्यान रखे आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी जैसे कि आपके उपर दुःख का पहाड़ टूट गया हो।

आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा

कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा

कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे…

ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए!

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