सचेतन 116 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  किसी भी कार्य का निरंतर अभ्यास ही रूद्र है

SACHETAN  > Uncategorized >  सचेतन 116 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  किसी भी कार्य का निरंतर अभ्यास ही रूद्र है

सचेतन 116 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  किसी भी कार्य का निरंतर अभ्यास ही रूद्र है

| | 0 Comments

रूद्र, ब्रह्मांड की रचनात्मक ऊर्जा प्राप्त करने में हम सब की मदद करता है।

भगवान शिव का ‘तत्पुरुष’ नामक तीसरा अवतार पीतवासा नाम के इक्कीसवें कल्प में हुआ । ब्रह्मा जी जब सृष्टि रचना के लिए व्यग्र होने लगे तब भगवान शंकर ने उन्हें ‘तत्पुरुष रूप’ में दर्शन देकर रुद्र गायत्री-मन्त्र का उपदेश किया-

‘तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रयोदयात्।’

इसी मन्त्र के अद्भुत प्रभाव से ब्रह्मा सृष्टि की रचना में समर्थ हुए!!

हे त्रिकाल ज्ञाता महापुरुष देवों के देव महादेव, मुझे अपने अस्तित्व और आस्था में विलीन होने दे ।

इसका अर्थ है की हमारी मौजूदगी या सत्ता का भाव एक आस्था का विषय है, इस को  अन्वेषण (छानबीन) के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से अभिगम्य/बोधगम्य नहीं हो सकता है। 

हम प्रार्थना करते हैं की हे महादेव मुझे अद्वितीय ज्ञान और बुद्धि प्रदान करें, और मेरी बुद्धि में दिव्य प्राणों का संचार करें |

तार्किक बुद्धि का रस्सी काटना और आपने लिए एक समग्र मार्ग खोलने के लिये आध्यात्मिक मार्ग की आवश्यकता है। 

आत्मा, परमात्मा या फिर स्वयं की खोज का अभ्यास ही रूद्र है। अगर आप पूर्णता को प्राप्त करना चाहते हैं या फिर एक ही क्रिया का अवलंबन और अनुशीलन के लिए साधन बनाना हो तो रूद्र की आवृत्ति करनी होगी।

किसी भी कार्य का अभ्यास ही रूद्र है जिसका नियमित अभ्यास से ब्रह्मांड की रचनात्मक ऊर्जा प्राप्त करने में हम सब की मदद करता है।किसी भी कर्म का निरन्तर अभ्यास पूरे ब्रह्मांड के लिए रुद्र यानी सबसे शक्तिशाली रूप का परिचय दिलाता है। रुद्र हर रूप, बल और तत्व को भस्म करने में सक्षम हैं।

रुद्र का सबसे पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, रुद्र मध्य क्षेत्र के देवता हैं। ऋग्वेद में तैंतीस देवताओं के एक समूह का उल्लेख है। इन देवताओं को तीन अलग-अलग क्षेत्रों में समान रूप से विभाजित किया गया है, अर्थात् आकाशीय (द्युलोक) मध्यवर्ती क्षेत्र (अंतरिक्ष-लोक) और स्थलीय क्षेत्र (भूर-लोक)। 

बृहदारण्यक उपनिषद में ऋषि याज्ञवल्क्य कहते हैं, “आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इंद्र और प्रजापति तैंतीस देवता हैं”।

ऋग्वेद में, रुद्र मध्यवर्ती स्तर के देवताओं (अंतरिक्ष देवता) में से एक हैं। वह सूक्ष्म जगत, अंतरिक्ष के गोले, पृथ्वी और सूर्य के बीच के मध्य क्षेत्र का देवता है। 

रूद्र हवाओं से जुड़ी एक दिव्यता के रूप में जीवन-सांस (प्राण-वायु) का प्रतिनिधित्व करता है। रुद्र इस प्रकार जीवन के सिद्धांत हैं। रुद्र भौतिक तत्वों और बुद्धि के बीच मध्यस्थ हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *