परब्रह्म

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परब्रह्म

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नमस्कार, प्रिय मित्रों और सभी विशिष्ट अतिथियों।

आज हम सब यहां एक विशेष अवसर पर एकत्र हुए हैं और आज आप सबके आने से हम सभी की का आनंद का स्तर बढ़ा है। मनोविकास परिवार शुरू से ही समाज में मानवीय मूल्यों को बहाल करने और समृद्धि और सामाजिक समरसता यानी सभी को समान मानने की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए मिलकर काम कर रहा है। विशेषकर मानसिक दिव्यंगता के क्षेत्र में इस संस्थान के साथ जुड़े पूरे मनोविकास परिवार ने मिलकर आध्यात्मिक विकास की यात्रा शुरू की है।

आध्यात्मिक विकास का अर्थ सीधा है, यह विकास एक जागरूकता है, और यह जागरूकता स्वयं के बारे में जानने का, स्वयं को समझना और अपनी आंतरिक भावनाओं, विचारों और मूल्यों को समझना। यह यात्रा केवल हमें हमारे जीवन के द्वितीय उद्देश्य को समझने में मदद करता है। द्वितीय उद्देश्य यह है की हम सिर्फ़ अपने लिए नहीं जीते हैं हमारे जीने का उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व हो जाता है और इसके लिए आपको अपार शक्ति और मदद आपको अपने आप मिलने लगती है।

आध्यात्मिकता का आपकी आत्मा से गहरा संबंध है और खुद को सही मायने में कैसे पहचाना जाए, इसके अंतर्निहित गुणों को कैसे समझा जाए और अपने साथ स्वयं का एक रिश्ता कैसे बनाया जाए यह ज्ञान हमारे जीवन में आध्यात्मिकता को आत्मसाथ करने से ही मिलता है।

पिछले 25 वर्षों में मनोविकास ने कई विचारों और कार्यक्रमों की नींव रखी है और सच कहें तो हमने यह सब एक अनुष्ठान की तरह किया है जिससे सांत्वना और शांति मिलती है।

मनोविकास परिवार से जुड़ने वाले लोग समाज की सेवा और दूसरों की मदद करना शुरू कर देते हैं। यह सामाजिक सद्भाव, सभी को समान समझने और मानवतावादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।

हमारे परिवार में गुरु का स्थान सर्वोपरि है और इन मार्गदर्शकों का सानिध्य महत्वपूर्ण रहा है।

अब समय आ गया है की मनोविकास परिवार में दार्शनिक एवं आध्यात्मिक धारा में परब्रह्म की चर्चा इस परिवार में प्रारम्भ होना आवश्यक है। यह गहन एवं आध्यात्मिक विचार हमें अपने वास्तविक स्वरूप की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित करता है। यहां परब्रह्म एकता का प्रतीक है, जो हमें हमारे शरीर के अंगों के बीच एकता के महत्व को समझाता है, यह अंग आपको बोलने, सुनने, शरीर को ऊर्जा देने, किसी भी चीज़ को देखने, समझने और उसको महसूस करने में सहायता करता है। 

डॉ. नीलिमा मैडम और मनोविकास परिवार ने इस सामाजिक समरसता, सभी को समान समझने के सिद्धांत को अपने काम में शामिल किया है। उन्होंने निहसहाय जरूरतमंदों और समाज की समृद्धि के अंतर्निहित क्षेत्रों के प्रति अपनी संवेदनशीलता का समर्थन किया है।

सभी सहयोगियों, सदस्यों एवं स्वयंसेवकों ने अपने समय, उपाधि एवं योगदान से इस समाज सेवा कार्य को सफल बनाया है। हम सभी उनकी मेहनत, समर्पण और संघर्ष की सच्चे दिल से सराहना करते हैं और उनके साथ अपने सपनों को पूरा करने का संकल्प लेते हैं।

परब्रह्म के बारे में बात करना यह हम सभी के अनुभव का ही एक हिस्सा है, और उसे समझाने के लिए किसी ज्ञान की ज़रूरत भी नहीं है।

आज मैं डॉ. नीलिमा मैडम के साथ मेरा पिछले अनुभव को साझा करूंगा। पिछले दिनों हमारी बातचीत में गहरी नींद का जिक्र हुआ था। वैसे तो हम सभी समय-समय पर सोते हैं। क्या आपको गहरी नींद में कुछ अनुभव होता है? आप नींद में होने वाले स्वप्न की स्थिति के बारे में नहीं, बल्कि जब आप गहरी नींद में होते हैं उसे अनुभव करने का प्रयास कीजिए। यह प्रश्न आपको आज बस दे रहा हूँ आप खुद इस अनुभव को करें और बताएँ।

मैं आपको एक उदाहरण देता हूं जब भगवान बुद्ध को अपनी तपस्या के दौरान ज्ञान प्राप्त हुआ था। उन्होंने एक रात अपने अंगों पर नियंत्रण रखा और अगले दिन, उन्हें बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ।

जब आप अपने जीवन में किसी कार्य या किसी सपने या लक्ष्य को लेकर गहरी नींद में चले जाते हैं तो आपकी मुलाकात ब्रह्म से हो जाती है, जिससे आपका काम, सपना और लक्ष्य स्वत: ही पूरा हो जाता है। शून्यता की यह शक्ति या गहरी नींद में जाने का प्रयास ब्रह्म है, जो सब कुछ है, और जो कुछ नहीं है वह भी ब्रह्म है।

जब आपको लगे कि जीवन बहुत सरल हो गया है, हर काम बिना जल्दबाजी और भ्रम के पूरा हो गया है, तो आपने ब्रह्म को पा लिया है। इसके अलावा, आपने न तो ब्रह्मा को देखा, न ही उनसे बात की, न ही उन्होंने कुछ कहा, लेकिन उनकी ऊर्जा शक्ति इतनी महान थी कि आपकी कल्पना या लक्ष्य अतिरंजित हो गया।

लेकिन आज मैं परब्रह्म की बात कर रहा हूं। अर्थात् वह ब्रह्म, जो ‘परम ब्रह्म’ यानी सबसे बड़ा है। यदि कोई ब्रह्म है जो केवल आपके विचारों में था और जब आप एकाग्रता के चरम पर पहुँचते हैं, यानी गहरी नींद में, जो आपके जीवन को बदल देता है, तो उससे भी बड़ा कोई सर्वोच्च सत्ता होना चाहिए जिससे मिलकर आप परम आनंदित हो जाएँ।

यहाँ तक कि अपने अन्तःकरण से अर्थात् अपने मन, विचार, बुद्धि आदि से भी श्रेष्ठ विचार, भावनाएँ, वेद, शास्त्र, मन्त्र, तंत्र, आधुनिक विज्ञान, ज्योतिष आदि किसी भी माध्यम से उस ब्रह्म तक पहुँच सकते हैं, परन्तु नहीं। उस परम ब्रह्म की व्याख्या अगर  करूँ तो हम सभी ने अपनी संकल्पनाओं में परमेश्वर, ईश्वर, गॉड, भगवान, अल्लाह, विष्णु, आदिशक्ति और शिव जैसी कुछ संज्ञाएँ रखी हैं। और आपको उन पर पूरा भरोसा है कि वे आपके जीवन की सभी व्यवस्थाओं को व्यवस्थित रूप से बनाए रखेंगे, लेकिन क्या कभी जाने-अनजाने आपकी उनसे मुलाकात हुई है?

आपने वास्तव में उस परमात्मा, परमेश्वर, भगवान जी, अल्लाह, ईश्वर, विष्णु, आदिशक्ति और शिव के बारे में बोला या सुना है और आपने उस शब्द को शब्दब्रह्म के रूप में अपने भीतर स्थान दिया है, उस स्थान का निर्माता परब्रह्म है की जिसने आपके शरीर में अपना जगह बना रखा है। परब्रह्म अविभाज्य चेतना का निर्माता है, और परब्रह्म सभी ज्ञान और विज्ञान का आधार है। उपासना के माध्यम से ही अविभाज्य चेतना का अनुभव कर परब्रह्म तक हम पहुँच सकते हैं। वास्तव में परब्रह्म का स्वरूप भी चैतन्य स्वरूप है। ध्यान के माध्यम से उस अविभाज्य चेतना की अनुभूति होती है, तभी वचन का रहस्योद्घाटन होता है। ॐ तत् सत् 

ज्ञान, सत्य आदि गुणों से युक्त परब्रह्म विभिन्न ऐश्वर्य शक्तियों से युक्त है, जिनमें शब्द, ऊर्जा और धारणा प्रमुख ऐश्वर्य शक्तियाँ हैं। जब आप आत्मिक रूप से  परब्रह्म के प्रति समर्पण कर देते है तो आप खुद दैव कहलाने लगते हैं। लेकिन हम सब अज्ञानवश दैव को परब्रह्म ही उच्चारित करती है।

परब्रह्म का विषय बहुत गहन है, इसे केवल थोड़ा सा और सोचने और आत्ममंथन  करने की ज़रूरत है।

मान लीजिये कि आपने उस परमात्मा के विषय में जो वाणी अर्थात् बातचीत बोली या सुनी है, वह उसी भाषा, शब्द, व्याख्या से रचा हुआ आयतन है; वह उसी वाणी में प्रतिष्ठित है; अर्थात् यह वाणी परमात्मा का स्वरूप है। यह सारा संसार वाणी से प्रभावित है। इसीलिए अपने और दूसरों के कल्याण के लिए नपे-तुले शब्दों को बोला जाए तो ईश्वर की ओर प्रगति होती है।

वाणी की पवित्रता हृदय को शुद्ध करती है और इस प्रकार संपूर्ण जगत को शुद्ध करती है।

बोलने के लिए, आपके भीतर जीवन होना चाहिए; यह जीवन ही ब्रह्म है। जीवन यानी आपके अंदर प्राण का होना ज़रूरी है। जो प्राण के बिना रहता है वह मृतप्राय, शून्य या अंधकार होता है। इस संसार में प्रतिष्ठा उसी की है जो जीवित है। जो सुंदर और सक्रिय दिखता है वही जीवन है। जो कुछ भी आकर्षक है उसे प्राण का प्रभाव कहना चाहिए। लोग जीवित लोगों से ही प्यार करते हैं और उनका समर्थन और सहयोग करते हैं। मनुष्य का वैभव और आकर्षण उसकी जीवन शक्ति के आधार पर बढ़ता और घटता है।

जब आप जीवित रहते हुए सुनते हैं तो उसे देखने का भी मन करता है, इसलिए इस दुनिया में आंखों का केवल आयतन है यानी जो दिखता है, वही हम पर असर करता है। हम जो देखते हैं वह प्रकाशित होता है। यह संसार हमारी दृष्टि की प्रतिक्रिया है। जिस चीज़ का सम्मान किया जाता है वह दृष्टिकोण है। प्रतिष्ठा उनकी है जो प्रेम और आत्मीयता से हर चीज़ को देखना चाहते हैं, जिनकी आँखों में करुणा, दयालुता, क्षमा और पवित्रता की चमक है वो किसी को भी प्रभावित कर सकती है।

सुनना भी महत्वपूर्ण है। इस संसार में केवल कानों का ही महत्व है। कानों की प्रतिष्ठा है। अर्थात् हम जिस स्तर के शब्द सुनते हैं, वैसी ही भावनाएँ उत्पन्न होती हैं, वैसी ही प्रकृति बनती है और वैसी ही क्रियाएँ प्रारम्भ हो जाती हैं। कभी कभी हम केवल किसी के द्वारा कहे गए अशुभ शब्द ही याद रहते हैं। यह ऐसा शब्दों है जिसमें रुचि लेते ही  पतन को आकर्षित करने लगता है। जो लोग सुंदर शब्दों में रुचि रखते हैं, उनके लिए वे शब्द शिक्षा का स्रोत बन जाते हैं। सबसे अच्छा सुनने वाला ही सम्मानित होता है।

यह सब आपके मन से जुड़ा है; यह संसार मन का आयतन है। यहां तो मन की ही प्रतिष्ठा है। वस्तुओं और व्यक्तियों का महत्व मन की धारणा के अनुसार बढ़ता या घटता है। मन में जो इच्छा हो उसी के अनुरूप सोचना और प्रयत्न करना प्रारम्भ हो जाता है और उस दिशा में प्रगति सम्भव बनाने वाले साधन उपलब्ध हो जाते हैं। इच्छा मन से उत्पन्न होती है।

मनोबल की शक्ति से कठिनाइयाँ आसान हो जाती हैं और मन की शिथिलता से राई जैसी वस्तु पर्वत के समान भारी हो जाती है।

और सबसे अच्छा है आपका दिल। हृदय को ईश्वर का मंदिर और आत्मा का निवास कहा गया है। अध्यात्म की भाषा में धड़कते रक्त कोष को हृदय कहा जाता है। हृदय अर्थात वह सूक्ष्म आंतरिक स्थान जहाँ उच्च आदर्शों के प्रति आस्था निवास करती है। भगवान एक अच्छे गुरु के रूप में बैठकर इंसान को सही और गलत का समझाते रहते हैं और सही रास्ते पर चलने का संकेत देते रहते हैं, जिससे इंसान गलत रास्ते से बच जाता है। हृदय अर्थात आस्थाओं का केंद्र जहां केवल सद्प्रवृत्तियों और सत्प्रवृत्तियों की दो धाराएं हिमालय से निकलने वाली गंगा और यमुना की तरह अविरल बहती रहती हैं। हृदय अर्थात वह प्रेरणा का स्रोत है जहां कर्तव्य परायण रहने का संकल्प और विश्व मानव के चरणों में समर्पित रहने का उत्साह बना रहता है।

जिसका हृदय पवित्र है उसे अपवित्रता छू भी नहीं सकती।

हृदय का महत्व एवं स्थान सर्वोपरि है। हृदय आदर्शों के प्रति समर्पण और उत्कृष्टता के प्रति समर्पण का मूल है। जो इस हृदय को शुद्ध और परिष्कृत कर लेता है, वह पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। उसकी आत्मा ईश्वर दर्शन और परब्रह्म प्राप्ति में समृद्ध है।

परब्रह्म का विषय बहुत ही गुह्य होता है, उसको केवल हम अपने वाणी, प्राण, चक्षु, कान, मन और हृदय से ही समझ सकते हैं।

आखिर में, हम सभी को एक साथ आने और इस समाज सेवा कार्य को साझा करने के लिए धन्यवाद देते हैं, और हम परब्रह्म के अद्वैत विचार के साथ इस सफल कार्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

धन्यवाद।

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