सचेतन 2.77: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – प्रेम और समर्पण

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सचेतन 2.77: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – प्रेम और समर्पण

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श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे?

जितने ही प्राचीन कथाओं के गहराई में आप जाते हैं उतने ही भक्ति और समर्पण की कहानी हमारे दिलों को छू जाती है। आज की कथा है हनुमान जी की, जो अपनी प्रिय सीता माता को उद्धार करने के लिए प्रेरित हुए रामचंद्र जी के दूत बन कर अशोक वाटिका में उपस्थित हैं।

हनुमान जी ने लंका में दी माता सीता को मुद्रिका दी, लेकिन माता सीता की आँखों में एक उत्सुकता बसी थी। वे पूछती हैं, “श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे?”

हनुमान जी ने अपने माधुर्य से कहा, “श्रीराम ने न केवल मित्रों का संग्रह किया है, बल्कि उन्होंने अपने शत्रुओं को भी शरण दी है। वे न केवल मित्रों का उपकार किया हैं, बल्कि उन्होंने अपने भक्तों को भी प्राप्त किया है।”

हनुमान जी ने और भी कहा, “रामचंद्र जी सदा सुख-भोगने योग्य हैं, दुःख-भोगने के योग्य कभी नहीं होते, लेकिन उनके दुःख और पीड़ा बढ़ी है।”

हनुमान जी ने अपने सान्त्वना भरे शब्दों में कहा, “माता सीता, श्रीरामचंद्र जीआपको जरूर छुड़ाएंगे, और भरत जी, सुग्रीव और लक्ष्मण जैसे वीर प्राणियों के सहारे, आपको यहाँ से ले जाएँगे। 

हनुमान जी का यह प्रसंग, जो एक प्रेम और समर्पण को दर्शाता है। 

श्रीराम के नायक, हनुमान, लंका में पहुंच गए हैं। यहाँ वे सीता देवी से मिलने की इच्छा लेकर आए हैं। लेकिन क्या उन्हें रावण की सजीव दहशत, रक्तरंजित युद्धभूमि, और प्रेम की प्रतीक, सीता देवी का विलाप देखने को मिलेगा? आइए, इस कहानी को सुनते हैं।

सीता जी, हनुमान जी से गंभीर स्वर में कहती है की “क्या मैं रावण को उसके बन्धु-बान्धवों सहित थोड़े ही दिनों में श्रीरघुनाथजी के द्वारा युद्ध में भयंकर अस्त्रशस्त्रों से मारा गया देखूगी? जैसे पानी सूख जाने पर धूप से कमल सूख जाता है, उसी प्रकार मेरे बिना शोक से दुःखी हुआ श्रीराम का वह सुवर्ण के समान कान्तिमान् और कमल के सदृश सुगन्धित मुख सूख तो नहीं गया है?

धर्मपालन के उद्देश्य से अपने राज्य का त्याग करते और मुझे पैदल ही वन में लाते समय जिन्हें तनिक भी भय और शोक नहीं हुआ, वे श्रीराघुनाथजी इस संकट के समय हृदय में धैर्य तो धारण करते हैं न? दूत! उनके माता-पिता तथा अन्य कोई सम्बन्धी भी ऐसे नहीं हैं, जिन्हें उनका स्नेह मुझ से अधिक अथवा मेरे बराबर भी मिला हो। मैं तो तभी तक जीवित रहना चाहती हूँ, जबतक यहाँ आने के सम्बन्ध में अपने प्रियतम की प्रवृत्ति सुन रही हूँ।

सीता माता के इस प्रेम और श्रीराम की विश्वासपूर्ण शक्ति की वचन सुनकर भयंकर पराक्रमी पवनकुमार हनुमान् मस्तक पर अञ्जलि बाँधे (अञ्जलि एक हस्त मुद्रा है में प्रणाम है) इस प्रकार उत्तर देने लगे— ‘देवि! कमलनयन भगवान् श्रीराम को यह पता ही नहीं है कि आप लंका में रह रही हैं। इसीलिये जैसे इन्द्र दानवों के यहाँ से शची को उठा ले गये, उस प्रकार वे शीघ्र यहाँ से आपको नहीं ले जा रहे हैं।

जब मैं यहाँ से लौटकर जाऊँगा, तब मेरी बात सुनते ही श्रीराघुनाथजी वानर और भालुओं की विशाल सेना लेकर तुरंत वहाँ से चल देंगे. उस समय श्रीराम के मार्ग में यदि मृत्यु, देवता अथवा बड़े-बड़े असुर भी विघ्न बनकर खड़े होंगे तो वे उन सबका भी संहार कर डालेंगे।

आर्ये! आपको न देखने के कारण उत्पन्न हुए शोक से उनका हृदय भरा रहता है; अतः श्रीराम से पीड़ित हुए हाथी की भाँति क्षणभर को भी चैन नहीं पाते हैं। ‘देवि! मन्दार आदि पर्वत हमारे वास स्थान हैं और फल-मूल भोजन। अतः मैं मन्दराचल, मलय, विन्ध्य, मेरु तथा दर्दुर पर्वत की और अपनी जीविका के साधन फल-मूल की सौगंध खाकर कहता हूँ कि आप शीघ्र ही श्रीराम का नवोदित पूर्ण चन्द्रमा के समान वह मनोहर मुख देखेंगी, जो सुन्दर नेत्र, बिम्बफल के समान लाल-लाल ओठ और सुन्दर कुण्डलों से अलंकृत एवं चित्ताकर्षक है॥

‘विदेहनन्दिनि! ऐरावत की पीठ पर बैठे हुए देवराज इन्द्र के समान प्रस्रवण गिरि के शिखरपर विराजमान श्रीराम का आप शीघ्र दर्शन करेंगी। श्रीरघुनाथजी का चित्त सदा आप में लगा रहता है, अतः उन्हें अपने शरीर पर चढ़े हुए डाँस, मच्छर,कीड़ों और सर्पो को हटाने की भी सुधि नहीं रहती। श्रीराम आपके प्रेम के वशीभूत हो सदा आपका ही ध्यान करते और निरन्तर आपके ही विरह-शोक में डूबे रहते हैं। आपको छोड़कर दूसरी कोई बात वे सोचते ही नहीं हैं। नरश्रेष्ठ! श्रीराम को सदा आपकी चिन्ता के कारण कभी नींद नहीं आती है। यदि कभी आँख लगी भी तो ‘सीता-सीता’ इस मधुर वाणी का उच्चारण करते हुए वे जल्दी ही जाग उठते हैं॥

किसी फल, फूल अथवा स्त्रियों के मन को लुभाने वाली दूसरी वस्तु को भी जब वे देखते हैं, तब लंबी साँस लेकर बारंबार ‘हा प्रिये! हा प्रिये!’ कहते हुए आपको पुकारने लगते हैं। देवि! राजकुमार महात्मा श्रीराम आपके लिये सदा दुःखी रहते हैं, सीता-सीता कहकर आपकी ही रट लगाते हैं तथा उत्तम व्रत का पालन करते हुए आपकी ही प्राप्ति के प्रयत्न में लगे हुए हैं। 

श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा से सीता का अपना शोक तो दूर हो गया; किंतु श्रीराम के शोक की बात सुनकर वे पुनः उन्हीं के समान शोक में निमग्न हो गयीं। उस समय विदेहनन्दिनी सीता शरद्-ऋतु आने पर मेघों की घटा और चन्द्रमा–दोनों से युक्त (अन्धकार और प्रकाशपूर्ण) रात्रि के समान हर्ष और शोक से युक्त प्रतीत होती थीं।”

इस प्रकार, सीता देवी के मन में श्रीराम के प्रति अपार प्रेम का आभास होता है। हमारे सचेतन के अगले भाग में हम सीता देवी के और हनुमान के संवाद को जारी रखेंगे। तक इस कथा का अनुभव कीजिए।

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