सचेतन 134 : श्री शिव पुराण- भगवान शिव का एक नाम पशुपति नाथ है

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सचेतन 134 : श्री शिव पुराण- भगवान शिव का एक नाम पशुपति नाथ है

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हम सभी के स्वभाव में पशु के स्वभाव भी समाये हुए हैं

वेद में भगवान शिव की अष्टमूर्तियों सर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव, ईशान रूपों की बात करते हैं । पशुपति या पशुपतिनाथ, का अर्थ है ” सभी जानवरों के भगवान “। यह मूल रूप से वैदिक काल में रुद्र का प्रतीक भी था।

पशुपति नाथ का मंदिर धर्म, कला, संस्कृति की दृष्टि से अद्वितीय है। काशी के कण-कण में जैसै शिव माने जाते हैैं, वैसे ही नेेपाल में पग-पग पर मंदिर हैैं, जहां कला बिखरी पड़ी है..इस कला के पीछे धर्म और संस्कृति की जीवंतता छिपी हुई है।

नेपाल का सुरम्य नगर काठमांडू अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां का मौसम प्रकृति को हर माह हरा-भरा रखने के लिए अनुकूल है। चारों तरफ बागमती, इंदुमती और विष्णुमती अनेक कल-कल करती नदियां, जो कभी वर्षा के पानी से उछलती-चलती हैं, तो कभी पहाड़ों से निकलने वाले बारहमासी जल स्रोतों का निर्मल जल ले कर मंद-मंद मुस्कुराती, बल खाती चलती हैं, वे देखने में अत्यंत मोहक और लुभावनी लगती हैं।

प्रायः हर मौसम में यहां फूलों की बहार रहती है, जो देखने में अत्यंत मोहक है। 

पशुपति नाथ शिव की ज्ञान-प्राप्ति के स्मारक के रूप में बनाया गया था। वे पशुपत थे, जिसका अर्थ है सभी जानवरों की मिलीजुली अभिव्यक्ति, जो कि आप भी हैं। विकासवाद के आधुनिक सिद्धांत के अनुसार भी आप सभी जानवरों की मिलीजुली अभिव्यक्ति हैं।

हम सभी पशुपत के समान हैं। सिर्फ़ एक नज़रिया बदलने की चेष्टा करें, तो हम सभी के स्वभाव में पशु के स्वभाव भी समाये हुए हैं और यह स्वभाव आपके आस पास के वातावरण और आपकी भी नियंत्रित कर रही है।जहाँ प्राचीन और मध्ययुगीन विश्व में युद्ध से लेकर धार्मिक कर्मकांडों तक में पशुओं का एक अहम स्थान रहा, वहीं आधुनिक विश्व में भी सुरक्षा व्यवस्था से लेकर वैज्ञानिक खोजों, विशेष तौर पर चिकित्सा एवं सौंदर्य प्रसाधनों के परीक्षण हेतु जानवरों का उपयोग किया जाता है।

चार्ल्स डार्विन ने इंसान और जीव-जंतुओं के क्रमिक विकास को समझाया था। उनका मानना था कि हम सभी के पूर्वज एक ही हैं। हर प्रजाति चाहे वह इंसान हो, पेड़-पौधे हों या जानवर, सभी एक-दूसरे से संबंधित हैं। इसी को थ्योरी आफ इवोल्यूशन यानी विकासवाद का सिद्धांत कहा जाता है। 

विकासवाद के सिद्धांत के मुताबिक, इस धरती पर सबसे पहले एक कोशिका वाले जीव बने। ये जीव पानी में रहते थे। समय और परिस्थितियों के अनुसार इन्होंने खुद को ढाल लिया। एक कोशिकीय जीव के बाद बहुकोशकीय जीव बने। इस तरह जीव विकास की यह यात्रा करोड़ों वर्षों तक चली, जिसके परिणामस्वरूप बंदर से इंसान बना।

विकास के क्रम में इतने अधिक जटिल परिवर्तन हुए हैं कि एक-कोशिकीय जीवों से आज हम जैसे इंसान बने बैठे हैं। अगर आप आज भी इस शरीर में गहरे तक अंदर जाकर देखें तो आप पाएंगे कि जीवन की जो बुनियादी संरचना हमारे आपके भीतर है, ठीक वैसी ही संरचना एक बैक्टिरिया यानी जीवाणु में भी है। 

योग इस बात की चर्चा करता है की जीवन एक प्रक्रिया है और जीवन की प्रक्रिया ज्यादातर बैक्टीरिया से चलती है। यह अलग बात है कि उनमें से कुछ आपके खिलाफ काम करते हैं, लेकिन बाकी सभी बैक्टीरिया आपके पक्ष में काम कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें आपसे प्यार है, बल्कि बात यह है कि आप उनके लिए एक प्राकृतिक आवास का काम करते हैं। तो आप पशुपत हैं यानी आप इस क्रमिक विकास की प्रक्रिया में मौजूद सभी जानवरों की मिली-जुली अभिव्यक्ति हैं।

जीवन का अर्थ है जैविक प्रक्रियाओं का चलते रहना। और जैविक प्रक्रियाएं यानी सिग्नलिंग (संकेत का मिलना या देना), आत्मनिर्भर होना, विकास की क्षमता, उत्तेजनाओं की प्रतिक्रिया , उपापचय (metabolism) जीवों में जीवनयापन के लिये होने वाली रसायनिक प्रतिक्रियाओं का जारी रहना, ऊर्जा परिवर्तन और प्रजनन शामिल है। जीवन के विभिन्न रूप को पौधे, जानवर, कवक, प्रोटिस्ट, आर्किया और बैक्टीरिया आदि के रूप में हम देख सकते हैं।

अगर आप एक चींटी को ले लें तो यह बस एक चींटी है, इसके अंदर बस चींटी के ही गुण हैं। अगर आप सांप को लें तो वह बस एक सांप है। इसी तरह एक कुत्ता सिर्फ कुत्ता है, हाथी सिर्फ हाथी है। लेकिन आपमें इन सबके गुण हैं। आप अपने पास बैठे किसी व्यक्ति को चींटी की तरह काट सकते हैं और अगर आपको तेज गुस्सा आ गया तो आप कुत्ते की तरह भी हो सकते हैं। अगर जहर की बात करें तो आप किसी भी सांप को पीछे छोड़ सकते हैं। आप ये सब बनने में सक्षम हैं। उनमें केवल एक जानवर का गुण है, आपमें उन सबका है। दरअसल आपके सिस्टम में कहीं न कहीं इन सबकी यादें मौजूद होती हैं। अगर आप सचेतन नहीं हैं तो बड़ी ही आसानी से इन चीजों में फंस जाएंगे। आप पशुपत बन जाएंगे।

भगवान शिव का एक नाम पशुपति नाथ है। सद्‌गुरु बताते हैं कि ये नाम इसलिए दिया गया क्योंकि उन्होंने पशुपत से पशुपति होने की यात्रा पूरी की थी।

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